भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 13, कुल 270 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 13

(१०) काव्यादर्श [भूमिका उसका लक्षण (१६४ में) बताकर फिर (iii) प्रत्येक भेदके अवान्तर भेदोंके उदाहरण (१६५-१७८ श्लोकोंमें) देकर किया है । देशादिके विषयमें प्रमादसे प्रसिद्धिविपरीत कथन देशादिविरोध दोष होता है । किंतु कविके द्वारा कौशलसे जानबूझकर किया इस प्रकारका कथन ‘दोष’ न कहलाकर ‘गुण’ कहलाता है (१७६) । अगले छह (१८०- १८५) श्लोकोंमें आचार्यने देशादिविरोधी कथनोंकी गुणताके छह उदाहरण प्रस्तुत करके अपने कथनको पुष्ट किया है । उसके बाद एक (१८६ वें) श्लोकमें आचार्य दण्डीने तृतीय परिच्छेदके वर्ण्य विषयोंका परिगणन करके अपने विस्तीर्ण निरूपणको 'संक्षेपसे दिखलाना' बताकर अपना विनय और शास्त्रकी अनन्तता सूचित की है । इसके अनन्तर (१८७वें श्लोकमें) उन्होंने पूर्व परिच्छेदोंके समान इस परिच्छेदका भी उपसंहार इस परिच्छेदके विशेष कथ्य दोषता और गुणताका महत्त्व एक कमनीय कल्पनासे करके परिच्छेदकी समाप्ति की है । समाप्तिपद्यमें 'दोष-गुण' को विशेष महत्त्व देकर आचार्य कदाचिद् यह सूचित करना चाहते हैं कि यदि परिस्थितिविशेषमें कोई दोष गुण बन जाता है, तो परिस्थितिविशेषमें कोई गुण भी दोष बन सकता है, यह इस विवेचनसे व्युत्पन्न बुद्धि वाले कवि और सहृदयको समझ लेना चाहिए । इस श्लोकमें अनुपद उक्त दोषोंकी दोषता और गुणतामात्रके उल्लेखसे यह भी सूचित होता है कि यह श्लोक काव्यादर्शका अन्तिम श्लोक नहीं है । आचार्य इसे तृतीय परिच्छेदकी फलश्रुतिके कथनके रूपमें ही दे रहे हैं । यदि यह ग्रन्थका अन्तिम श्लोक होता, तो आचार्य पिछले विषयसङ्ग्रह श्लोकमें तथा यहाँ भी समूचे काव्यादर्शसे सम्बद्ध कुछ बातें कहते । कला-परिच्छेदकी वक्ष्यमाणताके उनके कथनको देखते हुए भी इस परिच्छेदकी समाप्तिपर काव्यादर्शकी समाप्ति सिद्ध नहीं होती । भगवती भवितव्यतासे प्रार्थना है कि वे अपने आंचलमें छुपे इस अंशको प्रकाशित करें और उसकी व्याख्या करनेका अवसर तथा शक्ति मुझे, इस जन्म में तो उन विषयोंका ज्ञान सम्भव नहीं अतः, जन्मान्तरमें प्रदान करे । बहुत अच्छा हो, मेरा जन्म भी काञ्चीकी उस पावन भूमिमें ही हो, जो आचार्य दण्डीके चरणोंसे पवित्र हुई है । ४. प्रसादिनीके बारेमें कुछ—आचार्य भरतका नाट्यके बारेमें यह कथन काव्यपर भी पूरी तरहसे लागू होता है कि न ऐसा कोई ज्ञान है, न ऐसा