काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३।७३] १. यमकके विशिष्ट भेद : (७) प्रतिलोम यमक ८५ ७. आवृत्तिः प्रातिलोम्येन पादार्ध-श्लोक-गोचरा । यमकं प्रतिलोमत्वात् प्रतिलोममिति स्मृतम् ॥ ७३ ॥ ७. (पद्यके १) पाद, (२) अर्धाली एवं (३ पूरे) पद्यको विषय बनाने वाली उलटे क्रमसे (वर्णोंकी) आवृत्ति प्रतिलोम (उलटा) होनेके कारण 'प्रतिलोम' कहलाती है ॥ ७३ ॥ जाती है तथा भुजाओंका आश्रयदातृत्व गुण अतिरिक्त कहा जाता है । नित्य- स्त्रीलिङ्ग पदका उपमेय किसी भी लिङ्गका पद हो सकता है । अतः 'भुजाः' पुँल्लिङ्ग भी हो सकता है । अथवा '०धुराः' के स्त्रीलिङ्ग विशेष्य और 'वलम्बितः' के पुँल्लिङ्ग विशेष्यके रूपमें 'भुजाः' को 'भुजा' और भुजाओं' का एकशेष मानकर दोनोंसे अन्वित किया जा सकता है । अथवा रुद्रटोक्त लिङ्गश्लेष भी हो सकता है ॥ ७२ ॥ ७. प्रतिलोम यमक—पीछेके उदाहरणोंमें दिये यमकोंमें वर्णोंकी आवृत्ति अनुलोम क्रमसे होती है । इस दृष्टिसे वे सब अनुलोमयमक हैं । इनके विपरीत जब पद्यके वर्णसमुदायकी प्रतिलोम (उलटे) क्रमसे आवृत्ति की जाती है, तब यह प्रतिलोम यमक होता है । यह आवृत्ति (क) पद्यके सबसे छोटे अंश पादसे लेकर (ख) पद्यके अर्ध तथा (ग) पूरे श्लोकमें व्याप्त होती है । अतः यह यमक (क) पादप्रतिलोम (ख) पद्यार्धप्रतिलोम और (ग) श्लोकप्रति- लोम यमक नामक तीन भेदोंमें निष्पन्न होता है । स्पष्ट है कि यह यमक दुष्कर होता है । विशुद्ध तकनीकी दृष्टिसे यदि देखा जाये, तो प्रतिलोम यमकके भी पदके (i) अन्त, (ii) मध्य और (iii) आदि प्रभृति स्थानोंमें प्रतिलोम आवृत्तिसे यमक निष्पन्न हो सकते हैं । पर वे उतने हृदयावर्जक नहीं होंगे । अतः लगता है दण्डीने उन्हें नहीं बताया है । महाकवि भारवि और माघने तीनों प्रकारके प्रतिलोम यमकोंका प्रयोग किया है । प्रतिलोम यमकका इतिहास— यह भरतमें उपलब्ध नहीं है । पादादि प्रभृति स्थानोंमें शब्दका अभ्यास अनुलोम होना चाहिये, या प्रतिलोम, यह यद्यपि भरतके लक्षणमें उक्त नहीं है, तथापि उन्होंने यमकके सब दश भेदोंके उदाहरण अनुलोम आवृत्तिके ही दिये हैं, प्रतिलोम आवृत्तिका एक भी स्थल नहीं है । इससे सिद्ध होता है कि भरतको प्रतिलोम यमक अभीष्ट नहीं हैं । भामहने यमकके भेदोंमें प्रतिलोमका विधान तो किया ही नहीं है, वे काव्यमें दुष्कर अलङ्कारोंके अत्यन्त विरोधी हैं । अतः न केवल प्रतिलोम यमक, अपितु चित्रबन्धोंके समर्थनकी आशा भामहसे नहीं है ।