काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका गणनायक विघ्नविघातक सुखदायक हे वन्दन मैं करता । दूर किये सब विघ्न हैं मेरे ग्रन्थप्रकाश हुआ पुरता ॥ पाठकके कर कमलोंमें पहुँचे हर्ष अमित सबको देवे । सेवा मेरी सुरवाणी औ हिन्दीकी जन जनको हरसावे ॥ १. टीका-लेखनमें निमित्त—आश्विन कृष्ण द्वितीया, शनिवार, २०४३ वि० (२० सितम्बर १९८६ ई०) को प्रातः रेवती नक्षत्रमें मनके उत्साहसे प्रारब्ध प्रसादिनी भाद्रकृष्ण त्रयोदशी शनिवार, २०४४ वि० (२२ अगस्त १९८७ ई०) को निशीथकी प्रशान्त वेलामें सम्पूर्ण हुई । इसमें निमित्त पूर्व- पुरुषोंके आशीर्वाद, गुरुजनोंकी कृपा, गृहजनोंका सहयोग, दण्डीके मतिवैभवके निरन्तर प्रकाशके कारण उनमें निरन्तर वर्धमान भक्ति एवम् इष्टदेवी पराम्बाके कुटुम्बकी अहैतुकी अनुकम्पा, ये सब रहे । २. तृतीय परिच्छेदका नाम—आचार्य दण्डीके 'तस्याः (कला-चतुःषष्टेः) कला-परिच्छेदे रूपमाविर्भविष्यति ॥' (काव्यादर्श ३।१७१, पृष्ठ २०८) कथनसे विदित होता है कि काव्यादर्शमें कमसे कम चार परिच्छेद अवश्य थे । पर आज ऊपर उल्लिखित चौथा कला-परिच्छेद उपलब्ध नहीं है । केवल तीन परिच्छेद ही उपलब्ध हैं । इनमें से प्रथम और द्वितीय परिच्छेदोंकी विषय- वस्तु तथा उससे सम्बद्ध बातोंका विवरण इन परिच्छेदोंकी भूमिकाओंमें किया जा चुका है । प्रकृत तृतीय परिच्छेदपर कुछ वक्तव्य आगेके पृष्ठोंमें प्रस्तुत है । चौथे परिच्छेदका उल्लेख कला-परिच्छेद नामसे करनेसे प्रतीत होता है कि आचार्य दण्डीने अपने ग्रन्थके अवयव परिच्छेदोंको उनकी विषय वस्तुके आधारपर नाम दिये थे । वे आज उपलब्ध ग्रन्थके न मुख्य भागमें मिलते हैं और न हस्तलेखोंमें उसकी पुष्पिकाओंमें । दण्डीने 'काश्चिन्मार्ग-विभागार्थ- मुक्ताः प्रागप्यलंकियाः' (२।३) में प्रथम परिच्छेदकी विशेषता 'मार्ग-विभाग' बताई है । प्रथम परिच्छेदकी संज्ञा दण्डीको मार्ग-विभाग परिच्छेद इष्ट थी, यह सूचित होता है । इसीलिए आचार्य रत्नश्रीज्ञानने उस परिच्छेदकी टीका- की पुष्पिकामें प्रथम परिच्छेदका उल्लेख 'मार्ग-विभाग परिच्छेद'के नामसे किया है ।