काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३।७५] १ यमक (७. ख) श्लोकार्ध-प्रतिलोम यमक ६१ (ख) नादिनोमोदना धीः स्वा, न मे काचन कामिता । तामिका न च कामेन स्वाधीना दमनोदिना ॥ ७५ ॥ (ख) मुझ प्रणव नादकी भावना वालेकी अपनी बुद्धि मदनसे रहित है । (मुझे) कोई एषणा नहीं (शेष रही) है। इन्द्रियोंके दमनको खण्डित करने वाले कामके द्वारा अपने (कामके) अधीन रहने वाली कालिख (मुझे) नहीं है ॥ ७५ ॥ चुभलानेके बाद अनुलोम-प्रतिलोम पाठकी चर्वणासे जन्य रसके आस्वादके आगे रति चातुरी बहुत उपेक्षित हो जाती है । अतः इस प्रकारके यमक माधुर्यविरोधी हैं । यह प्रतिलोम विन्यास भिन्नार्थक प्रतीति कराता है । पर अभिन्नार्थक भी हो सकता है । जैसे- माघके एक श्लोकमें पादको अनुलोम और प्रतिलोम पढ़नेसे एक ही वर्णविन्यास तनिकसे क्रमभेदसे उपलब्ध होता है ।¹ दोनों पाठोंमें इसलिये अर्थ एक ही प्रकट होता है। यह विधा दण्डीके पादप्रतिलोम- यमकके उदाहरणसे भिन्न प्रकारकी है ॥ ७४ ॥ (७. ख) श्लोकार्ध प्रतिलोम यमक — ७५वें श्लोकमें आचार्य दण्डीने किसी प्रणवनादाभ्यासी पाशुपत योगीके आत्मतोषका वर्णन किया है । दण्डीके कालमें तन्त्र एवं योगके राजयोग तथा हठयोग मार्गोंके मिश्रणसे कई शैव, शाक्त, वैष्णव साधनामार्ग प्रचलित थे । उसके अनुसार प्रणव (ओङ्कार) का अजपा जप (इसे 'अजपा गायत्री' भी कहा जाता था) किया जाता था । इसके अवि- च्छिन्न सन्तानसे मूलाधार चक्रमें सुषुम्णामें एक अमूर्त नाद (अव्यक्त ध्वनि) श्वास-प्र-श्वासकी क्रियाके समान सहज रूपसे उन अभ्यासियोंमें सिद्ध हो जाता था ।² इसे 'अन्तः प्रणव', 'ब्रह्म प्रणव' या 'महावैराज प्रणव' के नामसे कहा गया है ।³ इस प्रकारकी वेदान्तानुकूल साधनामें जपका मन्त्र 'अहं सः' १. विदितं दिवि केऽनीके तं यातं निजिताऽऽजिनि । विगदं गवि रोद्धारो योद्धा यो नतिमेति न ।। माघ० १६।२० २. मूलाधारात् सुषुम्णा च बिसतन्तुनिभा शुभा ।। ध्यानबिन्दूपनिषद् १०१ अमूर्ती वर्तते नादो वीणादण्डसमुत्थितः । १०२ उपनिषद् ब्रह्मयोगी : तत्र सुषुम्णाश्रयवीणादण्डे समुत्थितः सन्नमूर्ती नादो वर्तते ! अत एव वीणादण्डमध्यमेव नादोत्पत्तिस्थानम् । ३. पाशुपतब्रह्मोपनिषद्, उत्तरकाण्ड ३; ध्यानबिन्दूपनिषद् १, ३०, ४६ ।