काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका] विषयविवेचन (११)
कोई शिल्प है, न ऐसी कोई विद्या है, न ऐसी कोई कला है, न ऐसा कोई योग है, न ऐसा कोई कर्म है, जो नाट्यमें नहीं दिखलाई देती, उपयोगी नहीं होती।¹ बड़े लोगोंकी बड़ी बात। बड़े कवियोंके काव्य, बड़े आचार्योंके शास्त्र इतने अधिक व्यापक होते हैं कि उन्हें हृदयंगम कर पाना बहुत कठिन होता है। तब उन्हें औरोंको समझाना तो और भी कठिन कार्य है। एक शास्त्र अपने अनुकूल प्रतिकूल बहुतसे शास्त्रोंसे गहराईसे जुड़ा होता है। फिर सबसे ऊपर अत्यन्त दुरूह लोकवृत्त, जिसे वे कभी भी आँखसे ओझल नहीं करते। आचार्य दण्डीका काव्यादर्श तो शास्त्र भी है और काव्य भी। अतः इसकी विषय वस्तुकी व्यापकताको परिसीमित कर पाना अत्यन्त कठिन कार्य। मेरे जैसे साधारण बुद्धि, साधारणतर ज्ञान और साधारणतम शक्ति वाले ब्राह्मण वटुका उसकी व्याख्या करके उसके प्रसादनका प्रयास महासाहसका कार्य या, दुःसाहसिक अभियान ! मैं अपने इस लक्ष्यमें कहाँ तक सफल हुआ हूँ, यह तो विज्ञ जन जानेंगे। मैंने तो अपनी शक्तिभर श्रम करके काव्यादर्शके दुरूह मर्म तक पहुँचनेकी चेष्टा करके अपना जन्म कृतार्थ मान लिया है। जिन दिनों यह कार्य चल रहा था, उन दिनों में नित्य गङ्गास्नानकी पावनता अनुभव करता था। प्रसादिनीके तीनों परिच्छेदोंके अन्तमें संलग्न सन्दर्भग्रन्थसूचीसे पाठकोंको यह समझना कठिन नहीं होगा कि काव्यादर्शके मर्मोद्घाटनमें संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्, शिक्षा (प्रातिशाख्य), कल्प (श्रौत सूत्र), छन्द, निरुक्त, व्याकरण, कोष, दर्शनशास्त्रकी आस्तिक नास्तिक कई शाखाओं, पुराण, इति- हास (महाभारत), कामसूत्र, गद्य-पद्य-नाटक काव्य, काव्यशास्त्रकी भरतसे प्रारब्ध शोभाकर मित्रान्त लम्बी परम्परा तथा बादके भी कई आचार्यों, इनके टीकाकारों, आधुनिक लेखकों, इतिहास ग्रन्थों, भू-भौतिकी, सङ्गीतशास्त्र आदि ज्ञानकी नाना शाखा-प्रशाखाओंका सहारा लेना आवश्यक हुआ है। अपनी तरफसे कोई कोशिश छोड़ी नहीं है। ग्रन्थका मुद्रण शुद्ध हो, इसका यथासम्भव प्रयास किया है। तथापि मानवसुलभ त्रुटियों, अकेले लेखन, प्रूफशोधन आदि समस्त कार्यभारके वहन की व्यस्तता-व्यग्रता, प्रेसके प्रमाद आदि विविध कारणोंसे यत्रतत्र अशुद्धियाँ रह गई हैं। कृपालु पाठकोंको सुबोध होनेसे उनके शुद्धिपत्रकी आवश्यकता नहीं समझी है।
१. न तज्ज्ञानं, न तच्छिल्पं, न सा विद्या, न सा कला। नासौ योगो, न तत् कर्म नाट्यॆऽस्मिन् यन्न दृश्यते ॥ नाट्यशास्त्र १।११६