काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
पृष्ठ 11, कुल 270 में से
संदर्भ में पढ़ें(८) काव्यादर्श [भूमिका
आकारबन्ध अलङ्कारोंमें उन्होंने (१) गोमूत्रिका (७८-७६), (२) अर्ध- भ्रम (८०-८१), (३) सर्वतोभद्र (८०, ८२) नामक तीन बन्धोंका प्रदर्शन किया है । ये बन्ध दुष्कर हैं यह स्वतः स्पष्ट है । (३) वर्णनियमवान् चित्र बन्ध : इसके आचार्यने तीन भेद किये हैं : (१) स्वरनियमवान्, (२) उच्चारण-स्थान-नियमवान्, (३) वर्णनियम (व्यञ्जन) नियमवान् । इस भेदविकल्पनका आधार स्वर-व्यञ्जनके रूपमें वर्णोंकी द्विविधता तथा उनके उच्चारणस्थान हैं । यह अलङ्कार आचार्यने सुकर और दुष्कर दोनों प्रकारका बताया है । इन उपादानोंका जितनी कम मात्रा में शुद्ध या मिश्रित रूपमें प्रयोग होगा, दुष्करता उतनी ही बढ़ती जाएगी । यदि तीनों उपादानोंमें मात्रा तथा स्वरूपकी दृष्टिसे एकरूपता कर दी जाए, तो बन्ध बहुत दुष्कर हो जायेगा । आचार्यने दोनों प्रकारकी दुष्करता उदा- हरणोंसे प्रदर्शित की है । उनका एकव्यञ्जननियमवान् चित्रबन्ध (६५, पृष्ठ ११८) तो भारविके बन्ध (किरातार्जुनीय १५।१५) से भी दुष्कर है। पृष्ठ ११६ देखें। (४) प्रहेलिका : प्रहेलिकाओंका प्रयोग क्रीडार्थ अत्यन्त प्राचीनकालसे होता आया है। ये वैदिक वाङ्मयमें भी मिलती है। दण्डीने उनका स्वरूप शब्दसे ही प्रकाशित हो जानेके कारण सम्भवतः नहीं बताया है । उनके दो प्रयोजन तथा उनके उपयोगके अवसर बताकर उनका स्वरूप भी स्पष्ट कर दिया है। ये प्रयोजन और अवसर हैं गोष्ठियों और मनोविनोदके अवसरों पर क्रीडाके निमित्त परव्यामोहन (६७, पृष्ठ १२२) । इसके बाद आचार्यने (६८-१०५ श्लोकों, पृष्ठ १२५-१३२ में) पूर्वाचार्योक्त १६ प्रहेलिकाओंके लक्षण बताए हैं। उन्होंने पूर्वाचार्योक्त दोषयुक्त १४ प्रहेलिकाओंका निरूपण उनकी दूषितताके आधार दोष अपरिसङ्ख्येय हैं, इसलिए नहीं किया । अर्थात् दुष्ट प्रहेलिकाएँ १४ तो क्या, वस्तुत उनकी गिनती करना सम्भव नहीं है । अतः जिन प्रहेलिकाओंपर उनके लक्षण अव्याप्ति, अतिव्याप्ति आदि दोषत्व के प्रयोजकोंके कारण न घट सकें, उन्हें 'दुष्ट प्रहेलिका' समझा जाए । उनको अलगसे कहनेकी आवश्यकता नहीं है (१०६-१०७, पृष्ठ १३२-१३३) । इसके बाद (१०८-१२४ श्लोकों, पृष्ठ १३८-१५१ में) उपर्युक्त १६ साधु प्रहे- लिकाओंके उदाहरण प्रस्तुत किये हैं । (५) दोष : इस प्रकार काव्यके आदेय तत्त्वोंको प्रस्तुत करनेके बाद आचार्य दण्डीने काव्योंमें वर्जनीय दस दोषोंका निरूपण प्रारम्भ किया है । सबसे पहले उन्होंने १२५-१२६ श्लोकोंमें उन वर्जनीय दोषोंका परिगणन