काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(६) काव्यादर्श [भूमिका
द्वितीय परिच्छेदकी विषय वस्तु स्पष्टतः अर्थालङ्कार हैं । अतः उसका नाम 'अर्थालङ्कार परिच्छेद' आचार्यको इष्ट है । रत्नश्रीमें भी यही नाम दिया है । तृतीय परिच्छेदकी विषयवस्तु (क) सुकर दुष्कर शब्दालङ्कार (३।१-१२४, पृष्ठ १-१५१) तथा (ख) दोष (३।१२५-१८६, पृष्ठ १५२-२२०) हैं । अतः इस परिच्छेदकी क्या संज्ञा दण्डीको इष्ट रही होगी, यह निर्णय करना कठिन है । 'प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति' (गौण और प्रधानमें से प्रधानके आधारपर नाम रखे जाते हैं) न्यायसे तो इसका नाम शब्दालङ्कार परिच्छेद उचित है । आचार्य रत्नश्रीज्ञानने इसका उल्लेख 'दुष्कर परिच्छेद' नामसे किया है । शब्दालङ्कारों (४-१२४) में ४-३७ श्लोकों तक सुकरका निरूपण आचार्यने किया है । तथा शेष ३८-१२४ श्लोकोंमें दुष्कर अलङ्कारोंका । अतः १८७ श्लोकों वाले परिच्छेदमें ८७ श्लोकोंमें निरूपित दुष्करको प्रधान मानना एक विषयके निरूपक श्लोकोंकी अधिकतम संख्याके आधारपर तो उचित है, परंतु समग्र संख्याकी अपेक्षासे उचित नहीं है । अतः प्रसादिनीमें इसे शब्दालङ्कार- दोष परिच्छेद नाम दिया है । इस नामसे इस परिच्छेदका सम्पूर्ण विषय प्रकट हो जाता है । ३. विषय-विवेचन—(क) सिंहावलोकन : काव्यादर्शका विषय काव्य- लक्षण है । 'लक्षण' शब्द √लक्ष् + ल्युट् (करण) में निष्पन्न है । प्रकृत ग्रन्थ काव्यको लक्षित करनेका साधन है । लक्ष्यसे तात्पर्य है निरूपित करना, मुख्य चिह्नोंको बताना । अतः काव्यके स्वरूपके अन्तर्गत मुख्य विशेषताओंको बताना प्रकृत ग्रन्थका प्रधान विषय है । काव्यके ये लक्षण—मुख्य धर्म— काव्यकी बाह्य और आन्तरिक संरचनाके मुख्य (स्वरूपाधायक) तत्त्व हैं । इनके बिना काव्य काव्य ही नहीं होगा । इन तत्त्वोंको आचार्य दण्डीने सर्व प्रथम (१।८ में) ग्राह्य (गुण) और हेय (दोष) की दृष्टिसे देखकर पहले ग्राह्य पदार्थोंका निरूपण दो क्रमोंमें किया है : (क) काव्यकी बाह्य संरचना अर्थात् काव्य-शरीर (१।१०-३६) तथा (ख) उस काव्यशरीरको शोभा- युक्त करने वाले तत्त्व अर्थात् अलङ्कार (१।४० से ३।१२४ तक) । (ख) अलङ्कारका निरूपण आचार्यने (अ) मार्ग-विशेषसे सम्बद्ध और (आ) सर्व- मार्ग-साधारणके रूपमें किया है । प्रथमको उन्होंने गुण नाम दिया है और द्वितीयका अलङ्कार नाम ही रहने दिया है (२।३ देखें) । (अ) गुणका निरू- पण प्रथम परिच्छेदके शेष भागमें किया है तथा (आ) साधारण अलङ्कारका