भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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निरूपण उसे आश्रय (१) अर्थ और (२) शब्दके आधारपर दो विभागोंमें बाँट कर (१) अर्थालङ्कारोंका प्रतिपादन द्वितीय परिच्छेदमें और (२) शब्दा- लङ्कारोंका तृतीय परिच्छेदके १-१२४ श्लोकोंमें किया है। इसके अनन्तर हेय तत्त्व, अर्थात् काव्यनिर्माणमें विविध भङ्गियोंसे आने वाले दोषोंका निरूपण (३।१२५-१८६ में) किया है। (ख) तृतीय परिच्छेद : इस परिच्छेदमें आचार्यने काव्यमें ग्राह्य तत्त्वों १ यमक (१-७७), २ आकार बन्ध (७८-८२) और ३ वर्णनियम (८३-९५) के भेदसे द्विविध चित्रबन्ध, ४ प्रहेलिकाओं (९६-१२४) इन चार शब्दा- लङ्कारोंका निरूपण इनके लक्षण, भेद तथा उदाहरण देकर किया है। इसके बाद (१२४-१८६ में) हेय तत्त्वों दोषोंका निरूपण किया है। (१) यमक : प्रथम अढ़ाई श्लोकोंमें आचार्यने यमकका (क) लक्षण तथा (ख) भेदविकल्पनके आधार बताकर इसके भेदोंको 'अत्यन्तबहु' बताया है। (क) लक्षण : वर्णोंकी विशिष्ट आवृत्ति यमक होता है। (ख) भेदविकल्पनके आधार : ये आधार आचार्यने तीन प्रकारके बताये हैं: (अ) आवृत्तिकी (१) निरन्तरता तथा (२) सान्तरताके आधारपर (१) अव्यपेत, (२) व्यपेत, (३) अव्यपेत-व्यपेत । (आ) आवृत्तिके अधिष्ठानके आधार पर पादके (१) आदि, (२) मध्य तथा (३) अन्त स्थानों तथा (इ) आवृत्तिकी व्याप्तिके विषयके आधारपर (१) एक, (२) दो, (३) तीन तथा (४) चार पादोंमें व्याप्ति । इन दस आधारोंके पर-स्पर संयोजनके फलस्वरूप यमकके वस्तुतः 'अत्यन्तबहु' हो जाते हैं। हमारी गणनाके अनुसार (द्रष्टव्य प्रसादिनी पृष्ठ ६) ये ३१५ होते हैं। इनमें से कुछ भेद सुकर होते हैं, तो कुछ दुष्कर । आचार्यने पहले (४-३७ श्लोकोंमें) सुकर यमक दिये हैं, उसके बाद (३८-७७ श्लोकोंमें) दुष्कर । दुष्करता भी क्रमशः वर्धमान रूपमें प्रदर्शित की है। पादाभ्यास यमकका अन्तिम 'महायमक' भेद (पृष्ठ ८०-८२) तथा प्रतिलोमयमक दुष्करताकी पराकाष्ठा हैं। यमकके कुशल प्रयोक्ता कवियों भारवि और भट्टिके काव्योंमें भी इनके उदाहरण इक्के-दुक्के ही मिलते हैं। (२) आकार चित्र बन्ध : आचार्यने 'चित्र' शब्दका प्रयोग 'आकारप्रदर्शक चित्र' अर्थमें और 'विचित्र' अर्थमें किया है (द्रष्टव्य पृष्ठ ६५) । अतः 'चित्र बन्ध' का विषय 'गोमूत्रिका' आदि आकारबन्ध और वर्णनियमवान् प्रयोग अभिप्रेत हैं।