काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
भूमिका गणनायक विघ्नविघातक सुखदायक हे वन्दन मैं करता । दूर किये सब विघ्न हैं मेरे ग्रन्थप्रकाश हुआ पुरता ॥ पाठकके कर कमलोंमें पहुँचे हर्ष अमित सबको देवे । सेवा मेरी सुरवाणी औ हिन्दीकी जन जनको हरसावे ॥ १. टीका-लेखनमें निमित्त—आश्विन कृष्ण द्वितीया, शनिवार, २०४३ वि० (२० सितम्बर १९८६ ई०) को प्रातः रेवती नक्षत्रमें मनके उत्साहसे प्रारब्ध प्रसादिनी भाद्रकृष्ण त्रयोदशी शनिवार, २०४४ वि० (२२ अगस्त १९८७ ई०) को निशीथकी प्रशान्त वेलामें सम्पूर्ण हुई । इसमें निमित्त पूर्व- पुरुषोंके आशीर्वाद, गुरुजनोंकी कृपा, गृहजनोंका सहयोग, दण्डीके मतिवैभवके निरन्तर प्रकाशके कारण उनमें निरन्तर वर्धमान भक्ति एवम् इष्टदेवी पराम्बाके कुटुम्बकी अहैतुकी अनुकम्पा, ये सब रहे । २. तृतीय परिच्छेदका नाम—आचार्य दण्डीके 'तस्याः (कला-चतुःषष्टेः) कला-परिच्छेदे रूपमाविर्भविष्यति ॥' (काव्यादर्श ३।१७१, पृष्ठ २०८) कथनसे विदित होता है कि काव्यादर्शमें कमसे कम चार परिच्छेद अवश्य थे । पर आज ऊपर उल्लिखित चौथा कला-परिच्छेद उपलब्ध नहीं है । केवल तीन परिच्छेद ही उपलब्ध हैं । इनमें से प्रथम और द्वितीय परिच्छेदोंकी विषय- वस्तु तथा उससे सम्बद्ध बातोंका विवरण इन परिच्छेदोंकी भूमिकाओंमें किया जा चुका है । प्रकृत तृतीय परिच्छेदपर कुछ वक्तव्य आगेके पृष्ठोंमें प्रस्तुत है । चौथे परिच्छेदका उल्लेख कला-परिच्छेद नामसे करनेसे प्रतीत होता है कि आचार्य दण्डीने अपने ग्रन्थके अवयव परिच्छेदोंको उनकी विषय वस्तुके आधारपर नाम दिये थे । वे आज उपलब्ध ग्रन्थके न मुख्य भागमें मिलते हैं और न हस्तलेखोंमें उसकी पुष्पिकाओंमें । दण्डीने 'काश्चिन्मार्ग-विभागार्थ- मुक्ताः प्रागप्यलंकियाः' (२।३) में प्रथम परिच्छेदकी विशेषता 'मार्ग-विभाग' बताई है । प्रथम परिच्छेदकी संज्ञा दण्डीको मार्ग-विभाग परिच्छेद इष्ट थी, यह सूचित होता है । इसीलिए आचार्य रत्नश्रीज्ञानने उस परिच्छेदकी टीका- की पुष्पिकामें प्रथम परिच्छेदका उल्लेख 'मार्ग-विभाग परिच्छेद'के नामसे किया है ।
(६) काव्यादर्श [भूमिका
द्वितीय परिच्छेदकी विषय वस्तु स्पष्टतः अर्थालङ्कार हैं । अतः उसका नाम 'अर्थालङ्कार परिच्छेद' आचार्यको इष्ट है । रत्नश्रीमें भी यही नाम दिया है । तृतीय परिच्छेदकी विषयवस्तु (क) सुकर दुष्कर शब्दालङ्कार (३।१-१२४, पृष्ठ १-१५१) तथा (ख) दोष (३।१२५-१८६, पृष्ठ १५२-२२०) हैं । अतः इस परिच्छेदकी क्या संज्ञा दण्डीको इष्ट रही होगी, यह निर्णय करना कठिन है । 'प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति' (गौण और प्रधानमें से प्रधानके आधारपर नाम रखे जाते हैं) न्यायसे तो इसका नाम शब्दालङ्कार परिच्छेद उचित है । आचार्य रत्नश्रीज्ञानने इसका उल्लेख 'दुष्कर परिच्छेद' नामसे किया है । शब्दालङ्कारों (४-१२४) में ४-३७ श्लोकों तक सुकरका निरूपण आचार्यने किया है । तथा शेष ३८-१२४ श्लोकोंमें दुष्कर अलङ्कारोंका । अतः १८७ श्लोकों वाले परिच्छेदमें ८७ श्लोकोंमें निरूपित दुष्करको प्रधान मानना एक विषयके निरूपक श्लोकोंकी अधिकतम संख्याके आधारपर तो उचित है, परंतु समग्र संख्याकी अपेक्षासे उचित नहीं है । अतः प्रसादिनीमें इसे शब्दालङ्कार- दोष परिच्छेद नाम दिया है । इस नामसे इस परिच्छेदका सम्पूर्ण विषय प्रकट हो जाता है । ३. विषय-विवेचन—(क) सिंहावलोकन : काव्यादर्शका विषय काव्य- लक्षण है । 'लक्षण' शब्द √लक्ष् + ल्युट् (करण) में निष्पन्न है । प्रकृत ग्रन्थ काव्यको लक्षित करनेका साधन है । लक्ष्यसे तात्पर्य है निरूपित करना, मुख्य चिह्नोंको बताना । अतः काव्यके स्वरूपके अन्तर्गत मुख्य विशेषताओंको बताना प्रकृत ग्रन्थका प्रधान विषय है । काव्यके ये लक्षण—मुख्य धर्म— काव्यकी बाह्य और आन्तरिक संरचनाके मुख्य (स्वरूपाधायक) तत्त्व हैं । इनके बिना काव्य काव्य ही नहीं होगा । इन तत्त्वोंको आचार्य दण्डीने सर्व प्रथम (१।८ में) ग्राह्य (गुण) और हेय (दोष) की दृष्टिसे देखकर पहले ग्राह्य पदार्थोंका निरूपण दो क्रमोंमें किया है : (क) काव्यकी बाह्य संरचना अर्थात् काव्य-शरीर (१।१०-३६) तथा (ख) उस काव्यशरीरको शोभा- युक्त करने वाले तत्त्व अर्थात् अलङ्कार (१।४० से ३।१२४ तक) । (ख) अलङ्कारका निरूपण आचार्यने (अ) मार्ग-विशेषसे सम्बद्ध और (आ) सर्व- मार्ग-साधारणके रूपमें किया है । प्रथमको उन्होंने गुण नाम दिया है और द्वितीयका अलङ्कार नाम ही रहने दिया है (२।३ देखें) । (अ) गुणका निरू- पण प्रथम परिच्छेदके शेष भागमें किया है तथा (आ) साधारण अलङ्कारका
निरूपण उसे आश्रय (१) अर्थ और (२) शब्दके आधारपर दो विभागोंमें बाँट कर (१) अर्थालङ्कारोंका प्रतिपादन द्वितीय परिच्छेदमें और (२) शब्दा- लङ्कारोंका तृतीय परिच्छेदके १-१२४ श्लोकोंमें किया है। इसके अनन्तर हेय तत्त्व, अर्थात् काव्यनिर्माणमें विविध भङ्गियोंसे आने वाले दोषोंका निरूपण (३।१२५-१८६ में) किया है। (ख) तृतीय परिच्छेद : इस परिच्छेदमें आचार्यने काव्यमें ग्राह्य तत्त्वों १ यमक (१-७७), २ आकार बन्ध (७८-८२) और ३ वर्णनियम (८३-९५) के भेदसे द्विविध चित्रबन्ध, ४ प्रहेलिकाओं (९६-१२४) इन चार शब्दा- लङ्कारोंका निरूपण इनके लक्षण, भेद तथा उदाहरण देकर किया है। इसके बाद (१२४-१८६ में) हेय तत्त्वों दोषोंका निरूपण किया है। (१) यमक : प्रथम अढ़ाई श्लोकोंमें आचार्यने यमकका (क) लक्षण तथा (ख) भेदविकल्पनके आधार बताकर इसके भेदोंको 'अत्यन्तबहु' बताया है। (क) लक्षण : वर्णोंकी विशिष्ट आवृत्ति यमक होता है। (ख) भेदविकल्पनके आधार : ये आधार आचार्यने तीन प्रकारके बताये हैं: (अ) आवृत्तिकी (१) निरन्तरता तथा (२) सान्तरताके आधारपर (१) अव्यपेत, (२) व्यपेत, (३) अव्यपेत-व्यपेत । (आ) आवृत्तिके अधिष्ठानके आधार पर पादके (१) आदि, (२) मध्य तथा (३) अन्त स्थानों तथा (इ) आवृत्तिकी व्याप्तिके विषयके आधारपर (१) एक, (२) दो, (३) तीन तथा (४) चार पादोंमें व्याप्ति । इन दस आधारोंके पर-स्पर संयोजनके फलस्वरूप यमकके वस्तुतः 'अत्यन्तबहु' हो जाते हैं। हमारी गणनाके अनुसार (द्रष्टव्य प्रसादिनी पृष्ठ ६) ये ३१५ होते हैं। इनमें से कुछ भेद सुकर होते हैं, तो कुछ दुष्कर । आचार्यने पहले (४-३७ श्लोकोंमें) सुकर यमक दिये हैं, उसके बाद (३८-७७ श्लोकोंमें) दुष्कर । दुष्करता भी क्रमशः वर्धमान रूपमें प्रदर्शित की है। पादाभ्यास यमकका अन्तिम 'महायमक' भेद (पृष्ठ ८०-८२) तथा प्रतिलोमयमक दुष्करताकी पराकाष्ठा हैं। यमकके कुशल प्रयोक्ता कवियों भारवि और भट्टिके काव्योंमें भी इनके उदाहरण इक्के-दुक्के ही मिलते हैं। (२) आकार चित्र बन्ध : आचार्यने 'चित्र' शब्दका प्रयोग 'आकारप्रदर्शक चित्र' अर्थमें और 'विचित्र' अर्थमें किया है (द्रष्टव्य पृष्ठ ६५) । अतः 'चित्र बन्ध' का विषय 'गोमूत्रिका' आदि आकारबन्ध और वर्णनियमवान् प्रयोग अभिप्रेत हैं।
(८) काव्यादर्श [भूमिका
आकारबन्ध अलङ्कारोंमें उन्होंने (१) गोमूत्रिका (७८-७६), (२) अर्ध- भ्रम (८०-८१), (३) सर्वतोभद्र (८०, ८२) नामक तीन बन्धोंका प्रदर्शन किया है । ये बन्ध दुष्कर हैं यह स्वतः स्पष्ट है । (३) वर्णनियमवान् चित्र बन्ध : इसके आचार्यने तीन भेद किये हैं : (१) स्वरनियमवान्, (२) उच्चारण-स्थान-नियमवान्, (३) वर्णनियम (व्यञ्जन) नियमवान् । इस भेदविकल्पनका आधार स्वर-व्यञ्जनके रूपमें वर्णोंकी द्विविधता तथा उनके उच्चारणस्थान हैं । यह अलङ्कार आचार्यने सुकर और दुष्कर दोनों प्रकारका बताया है । इन उपादानोंका जितनी कम मात्रा में शुद्ध या मिश्रित रूपमें प्रयोग होगा, दुष्करता उतनी ही बढ़ती जाएगी । यदि तीनों उपादानोंमें मात्रा तथा स्वरूपकी दृष्टिसे एकरूपता कर दी जाए, तो बन्ध बहुत दुष्कर हो जायेगा । आचार्यने दोनों प्रकारकी दुष्करता उदा- हरणोंसे प्रदर्शित की है । उनका एकव्यञ्जननियमवान् चित्रबन्ध (६५, पृष्ठ ११८) तो भारविके बन्ध (किरातार्जुनीय १५।१५) से भी दुष्कर है। पृष्ठ ११६ देखें। (४) प्रहेलिका : प्रहेलिकाओंका प्रयोग क्रीडार्थ अत्यन्त प्राचीनकालसे होता आया है। ये वैदिक वाङ्मयमें भी मिलती है। दण्डीने उनका स्वरूप शब्दसे ही प्रकाशित हो जानेके कारण सम्भवतः नहीं बताया है । उनके दो प्रयोजन तथा उनके उपयोगके अवसर बताकर उनका स्वरूप भी स्पष्ट कर दिया है। ये प्रयोजन और अवसर हैं गोष्ठियों और मनोविनोदके अवसरों पर क्रीडाके निमित्त परव्यामोहन (६७, पृष्ठ १२२) । इसके बाद आचार्यने (६८-१०५ श्लोकों, पृष्ठ १२५-१३२ में) पूर्वाचार्योक्त १६ प्रहेलिकाओंके लक्षण बताए हैं। उन्होंने पूर्वाचार्योक्त दोषयुक्त १४ प्रहेलिकाओंका निरूपण उनकी दूषितताके आधार दोष अपरिसङ्ख्येय हैं, इसलिए नहीं किया । अर्थात् दुष्ट प्रहेलिकाएँ १४ तो क्या, वस्तुत उनकी गिनती करना सम्भव नहीं है । अतः जिन प्रहेलिकाओंपर उनके लक्षण अव्याप्ति, अतिव्याप्ति आदि दोषत्व के प्रयोजकोंके कारण न घट सकें, उन्हें 'दुष्ट प्रहेलिका' समझा जाए । उनको अलगसे कहनेकी आवश्यकता नहीं है (१०६-१०७, पृष्ठ १३२-१३३) । इसके बाद (१०८-१२४ श्लोकों, पृष्ठ १३८-१५१ में) उपर्युक्त १६ साधु प्रहे- लिकाओंके उदाहरण प्रस्तुत किये हैं । (५) दोष : इस प्रकार काव्यके आदेय तत्त्वोंको प्रस्तुत करनेके बाद आचार्य दण्डीने काव्योंमें वर्जनीय दस दोषोंका निरूपण प्रारम्भ किया है । सबसे पहले उन्होंने १२५-१२६ श्लोकोंमें उन वर्जनीय दोषोंका परिगणन
भूमिका] विषयविवेचन (६) किया। फिर उनके समयमें प्रचलित न्यायशास्त्रीय अनुमिति ज्ञानके प्रतिज्ञा, हेतु और दृष्टान्तमें हीनतापर आधारित एक दोषपर विचारको (१२७ वें श्लोक) कर्कशप्राय होनेसे अनावश्यक बताकर इस परिगणनको सीमित किया। वर्गीकरण : आचार्य द्वारा बताए इन १० दोषोंको हम प्रथमतः दो वर्गोंमें बांट सकते हैं : (क) अपार्थ आदि ९ दोष (१२५ वाँ श्लोक), तथा (ख) देशादिविरोध रूप १० वाँ दोष (१२६ वाँ श्लोक) । (क) अपार्थ आदि ९ दोषोंमें से १ अपार्थ, और २ व्यर्थ विवक्षित अर्थ को ठीकसे न कह पानेसे सम्बद्ध अर्थदोष हैं। ३ एकार्थ (पौनरुक्त्य) शब्द-गत और अर्थगत दो प्रकारका है। ४ संशय, ५ अपक्रम काव्यमें वर्णित वस्तुओं को उक्त (शब्दोपात्त) या औचित्यलब्ध (न्यायोपात्त) क्रमसे न रखनेसे होने वाला दोष है। शेष चार ६ शब्दहीन, ७ यति-भ्रष्ट, ८ भिन्न-वृत्त और ९ विसन्धिक दोष व्याकरण और छन्दःशास्त्रके नियमोंके उल्लङ्घनसे होने वाले शास्त्रीय शब्दगत दोष हैं। इन ९ दोषोंमें से ७ यति-भ्रष्ट, ८ भिन्नवृत्त नित्य दोष हैं, जबकि शेष ७ दोष विशेष परिस्थितियोंमें ग्राह्य भी हो जाते हैं। अतः अनित्य दोष हैं। (ख) दूसरे वर्गके देशादिविरोध दोषके छह भेद हैं। दण्डीने दोषोंकी भरतोक्त सङ्ख्याको बनाए रखनेके लिए ही इस दोषको एक दोषके रूपमें जोर देकर बताया है। वस्तुतः तो इसके आधार परस्पर बहुत भिन्न हैं। उन्हें यदि एक नहीं कहा जा सकता, तो उनपर आधारित दोष कैसे एक हो सकते हैं ? इसलिये इस दोषको एक दोष न कहकर छह दोषोंका एक वर्ग मानना उचित है। ये दोष कविके वर्ण्य देश, कालचक्र, इतिहास, लोक-वृत्त, सामाजिक गठन, विभिन्न विद्याओं और वेदादि शास्त्रोंके ज्ञानमें त्रुटि होनेसे—दण्डीके शब्दोंमें 'कविके प्रमादसे'—आते हैं। इन दोषोंको पकड़ना भी आसान नहीं है। कवि और सहृदय दोनोंको इनके त्रुटिरहित ज्ञानकी अपेक्षा होती है। पिछले वर्गके अधिकांश दोषोंके समान ये छहों दोष अनित्य दोष हैं। परि- स्थितिविशेषमें इनके विषयमें त्रुटियुक्त कथन दोष न रहकर गुण बन जाते हैं। (क) इस वर्गके दोषोंके वर्णन (श्लोक १२८-१६१) में आचार्यने इनके लक्षण, उदाहरण देकर दोषता तो बताई ही है, वे परिस्थितियां भी वे साथ- साथ बताते चले हैं, जिनमें ये दोष न रहकर गुण बन जाते हैं। (ख) देशादि विरोध दोषका वर्णन उन्होंने (i) इस दोषके आधार देश आदि छह विषयोंके भेदोंका उपलक्षण (श्लोक १६२-१६३ में) करके (ii)
(१०) काव्यादर्श [भूमिका उसका लक्षण (१६४ में) बताकर फिर (iii) प्रत्येक भेदके अवान्तर भेदोंके उदाहरण (१६५-१७८ श्लोकोंमें) देकर किया है । देशादिके विषयमें प्रमादसे प्रसिद्धिविपरीत कथन देशादिविरोध दोष होता है । किंतु कविके द्वारा कौशलसे जानबूझकर किया इस प्रकारका कथन ‘दोष’ न कहलाकर ‘गुण’ कहलाता है (१७६) । अगले छह (१८०- १८५) श्लोकोंमें आचार्यने देशादिविरोधी कथनोंकी गुणताके छह उदाहरण प्रस्तुत करके अपने कथनको पुष्ट किया है । उसके बाद एक (१८६ वें) श्लोकमें आचार्य दण्डीने तृतीय परिच्छेदके वर्ण्य विषयोंका परिगणन करके अपने विस्तीर्ण निरूपणको 'संक्षेपसे दिखलाना' बताकर अपना विनय और शास्त्रकी अनन्तता सूचित की है । इसके अनन्तर (१८७वें श्लोकमें) उन्होंने पूर्व परिच्छेदोंके समान इस परिच्छेदका भी उपसंहार इस परिच्छेदके विशेष कथ्य दोषता और गुणताका महत्त्व एक कमनीय कल्पनासे करके परिच्छेदकी समाप्ति की है । समाप्तिपद्यमें 'दोष-गुण' को विशेष महत्त्व देकर आचार्य कदाचिद् यह सूचित करना चाहते हैं कि यदि परिस्थितिविशेषमें कोई दोष गुण बन जाता है, तो परिस्थितिविशेषमें कोई गुण भी दोष बन सकता है, यह इस विवेचनसे व्युत्पन्न बुद्धि वाले कवि और सहृदयको समझ लेना चाहिए । इस श्लोकमें अनुपद उक्त दोषोंकी दोषता और गुणतामात्रके उल्लेखसे यह भी सूचित होता है कि यह श्लोक काव्यादर्शका अन्तिम श्लोक नहीं है । आचार्य इसे तृतीय परिच्छेदकी फलश्रुतिके कथनके रूपमें ही दे रहे हैं । यदि यह ग्रन्थका अन्तिम श्लोक होता, तो आचार्य पिछले विषयसङ्ग्रह श्लोकमें तथा यहाँ भी समूचे काव्यादर्शसे सम्बद्ध कुछ बातें कहते । कला-परिच्छेदकी वक्ष्यमाणताके उनके कथनको देखते हुए भी इस परिच्छेदकी समाप्तिपर काव्यादर्शकी समाप्ति सिद्ध नहीं होती । भगवती भवितव्यतासे प्रार्थना है कि वे अपने आंचलमें छुपे इस अंशको प्रकाशित करें और उसकी व्याख्या करनेका अवसर तथा शक्ति मुझे, इस जन्म में तो उन विषयोंका ज्ञान सम्भव नहीं अतः, जन्मान्तरमें प्रदान करे । बहुत अच्छा हो, मेरा जन्म भी काञ्चीकी उस पावन भूमिमें ही हो, जो आचार्य दण्डीके चरणोंसे पवित्र हुई है । ४. प्रसादिनीके बारेमें कुछ—आचार्य भरतका नाट्यके बारेमें यह कथन काव्यपर भी पूरी तरहसे लागू होता है कि न ऐसा कोई ज्ञान है, न ऐसा
भूमिका] विषयविवेचन (११)
कोई शिल्प है, न ऐसी कोई विद्या है, न ऐसी कोई कला है, न ऐसा कोई योग है, न ऐसा कोई कर्म है, जो नाट्यमें नहीं दिखलाई देती, उपयोगी नहीं होती।¹ बड़े लोगोंकी बड़ी बात। बड़े कवियोंके काव्य, बड़े आचार्योंके शास्त्र इतने अधिक व्यापक होते हैं कि उन्हें हृदयंगम कर पाना बहुत कठिन होता है। तब उन्हें औरोंको समझाना तो और भी कठिन कार्य है। एक शास्त्र अपने अनुकूल प्रतिकूल बहुतसे शास्त्रोंसे गहराईसे जुड़ा होता है। फिर सबसे ऊपर अत्यन्त दुरूह लोकवृत्त, जिसे वे कभी भी आँखसे ओझल नहीं करते। आचार्य दण्डीका काव्यादर्श तो शास्त्र भी है और काव्य भी। अतः इसकी विषय वस्तुकी व्यापकताको परिसीमित कर पाना अत्यन्त कठिन कार्य। मेरे जैसे साधारण बुद्धि, साधारणतर ज्ञान और साधारणतम शक्ति वाले ब्राह्मण वटुका उसकी व्याख्या करके उसके प्रसादनका प्रयास महासाहसका कार्य या, दुःसाहसिक अभियान ! मैं अपने इस लक्ष्यमें कहाँ तक सफल हुआ हूँ, यह तो विज्ञ जन जानेंगे। मैंने तो अपनी शक्तिभर श्रम करके काव्यादर्शके दुरूह मर्म तक पहुँचनेकी चेष्टा करके अपना जन्म कृतार्थ मान लिया है। जिन दिनों यह कार्य चल रहा था, उन दिनों में नित्य गङ्गास्नानकी पावनता अनुभव करता था। प्रसादिनीके तीनों परिच्छेदोंके अन्तमें संलग्न सन्दर्भग्रन्थसूचीसे पाठकोंको यह समझना कठिन नहीं होगा कि काव्यादर्शके मर्मोद्घाटनमें संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्, शिक्षा (प्रातिशाख्य), कल्प (श्रौत सूत्र), छन्द, निरुक्त, व्याकरण, कोष, दर्शनशास्त्रकी आस्तिक नास्तिक कई शाखाओं, पुराण, इति- हास (महाभारत), कामसूत्र, गद्य-पद्य-नाटक काव्य, काव्यशास्त्रकी भरतसे प्रारब्ध शोभाकर मित्रान्त लम्बी परम्परा तथा बादके भी कई आचार्यों, इनके टीकाकारों, आधुनिक लेखकों, इतिहास ग्रन्थों, भू-भौतिकी, सङ्गीतशास्त्र आदि ज्ञानकी नाना शाखा-प्रशाखाओंका सहारा लेना आवश्यक हुआ है। अपनी तरफसे कोई कोशिश छोड़ी नहीं है। ग्रन्थका मुद्रण शुद्ध हो, इसका यथासम्भव प्रयास किया है। तथापि मानवसुलभ त्रुटियों, अकेले लेखन, प्रूफशोधन आदि समस्त कार्यभारके वहन की व्यस्तता-व्यग्रता, प्रेसके प्रमाद आदि विविध कारणोंसे यत्रतत्र अशुद्धियाँ रह गई हैं। कृपालु पाठकोंको सुबोध होनेसे उनके शुद्धिपत्रकी आवश्यकता नहीं समझी है।
१. न तज्ज्ञानं, न तच्छिल्पं, न सा विद्या, न सा कला। नासौ योगो, न तत् कर्म नाट्यॆऽस्मिन् यन्न दृश्यते ॥ नाट्यशास्त्र १।११६
(१२) काव्यादर्श [भूमिका ५. आभार—अन्तमें में अपने कार्यमें सब कृपालु उपकारक प्रिय मित्रों डॉ० सत्यदेव चौधरी, डॉ० रविशङ्कर नागर, डॉ० योगेश दत्त शास्त्री, डॉ० शत्रुघ्न शुक्ल, डॉ० जगदीशचन्द्र मूना (निदेशक, हिन्दी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, माडल टाउन), दिवङ्गत विभूति डॉ० भोलानाथ तिवारी तथा अपने किरोड़ीमल महाविद्यालयमें विषयान्तरके सहयोगियों श्री गुम्मा जानकीरामराव, तथा डॉ० गिरीशचन्द्रका अत्यन्त आभारी हूँ । प्रिय सहधर्मिणी श्रीमती कुसुम शर्माके मौन किन्तु सर्वाधिक उपयोगी सहयोगका तो आभार प्रकट कर पाना सम्भव ही नहीं है। परिमल पब्लिकेशंस् २७/२८, शक्तिनगर, दिल्ली, के स्वामी आयुष्मान् श्री कन्हैयालाल जोशीका तथा मुद्रक नवीन प्रिन्टर्स, ई-१५०, कृष्णविहार दिल्ली, के स्वामी श्रीभगवान्दास यादवका भी अत्यन्त कृतज्ञ हूँ । (निवेदन) वृषं जिगमिषावर्के सोमवारे निशामुखे । ऋष्याश्रमखनेत्राख्ये २०४७ सुभानौ वैक्रमेऽब्दके ॥ ज्येष्ठे कृष्णे चतुर्थ्यां च मईदिने चतुर्दशे । नभोऽङ्काङ्कभूवर्षे १९९० ईसवीयेऽक्षि-बाणके ॥ गतेऽब्दे वयसः प्रीत्या गुरूणां कृपया मयि । पूर्वेषामाशिषां राश्या पुण्यैः समुदितैर्मम ॥ शाब्द्येषा ग्रथिता स्रग्वै दण्डि-हार्द-प्रसादिनी । सम्पूर्णाऽर्थच्छटाशुभ्रा शास्त्र-चर्चा-सुगन्धिनी ॥ ध्यात्वा पादयुगे गौर्यास्तदङ्क-भूषि-तुन्दिनः । अर्प्यते श्रद्धया तत्र विधाय मौलिनाऽञ्जलिम् ॥ शिवनारायणः शास्त्री समभ्यर्थयते बुधान् । अशेष-स्नेहतः शेषा कण्ठे यत् क्रियतामियम् ॥ अलं प्रार्थनया वाऽस्तु गुणगृह्या विपश्चितः । गुणानस्यां लभेरंश्चेत् स्वयं कुर्युहि मस्तके ॥ दूराद् गन्धमुपाघ्राय वने क्षुप-समावृतम् । अपि पुष्पं स्तुवन्तो वै चञ्चरीका मधु-व्रताः ॥ ई ४/२५, माडल टाउन, —शिवनारायणः शास्त्री । दिल्ली—११०००६ ।
१. प्रथम परिच्छेद: काव्य-लक्षण, भाषा-भेद एवं वैदर्भी-गौड़ी मार्ग (दश गुण)
विषयानुक्रमणी समर्पणम्—पृष्ठ (३); मङ्गलम् (४); भूमिका (५-१२)—मंगलाचरण (५), १. टीकालेखनमें निमित्त, २. तृतीय परिच्छेदका नाम, ३. विषय-विवेचन—(क) सिंहावलोकन (३), (ख) तृतीय परिच्छेद (७); (१) यमक, (क) लक्षण, (ख) भेदविकल्पनके आधार, (२) आकार चित्र बन्ध, (३) वर्ण-नियमवान् चित्रबन्ध (८), (४) प्रहेलिका, (५) दोष, वर्गीकरण (६), ४. प्रसादिनीके बारेमें कुछ (१०); ५. आभार (१२), निवेदन । 'दुष्कर' नामक तृतीय परिच्छेद (अ) शब्दालङ्कार १. यमक (श्लोक १-७७) पृष्ठ १-६४—लक्षण (१) १-३; भेद (१-३)· ३-७; अन्य आचार्योंके मतमें ७-१६; उदाहरण (४-७७) १६-६४— (क) सुकर १ आदियमक (४-३७) १६-४७ : १. अव्यपेत (४-१८) १६-३० : क. एकपादवर्ती (४-७) १६-२१ : १ प्रथमपादादि (४) १६, २ द्वितीयपादादि (५) २०, ३ तृतीयपादादि (६) २१, ४ चतुर्थपादादि (७) २१, ख. द्विपादवर्ती (८-१३) २२-२६ : १ प्रथम-द्वितीयपादादि (८) २२, २ प्रथम-तृतीयपादादि (६) २३, ३ प्रथम- चतुर्थपादादि (१०) २३, ४ द्वितीय-तृतीयपादादि (११) २४, ५ द्वितीय- चतुर्थपादादि (१२) २५, ६ तृतीयचतुर्थपादादि (१३) २६; ग. त्रिपादवर्ती (१४-१७) २६-२६ : १ प्रथमद्वितीयतृतीयपादादि (१४) २६, २ प्रथम- द्वितीय-चतुर्थपादादि (१५) २७, ३ प्रथमतृतीय-चतुर्थ-पादादि (१६) २८, ४ द्वितीय-तृतीय-चतुर्थ-पादादि (१७) २६; घ. चतुष्पादवर्ती (१८) ३०; २. व्यपेत (१६-३३) ३०-४३ : ख. द्विपादवर्ती (२०-२५) ३१-३६ : १ प्रथम-द्वितीय-पादादि (२०) ३१; 'एणदृश्' की व्याख्या, २ प्रथम-तृतीय- पादादि (२१) ३२, ३ प्रथम-चतुर्थ पादादि (२२), मोरनियोंका वर्णन
(१४) काव्यादर्श उतना अच्छा नहीं लगता ३३, ४ द्वितीय-तृतीय-पादादि (२३), ५ द्वितीय- चतुर्थ-पादादि (२४) ३४, ६ तृतीय-चतुर्थ-पादादि (२५), वराहवर्णनका ऐतिहासिक सन्दर्भ ३५, डॉ० कृष्णकुमारके मतका खण्डन ३६; ग. त्रि-पाद- वर्ती (२६-२८) ३६-३८ : प्रथम-द्वितीय-तृतीय-पादादि (२६) ३६, २. प्रथम-तृतीय-चतुर्थ-पादादि (२७) ३७; ३ द्वितीय-तृतीय-चतुर्थ-पादादि (२८) ३८; घ. चतुष्पादवर्ती (२६-३२) ३६-४२ : १ एकजातीय (२६) ३६, व्याख्याभेद, २ अर्धसम (३०) ४०, 'अन्वीतम्' की व्याख्या ४१, ३ विषम (३१), ४ व्यत्यस्त (३२) ४२; व्यपेत भेदके उदाहरणोंका विश्लेषण (३३) ४३; ३. अव्यपेत-व्यपेत यमक (३३-३६) ४३-४६ : घ. चतुष्पाद १ अर्ध- सम (३४) ४३, 'साल' पर विचार ४४, २ व्यत्यस्त (३५) ४५, ३ सजा- तीय (३६) ४६, व्याख्याभेदपर विचार ४७, 'निशा' पर टिप्पणी; १. आदियमकके उदाहरणों का विश्लेषण (३७-३८) ४७-४८; (ख) दुष्कर यमक (३६-७७) ४८-६४ : १. अव्यपेत-व्यपेत घ. चतु- ष्पाद २. मध्यवर्ती सजातीय यमक (३६) ४८, २. (२) व्यपेत घ. चतुष्पाद २ मध्यवर्ती सजातीय यमक (४०) ४६, ३. व्यपेत सजातीय चतुष्पादान्त यमक (४१), ४. अव्यपेत-व्यपेतात्मक सजातीय चतुष्पादान्त यमक (४२) ५०, रत्नश्रीज्ञान और तरुणवाचस्पतिसे मतभेद, 'सन्नतेनते' पर टिप्पणी ५१, ५. व्यपेत चतुष्पाद-मध्यान्तगत सजातीय यमक (४३), ६. अव्यपेत चतुष्पादाद्यन्तगत सजातीय (४४), मतभेदपर विचार ५३, पाठभेदमें यमक- भेद ५४, ७. व्यपेत चतुष्पाद अर्धसम सजातीय आदि-मध्ययमक (४५), पाठ- भेदसे यमकभेद तथा व्याख्याभेद ५५, ८. अव्यपेत-व्यपेत चतुष्पादाद्यन्तवर्ती सजातीय यमक (४६) ५६, व्याख्याभेद ६. अव्यपेत-व्यपेत चतुष्पादाद्यन्तगत सजातीय यमकका दूसरा प्रकार (४७) ५७, १०. पादाद्यन्त तथा अन्तादि चतुष्पादअव्यपेत-व्यपेत सजातीय यमक (४८) ५८, ११ व्यपेत चतुष्पादादि मध्यान्त तथा अव्यपेत चतुष्पादान्तादि सजातीय सङ्कीर्ण यमक (४६) ५६, प्राचीन टीकाकारोंसे मतभेद ६०, १२ आदि-मध्यान्तवर्ती चतुष्पाद अव्यपेत- व्यपेत त्रिस्थान यमक (५०) ६१, 'काल-काल'का ऐतिहासिक महत्त्व ६२; यमकके अन्य विशिष्ट भेद—(१) संदष्ट यमक : (५१) ६३, इतिहास, उदाहरण (५२) ६५, टीकाओंसे मतभेद ६६;
विषयानुक्रमणी (१५) (२) समुद्ग : लक्षण तथा भेद (५३) ६६, इतिहास ६७, उदाहरण : १ प्रथम-तृतीय और द्वितीय-चतुर्थ-पादावृत्ति व्यपेत (५४), ६७, २ प्रथम- द्वितीय-तृतीय-चतुर्थ-पादवर्ती अर्धसम अव्यपेत (५५) ६८, रुद्रटकी व्यवस्था ६६; ३ प्रथम-चतुर्थ व्यपेत, द्वितीय-तृतीय अव्यपेत (५६) वादी और तरुणवाचस्पतिकी व्याख्या उचित नहीं है; (३) पादाम्यास : भेदोंका विवरण ७०, क. प्रथम पादाभ्यास : १ अन्य- पेत द्वितीयपादवर्ती (५७) ७१, २ तृतीयपादवर्ती व्यवहित (५८), मतभेद, ३ चतुर्थपादवर्ती व्यवहित (५६) ७२, ख. द्वितीय पादाभ्यास : ४ अव्यवहित (६०) ७३, उदाहरणमें वर्णित घटनाओंका क्रम उचित नहीं है, ५ व्यवहित (६१) ७४, ग. तृतीय-पादाभ्यास : ६ अव्यपेत (६२) ७४, क. प्रथम-पादा- भ्यास : ७ द्वितीय-तृतीय-पादावृत्त अव्यपेत (६३) ७५, ८ द्वितीय-चतुर्थपादा- वृत्त अव्यवहित व्यवहित (६४) ७६, पाठपर मतभेद, ख. द्विपादाभ्यास : ६ द्वितीय पादका अव्यपेत यमक (६५) ७७, ग. त्रिपादाभ्यास : १० प्रथम पादका अव्यपेत (६६) ७८, पादाभ्यास यमकका उपसंहार (६७) ७८; (४) श्लोकाभ्यास यमक (६७-६८) ७६; (५) महायमक—त्रिपादाभ्यास यमकका विशिष्ट भेद है (७०) ८०, महायमकके दो प्रकार ८१, काव्योंमें प्रथम प्रकारका इक्का-दुक्का प्रयोग मिलता है, द्वितीय प्रकार सुलभ नहीं है; अन्य आचार्योंके मतमें, आवृत्ति-गर्भित महायमक (७१) ८२; (६) यमक-सङ्कर (७२) ८३, (७) प्रतिलोम : लक्षण (७३) ८५, भेद, प्रतिलोम यमकका इतिहास— भारवि माघ और भट्टिके प्रयोग तथा अन्य आचार्योंके मतमें प्रतिलोम यमक, उदाहरण : (क) पादप्रतिलोम (७४) ६०, ख. श्लोकार्धप्रतिलोम (७५) ६१, ग. श्लोकप्रतिलोम (७६-७७) ६४; टीकाकारके मङ्गल-श्लोक । टीकाकारके मङ्गल श्लोक ६५; २. चित्रबन्ध (७८-८३) ६६-१०२—'चित्र' का अर्थ ६६, (१) गोमूतिका दुष्कर बन्ध : लक्षण (७८) ६७, उदाहरण (७६) ६८, (२) अर्ध-भ्रम तथा (३) सर्वतोभद्र चित्रबन्ध : लक्षण (८०) ६६, उदाहरण (२) अर्धभ्रम (८१) १००, डॉ० धर्मेन्द्रकुमारकी कल्पना उचित नहीं है १०१, (३) सर्वतोभद्र (८२), यहाँ व्यपेत पादाद्यन्त प्रतिलोम तथा अव्यपेत पादमध्य प्रतिलोम यमक तथा दीर्घाक्षर नियम अङ्ग हैं :
( १६ ) काव्यादर्श ३. वर्णनियमवान् चित्र बन्ध (८३-६५) १०२-११८ : भेद (८२) १०२ ; (१) स्वरनियमवान् (८४-८७) १०५-११० : (१) स्वरचतुष्टयनियम (८४) १०५, (२) स्वरत्रितयनियम (८५) १०७, (३) दो स्वरोंके नियम वाला चित्रबन्ध (८६) १०६, (४) एकस्वरनियम (८७) ११०, (२) वर्णस्थाननियमवान् (८८-६५) ११०-११८ : (१) चतुःस्थानवर्णनियमवान् (८८) ११०, (२) त्रिस्थान-वर्णनियम- वान् (८६) १११, (३) द्विस्थानवर्णनियमवान् (६०) ११२, यहाँ स्वर- स्थाननियम और व्यञ्जनस्थाननियम भिन्न हैं ११३, (४) एकस्थानवर्ण- नियमवान् (६१) ११४, (३.१) त्रिविधपञ्चस्वरस्थान वर्णनियम चित्रबन्ध (६२) ११५, यह उदाहरण बहुत कलापूर्ण है ११६, (३.२) त्रिवर्णनियमवान् (६३), कथाका स्रोत श्रीमद्भागवत है ११७; (३.३) द्विव्यञ्जननियम (६४) ११८, (३.४) एकव्यञ्जननियम (६५); दुष्कर एवं सुकर मार्गका उपसंहार (६६) ११६; टीकाकारके मङ्गल श्लोक १२० । टीकाकारके मङ्गल श्लोक १२०; ४. प्रहेलिका (६७-१२४) १२१-१५० — व्युत्पत्ति तथा इतिहास : १२१, प्रहेलिकाओंकी उपयोगिता (६७) १२२, लक्षण : (१) समागता, (६८), १२५; (२), वञ्चिता (३) व्युत्क्रान्ता (६६) १२६, (४) प्रमुषिता, (५) समानरूपा (१००), (६) परुषा १२७, (७) सङ्ख्याता (१०१), (८) प्रकल्पिता, (६) नामान्तरिता (१०२), इन दोनोंमें भेद १२८, (१०) निभृता, 'तुल्य-धर्म-स्पृशा'का व्याख्याभेद, (११) समान-शब्दा १०३) १२६, (१२) सम्मूढा १३०, (१३) पारिहारिकी (१०४) १३१, (१४) एकच्छन्ना, (१५) उभयच्छन्ना (१०५) १३२, (१६) सङ्कीर्णा; प्रहेलिकाओंका उपसंहार (१०६); दुष्ट प्रहेलिकाएँ (१०७) १३३; प्रहेलिकाओंका इतिहास १३५; प्रहेलिकाओंके उदाहरण (१०८-१२४) १३८-१५१ : (१) समागता (१०८) १३८, भोजके मतमें यह सम्बन्धगूढ बन्ध है, (२) वञ्चिता (१०६)
विषयानुक्रमणी (१७) १३६, (३) व्युत्क्रान्ता (११०), (४) प्रमुषिता (१११) १४०, (५) समान- रूपा (११२) १४१, (६) परुषा (११३) १४२, (७) सङ्ख्याता (११४) १४३, 'नासिक्यमध्या' के तात्पर्यपर विचार, (८) प्रकल्पिता (११५) १४४, (९) नामान्तरिता (११६), (१०) निभृता (११७) १४५, व्याख्यापर मत- भेद, (११) समानशब्दा (११८) १४६, (१२) सम्मूढा (११६), (१३) पारिहारिकी (१२०) १४७, श्लोकोक्त कथाका सन्दर्भ १४८, (१४) एक- च्छन्ना (१२१) १४६, (१५) उभयच्छन्ना (१२२) १४६, (१६) सङ्कीर्णा (१२३) १५०, सङ्कीर्ण प्रहेलिकाकी सङ्गति (१२४), रत्नश्रीज्ञानके सुझाए सङ्कीर्ण भेद १५१; अन्य संस्करणोंमें उपलब्ध पाठपर विचार १५१; टीकाकारके मङ्गल श्लोक १५२; टीकाकारके मङ्गलश्लोक १५२; (आ) दोष भेद (१२५-१२६) १५२, भरतसम्मत काव्यदोषोंसे दण्डीके दोषोंकी तुलना १५३, अभिनवगुप्तका विचार १५४; प्रतिज्ञाहानि दोषपर विचार आवश्यक नहीं है (१२७) १५५, इसका समावेश भरतके न्यायापेतमें हो सकता है, भामहके दोषनिरूपणसे तुलना १५६, भामहने दण्डीका विरोध किया है; (१) अपार्थ (१२८) १५७, भरत और भामहका अपार्थ, रत्नश्रीज्ञानकी व्याख्या १५८, दण्डीका कथन उपलक्षक है, दण्डीके अनुसार अपार्थ अनित्य दोष है, भामहने समुदायार्थशून्यताकी ग्राह्यतापर विचार नहीं किया है १५६, उदाहरण (१२६), सङ्गति (१३०); (२) व्यर्थ (१३१), भरतका भिन्नार्थ इससे मिलता-जुलता दोष है १६०, भामहका व्यर्थ, व्यर्थका दण्डीका उदाहरण (१३२) १६१; व्यर्थ अनित्य दोष है (१३३), व्यर्थकी निर्दोषताका उदाहरण (१३४) भावका प्रेरणास्रोत १६२, लोचनोद्धृत श्लोकके स्थलपर विचार; (३) एकार्थता : लक्षण तथा भेद (१३५) १६३, उदाहरण (१३६) १६४, एकार्थता अनित्य दोष है (१३७), एकार्थकी अलङ्कारताका उदाहरण (१३८) १६५, अन्य आचार्योंके मतमें एकार्थ १६६;
(१८) काव्यादर्श (४) ससंशय (१३६) १६८, भरतके भिन्नार्थकी व्याख्यासे यह दोष निकल सकता है, भामहके मतमें १६६, उदाहरण (१४०), ससंशय अनित्य दोष है (१४१) १७०, अलङ्कारताका उदाहरण (१४२) १७१, सङ्गति (१४३), समान भाव शाकुन्तलमें, भामहका ससंशय १७२; (५) अपक्रम (१४४), १७२, उदाहरण (१४५), अपक्रम अनित्य दोष है (१४६) १७३, उदाहरण (१४७), भामहसम्मत ससंशय १७४; (६) शब्दहीन (१४८) १७५, उदाहरण (१४६) १७७, व्याकरण- नियमके उल्लङ्घनमें भी निर्दोषताका उदाहरण (१५०) १७८, रत्नश्रीज्ञान का मत उचित नहीं है, शास्त्रोल्लङ्घनमें भी दोषाभावताकी सङ्गति (१५१) १७६, भरत और भामहसम्मत शब्दहीन; (७) यतिच्छेद (१५२) १८०, यतिका स्वरूप १८१, यतिभ्रष्टका उदा- हरण (१५३) १८३, उचित यतिका उदाहरण (१५३) १८४, पदमध्यमें विरामके अदोषत्वकी सङ्गति (१५४), कर्णकटु पदमध्यविराम वर्जनीय है (१५५) १८६, भरतने यतिभ्रष्टको 'विषमवृत्त' दोषमें समाहित किया है, प्राचीन दृष्टि १८७, भामहका यतिभ्रष्ट दण्डीके यतिभ्रष्टसे भिन्न है १८८, निष्कर्ष; (८) भिन्न-वृत्त (१५६) १८८, छन्दमें अपेक्षित तीन बातें—(क) अक्षरोंकी नियत संख्या १८६, (ख) लघु गुरु-विन्यास १६०, (ग) यति, (क. i) पादमें अक्षरकी न्यूनतासे भिन्नवृत्तताका उदाहरण (१५७), (ii) अक्षरकी अधिकतासे भिन्नवृत्तताका उदाहरण (१५७), (ख i) लघुके स्थानमें गुरुके प्रयोगसे भिन्नवृत्तताका उदाहरण (१५८) १६१, (ii) गुरुके स्थानमें लघुके प्रयोगसे भिन्नवृत्तताका उदाहरण (१५८), मतभेद; भरतने इसे 'विषम' नामसे दिया है १६२, भामहका 'भिन्नवृत्त'; (६) विसन्धि (१५६) १६३, (क) उदाहरण (१६०), पाठभेद १६४, (ख) निर्दोष विच्छेदके उदाहरण (१६१), भरतसम्मत विसन्धि १६५, अभि- नवगुप्तसम्मत सन्धिके तीन प्रकार, पाठपर विचार (पादटिप्पणी १), भामह का मत १६६, वामनका मत, परवर्ती आचार्यों द्वारा समन्वयका प्रयास; (१०) देशादिविरोध दोषके आधार देशादिके भेद (१६२-१६३) १६७- २००, इस दोषका मूल भरतके 'न्यायापेत'में है, काव्यके छह प्रमेयोंका दण्ड्युक्त स्वरूप : (क) देश, (ख) काल, (ग) कला (१६२) १६७, (घ) लोक, (ङ) न्याय, (च) आगम (१६३) १६६, इस दोषका लक्षण (१६४) २००, भामह और वामनके मत;
विषयानुक्रमणी (१६) (क) देशविरोध (१६५-१६६) २०१ : (अ) अद्रिविरोध (१६५) २०१, (आ) वन-विरोध, (इ) राष्ट्र-विरोध दो तरहसे (१६६) २०२, भामहके मतमें देशविरोध २०३; (ख) काल-विरोध (१६७-१६८॥) २०३-२०४ : (अ) रात्रिविरोध (१६७) २०३, (आ) दिनविरोध, (इ) ऋतुविरोध (१६७-१६८) २०४, काल-विरोधका उपसंहार (१६६), निर्दोषता २०५; (ग) कलाविरोध (१६६-१७१) २०५-२०६ : (i) नाट्यकलाविरोध (१७०) २०५, (ii) सङ्गीतकलाविरोध २०६, 'भिन्न-ग्राम' का अर्थ, 'भिन्न- मार्ग' पाठ उचित नहीं है २०७, कलाविरोधका उपसंहार (१७१) २०८, 'कला-परिच्छेद' का तात्पर्य, भामहके मतमें कला-विरोध २०६; (घ) लोक-विरोध (१७२-१७३) २१० : (i) वन्य पशुविरोध, (ii) ग्राम्य पशुविरोध, (iii) ग्राम्यवृक्ष, (v) वन्य वृक्ष विरोध, भामहके मतमें २११; (ङ) न्याय-विरोध (१७३-१७६) २११-२१३ : (अ) नास्तिक न्यायविरोध (१७४), (आ) आस्तिक न्याय-विरोध (१७५), यह नित्य दोष है (१७६) २८३, भामहके मतमें न्याय-विरोध; (च) आगम-विरोध (१७६-१७८) २१४-२१५ : (i) श्रुति-विरोध (१७७), दो आशय, (ii) स्मृति-विरोध (१७८) २१५, भामहका मत २१६; कविका कौशल दोषको भी गुण बना देता है (१७९-१८५) २१६ २२६— (१० क) देशविरोध (१८०) २१७, (ख) कालविरोध (१८१), (ग) कलाविरोध (१८२) २१८, (घ) लोकविरोध (१८३) २१६, (ङ) न्याय- विरोध (१८४) २२०, (च) आगमविरोध (१८५); दोषसमाप्ति मङ्गला- चरण २२२; दोषेतिहास मङ्गलाचरण २२२; दोषोंका इतिहास २२०; निष्कर्ष २२६, मङ्गलाचरण; तृतीय परिच्छेदका उपसंहार (१८६) २३०, तृतीय परिच्छेदकी फल-श्रुति (१८७), डॉ० जयशङ्कर त्रिपाठीके मतका खण्डन २३२;
(२०) काव्यादर्श टीकाकी समाप्तिकी तिथि २३२; काव्यादर्श-प्रशंसा २३३, दण्ड्याचार्यस्तुति, टीकाकारका परिचय, वृत्ति तथा रचनाओंका परिगणन २३४, परिशिष्ट—१. तृतीय-परिच्छेदकी श्लोक-सूची २३५, २. प्रसादिनी- मङ्गलश्लोक-सूची २३८, ३. सन्दर्भ-ग्रन्थ-सूची २४० । शुद्धिपत्र १. पृष्ठ १४६, श्लोक १२२ : केन कः सह सम्भूय २. पृष्ठ २०६, पादटिप्पणी ५ में जोड़ें : षड्ज-मध्यम-गान्धारास्त्रयो ग्रामाः प्रकीर्तिताः । भूर्लोकाज्जायते षड्जो भुवर्लोकाच्च मध्यमः ।। नारदीय शिक्षा १।२।६ स्वर्गान्नान्यत्र गान्धारो नारदस्य मतं यथा । ७ ३. पृष्ठ २०७, पादटिप्पणी २ में जोड़ें : स्वररागविशेषेण 'ग्रामराग' इति स्मृताः ।। नारदीय शिक्षा १।२।७ — ० — प्राप्य सरस्वती सुतं यदिदं सुपुत्रा पुण्यतमा धरा भवेच्च सदङ्कभूषा । भावमयं वपुस्त्वदीयं हृदये निधाय प्रार्थयते शिवस्त्वदा शिषमेष दण्डिन् ॥ सुभूमिकाविषयक्रमैर्बुधां वचसां परीअणैः सुकवेर्गभीरभावगुहाम् । प्रविश्य भावमणिप्रसादनैर्विबुधां शुभाशिषो दधती प्रसादिनी जयतात् ॥ व्याख्याता विबुधैः सद्भिर्बहुधाऽयं तु दण्डिनः । ग्रन्थस्तथाऽपि वैशिष्ट्यं प्रसादिन्या विलोक्यताम् ॥
॥ श्रीदण्डाचार्यविरचितः ॥ काव्यादर्शः 'दुष्कर' नामक तृतीय परिच्छेद (१ यमकका लक्षण तथा भेद) अव्यपेत-व्यपेतात्मा व्यावॄत्तिर्वर्णसंहतेः । यमकम्; वर्णसमुदायकी अव्यवहित और व्यवहित स्वरूप वाली विशिष्ट आवृत्ति 'यमक' होती है । प्रसादिनी चित्रं विचित्रसम्भारं जगच्चित्रं वितन्वती । गुणाढ्या मे महादेवी शिवस्य भावयेच्छिवम् ॥ १ ॥ सत्त्वाहिते तु चैतन्ये विष्णुपत्नी त्रिवर्गदा । रजोमुख्ये च तत्रेयं वाग्देवी सृष्टिकारणम् ॥ २ ॥ तमःप्रधानचैतन्या दुर्गेयं भक्तरक्षिणी । नाशिनी दुष्टवर्गस्य; भव्यं मे भावयन्त्विमाः ॥ ३ ॥ कृत्वा नखमणीन्स्वान्ते शुचिकान्तांस्तमोऽपहान् । बुधैश्च विबुधैश्चैव नित्यं भक्त्यानुराधितान् ॥ ४ ॥ शुचौ शुचौ रवौ पुष्ये द्वितीयेप्से कलानिधौ । प्रातरन्त्यपरिच्छेदव्याख्यानं प्रारभे शिवः ॥ ५ ॥ आचार्य दण्डीने द्वितीय परिच्छेदमें अर्थालङ्कारोंके निरूपणके बाद तृतीय परिच्छेदमें (१) काव्यशरीरकी शोभा शब्दके माध्यमसे सम्पन्न करने वाले शब्दालङ्कारोंका तथा (२) उसकी शब्दार्थोभयगत शोभाकी प्राप्तिमें व्याघात करने वाले दोषोंका निरूपण किया है ।
२ काव्यादर्श [३१
शब्दके माध्यमसे शोभा शब्दोंकी पच्चीकारीसे निष्पादित की जाती है । इस पच्चीकारीके दो प्रकार मुख्य हैं : (क) अनुप्रास और (ख) यमक । दोनोंमें शब्दके घटक वर्णोंकी आवृत्ति होती है । (क) जब यह आवृत्ति सामान्य होती है, एकाध वर्ण तक सीमित रहती है, या एक ही वर्णकी आवृत्ति न होकर नाना वर्णोंकी उनके उच्चारणके स्थान, प्रयत्न, मात्रा आदिकी समानताके रूपमें होती है, तब अनु अनुगामी या अनुकूल रूपमें शोभाकारक होनेसे प्र प्रकृष्ट रूपमें √अस् रखनेके कारण अनु+प्र+√ अस्+घञ् योग से 'अनुप्रास' कहलाती है । ह्रस्व, दीर्घ, प्लुतात्मक स्वरकी शोभाधायकता¹ छन्दके माध्यमसे अधिक होती है, अनुप्रासकी दृष्टिसे कम । इस लिये काव्यशास्त्रके आचार्योंने शब्दमें शोभाका आधान करने वाले अलङ्कारोंमें स्वरसाम्य, या स्वरोंकी आवृत्तिको अधिक महत्त्व नहीं दिया है । इस दृष्टिसे व्यञ्जनके साम्य और आवृत्तिपर ही अधिक ध्यान दिया गया है । अतः 'वर्ण'के 'स्वर' और 'व्यञ्जन' दो भेद होते हुए भी 'वर्ण' शब्द भरत आदिके द्वारा 'व्यञ्जन'के लिये अधिक प्रयुक्त हुआ है । स्वतन्त्र या वर्णारूढ स्वरोंके लिये तो 'अक्षर' सञ्ज्ञाका प्रयोग हुआ है ।² भरतने काव्यबन्धोंमें उदार एवं मधुर शब्दोंका प्रयोग आवश्यक बताया है ।³ शब्दोंमें माधुर्य समान ललित वर्णोंके न्याससे ही सम्भव है । भरतके अनुसार काव्यको मृदु एवं ललित पदोंसे भरपूर होना चाहिये ।⁴ पदोंमें मृदुता कोमल वर्णोंके अधिक प्रयोगसे आती है, और लालित्य समान वर्णोंके विन्यास से, अर्थात् अनुप्राससे । आचार्य दण्डी इसे प्रथम परिच्छेदके गुण-प्रकरणमें विस्तरेण बता चुके हैं । अनुप्रासका भी भरपूर विवेचन हम वहाँ (पृष्ठ १२४-१२७में) कर चुके हैं । भरतने अनुप्रासका निरूपण पृथक्से नहीं किया है । उन्होंने यमकको पर्याप्त विस्तारसे दिया है । १. ह्रस्वदीर्घप्लुतानीह यथाभावं यथारसम् । काव्ययोगेष्वक्षराणि यथाशोभं निवेशयेत् ।। नाट्य० १६।१२० २. एकमात्रं भवेद्ध्रस्वं, द्विमात्रं दीर्घमिष्यते । प्लुतं चैव त्रिमात्रं स्यादक्षरं वर्णसंश्रयम् ।। नाट्य० १६।११७ ३. ये बन्धाः पूर्वमुद्दिष्टा विषमार्थसमासमाः । उदारमधुरैः शब्दैः कार्यास्ते स्यु रसानुगाः ।। नाट्य० १६।१२१ ४. मृदुललितपदाढ्यं गूढशब्दार्थहीनं ⋯भवति जगति योग्यं नाटकं प्रेक्षकाणाम् । १६।१२४
३।१] १ यमकका लक्षण ३ यमक : लक्षण—यमकका शास्त्रीय निरूपण सर्वप्रथम भरतके नाट्य- शास्त्रमें मिलता है : शब्दका अभ्यास तो यमक होता है ।¹ यहाँ 'तो' पूर्वानु- वृत्त अर्थालङ्कारोंसे भेद दिखाता है कि यमक अर्थालङ्कारोंसे भिन्न शब्दा- लङ्कार है । 'शब्द' 'अर्थवान् वर्णसमुदाय' होता है, जो विभक्तिप्रत्यय लगने पर 'पद' कहलाता है । अतः वह भी 'शब्द' है । पदसमुदाय 'वाक्य' कह- लाता है । अतः वह भी 'शब्द' है । यह 'शब्द' वर्णोंसे घटित होता है । अतः अभिनवगुप्तके अनुसार 'वर्ण' भी 'शब्द' है । इस प्रकार भरतके 'शब्द' में वर्णसे लेकर पदसमुदायात्मक वाक्य तक समाविष्ट हैं ।² 'अभ्यास' आवृत्तिको कहते हैं । 'यमक' शब्द 'यम' (जुड़वाँ) से स्वार्थे 'क' प्रत्ययसे निष्पन्न है ।³ इस प्रकार एक वर्णकी आवृत्तिसे लेकर शब्द पद और वाक्यकी आवृत्ति 'यमक'के रूपमें अभिप्रेत है । इससे स्पष्ट होता है कि भरत अनुप्रास की अलगसे सत्ता नहीं मानते । अनुप्रासकी सर्वप्रथम चर्चा दण्डी और भामह के ग्रन्थोंमें उपलब्ध होती है । भामहमें दण्डीकी अपेक्षा विकसित रूपमें उप- लब्ध होती है । भामहके अनुप्रासविवरणको और आगे बढ़ाया है उद्भटने । दण्डीने भरतके 'शब्दाभ्यास'को दो भेदोंमें बाँटा है : (क) वर्णरूप शब्द की आवृत्तिमें 'अनुप्रास' होता है और (ख) वर्णसमुदायकी आवृत्तिमें यमक ।⁴ दण्डीके अनुप्रासके विवरण और बादके इतिहाससे विदित होता है कि अनुप्रासका आरम्भिक रूप वही है, जो बादमें 'वृत्त्यनुप्रास'के नामसे विकसित हुआ है । उसके अनन्तर 'श्रुत्यनुप्रास' अस्तित्वमें आया । भरतके 'शब्दाभ्यास'से दण्डीके उत्तरवर्ती लोगोंने शब्द और पदकी आवृत्तिसे भी अनुप्रासका एक अन्य प्रकार विकसित किया, जो 'लाटानुप्रास'के नामसे विदित हुआ । 'यमक'के अन्तर्गत जो समानार्थक (अभिन्नार्थक) शब्दोंका अभ्यास होता था, वह इस (लाटीय) अनुप्रासके नामसे विदित हुआ । बाकी जो बचा, वह 'यमक' रहा । अर्थात् (क) अभिन्नार्थक शब्दकी या (ख) निरर्थक शब्दकी (यानी शब्दके अवयव वर्णसमुदायकी) आवृत्ति होनेपर 'यमक' माना गया । १. शब्दाभ्यासस्तु यमकम्···। नाट्यशास्त्र० १६।५६ २. अभिनवभारती १६।५६ : तुरर्थालङ्कारेभ्यो व्यतिरेकमाह । 'शब्द'- शब्देन वाक्यं, पदं, तदेकदेशो वर्ण इति सर्वं गृह्यते । ३. यमकं यमजे, शब्दालङ्कारे, पुंसि संयमे । मेदिनीकोष १।१४२ ४. काव्यादर्श १।५५ : वर्णावृत्तिरनुप्रासः । ६१ : आवृत्तिमेव सङ्घात- गोचरां यमकं विदुः । 'विदुः'के कर्ताके रूपमें दण्डीको भरत अभिप्रेत हैं ।
४ काव्यादर्श [३१ पर वह स्थिति दण्डीके पश्चात्की है। भरतके उदाहरणोंमें (१) भिन्नार्थक, (२) समानार्थक, तथा (३) निरर्थक, तीनों प्रकारके शब्दोंकी आवृत्ति उदाहरणोंमें उपलब्ध है : चक्रवालयमकके उदाहरणमें 'पुङ्गैः खगैः'में प्रथम 'खगैः' शब्दावयव होनेसे निरर्थक है, 'खगैः । खगैः' में दोनों भिन्नार्थक हैं। इसी प्रकार 'सञ्चिताश्चिताः' में समानार्थक शब्दका तात्पर्यभेदसे प्रयोग है। 'चिताश्चिता' में भिन्नार्थता है। इसी प्रकार चतुर्व्यवसित यमकके उदाहरण (१६।८२) में भी 'वारण' शब्दसे 'वारण' नामक पुष्प, हस्ती, वारणक्रियायुक्त शत्रु, भिन्न- भिन्न अर्थ प्रतीत होते हैं। चतुर्थ पादमें 'वारणानां' छेदसे और ही अर्थ अभिप्रेत है। इससे स्पष्ट है कि 'लाटानुप्रास'को भरत यमकसे पृथक् नहीं मानते । आचार्य दण्डीने भरतके यमकलक्षणको स्पष्ट किया है। प्रथम परिच्छेद में वर्णवृत्तिको 'अनुप्रास' कहा था, तो वर्णसङ्घातकी आवृत्तिको 'यमक'। यमकके बारेमें यह कथन भरतके यमकलक्षणका स्पष्टतर शब्दोंमें अनुवाद ही है। अब इसके उचित अवसरपर उन्होंने भरतके लक्षणसे तीन बातें विशेषकीं हैं : (१) भरतके 'शब्द'से पर्यवसित 'वर्णसमुदाय'का स्पष्टतया कथन किया; (२) 'अभ्यास'के पर्याय 'आवृत्ति'का प्रयोग करके उसमें 'वि'के योगसे 'विशिष्टता' और 'विविधता'को जोड़ा : शोभाकारक तथा विविध प्रकारके न्यासके रूपमें आवृत्ति = व्यावृत्ति; (३) इस व्यावृत्तिका एक विशेषण दिया, जो भरतने नहीं दिया था : अव्यपेत-व्यपेतात्मा। यमकके मूल भेद : 'अव्यपेत ०' में 'अव्यपेत' और 'व्यपेत'का समास है, जिसका विग्रह दो प्रकारसे हो सकता है :—(क१) न व्यपेतः = अव्यपेतः । स च (२) व्यपेतश्चेति अव्यपेत-व्यपेतौ (इतरे० द्वन्द्व) तौ आत्मानौ यस्य, सोऽव्यपेत-व्यपेतात्मा (बहु०)। अर्थात् जिसका स्वरूप (१) अव्यपेत है, और (२) व्यपेत है, इस तरह दो प्रकारका है, वह व्यावृत्ति । (ख) अव्यपेतश्च व्यपे- तञ्च, तयोः समाहार इत्यव्यपेतव्यपेतम्, तद् आत्मा यस्याः, सा । अर्थात् जिसका स्वरूप अव्यपेत और व्यपेतका समाहार (मिश्र) है, वह व्यावृत्ति । इस प्रकार यहाँ (१) अव्यपेतात्मक, (२) व्यपेतात्मक और (३) अव्यपेत- १. ‘शैला यथा शत्रुभिराहता हता हताश्च भूयोऽप्यनु पुङ्गैः खगैः । खगैश्च सर्वैर्युधि सञ्चिताश्चिताश्चिताऽधिरूढा निहतास्तलैस्तलैः ॥’ नाटय० १६।७४