काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका] विषयविवेचन (६) किया। फिर उनके समयमें प्रचलित न्यायशास्त्रीय अनुमिति ज्ञानके प्रतिज्ञा, हेतु और दृष्टान्तमें हीनतापर आधारित एक दोषपर विचारको (१२७ वें श्लोक) कर्कशप्राय होनेसे अनावश्यक बताकर इस परिगणनको सीमित किया। वर्गीकरण : आचार्य द्वारा बताए इन १० दोषोंको हम प्रथमतः दो वर्गोंमें बांट सकते हैं : (क) अपार्थ आदि ९ दोष (१२५ वाँ श्लोक), तथा (ख) देशादिविरोध रूप १० वाँ दोष (१२६ वाँ श्लोक) । (क) अपार्थ आदि ९ दोषोंमें से १ अपार्थ, और २ व्यर्थ विवक्षित अर्थ को ठीकसे न कह पानेसे सम्बद्ध अर्थदोष हैं। ३ एकार्थ (पौनरुक्त्य) शब्द-गत और अर्थगत दो प्रकारका है। ४ संशय, ५ अपक्रम काव्यमें वर्णित वस्तुओं को उक्त (शब्दोपात्त) या औचित्यलब्ध (न्यायोपात्त) क्रमसे न रखनेसे होने वाला दोष है। शेष चार ६ शब्दहीन, ७ यति-भ्रष्ट, ८ भिन्न-वृत्त और ९ विसन्धिक दोष व्याकरण और छन्दःशास्त्रके नियमोंके उल्लङ्घनसे होने वाले शास्त्रीय शब्दगत दोष हैं। इन ९ दोषोंमें से ७ यति-भ्रष्ट, ८ भिन्नवृत्त नित्य दोष हैं, जबकि शेष ७ दोष विशेष परिस्थितियोंमें ग्राह्य भी हो जाते हैं। अतः अनित्य दोष हैं। (ख) दूसरे वर्गके देशादिविरोध दोषके छह भेद हैं। दण्डीने दोषोंकी भरतोक्त सङ्ख्याको बनाए रखनेके लिए ही इस दोषको एक दोषके रूपमें जोर देकर बताया है। वस्तुतः तो इसके आधार परस्पर बहुत भिन्न हैं। उन्हें यदि एक नहीं कहा जा सकता, तो उनपर आधारित दोष कैसे एक हो सकते हैं ? इसलिये इस दोषको एक दोष न कहकर छह दोषोंका एक वर्ग मानना उचित है। ये दोष कविके वर्ण्य देश, कालचक्र, इतिहास, लोक-वृत्त, सामाजिक गठन, विभिन्न विद्याओं और वेदादि शास्त्रोंके ज्ञानमें त्रुटि होनेसे—दण्डीके शब्दोंमें 'कविके प्रमादसे'—आते हैं। इन दोषोंको पकड़ना भी आसान नहीं है। कवि और सहृदय दोनोंको इनके त्रुटिरहित ज्ञानकी अपेक्षा होती है। पिछले वर्गके अधिकांश दोषोंके समान ये छहों दोष अनित्य दोष हैं। परि- स्थितिविशेषमें इनके विषयमें त्रुटियुक्त कथन दोष न रहकर गुण बन जाते हैं। (क) इस वर्गके दोषोंके वर्णन (श्लोक १२८-१६१) में आचार्यने इनके लक्षण, उदाहरण देकर दोषता तो बताई ही है, वे परिस्थितियां भी वे साथ- साथ बताते चले हैं, जिनमें ये दोष न रहकर गुण बन जाते हैं। (ख) देशादि विरोध दोषका वर्णन उन्होंने (i) इस दोषके आधार देश आदि छह विषयोंके भेदोंका उपलक्षण (श्लोक १६२-१६३ में) करके (ii)