काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविषयानुक्रमणी (१७) १३६, (३) व्युत्क्रान्ता (११०), (४) प्रमुषिता (१११) १४०, (५) समान- रूपा (११२) १४१, (६) परुषा (११३) १४२, (७) सङ्ख्याता (११४) १४३, 'नासिक्यमध्या' के तात्पर्यपर विचार, (८) प्रकल्पिता (११५) १४४, (९) नामान्तरिता (११६), (१०) निभृता (११७) १४५, व्याख्यापर मत- भेद, (११) समानशब्दा (११८) १४६, (१२) सम्मूढा (११६), (१३) पारिहारिकी (१२०) १४७, श्लोकोक्त कथाका सन्दर्भ १४८, (१४) एक- च्छन्ना (१२१) १४६, (१५) उभयच्छन्ना (१२२) १४६, (१६) सङ्कीर्णा (१२३) १५०, सङ्कीर्ण प्रहेलिकाकी सङ्गति (१२४), रत्नश्रीज्ञानके सुझाए सङ्कीर्ण भेद १५१; अन्य संस्करणोंमें उपलब्ध पाठपर विचार १५१; टीकाकारके मङ्गल श्लोक १५२; टीकाकारके मङ्गलश्लोक १५२; (आ) दोष भेद (१२५-१२६) १५२, भरतसम्मत काव्यदोषोंसे दण्डीके दोषोंकी तुलना १५३, अभिनवगुप्तका विचार १५४; प्रतिज्ञाहानि दोषपर विचार आवश्यक नहीं है (१२७) १५५, इसका समावेश भरतके न्यायापेतमें हो सकता है, भामहके दोषनिरूपणसे तुलना १५६, भामहने दण्डीका विरोध किया है; (१) अपार्थ (१२८) १५७, भरत और भामहका अपार्थ, रत्नश्रीज्ञानकी व्याख्या १५८, दण्डीका कथन उपलक्षक है, दण्डीके अनुसार अपार्थ अनित्य दोष है, भामहने समुदायार्थशून्यताकी ग्राह्यतापर विचार नहीं किया है १५६, उदाहरण (१२६), सङ्गति (१३०); (२) व्यर्थ (१३१), भरतका भिन्नार्थ इससे मिलता-जुलता दोष है १६०, भामहका व्यर्थ, व्यर्थका दण्डीका उदाहरण (१३२) १६१; व्यर्थ अनित्य दोष है (१३३), व्यर्थकी निर्दोषताका उदाहरण (१३४) भावका प्रेरणास्रोत १६२, लोचनोद्धृत श्लोकके स्थलपर विचार; (३) एकार्थता : लक्षण तथा भेद (१३५) १६३, उदाहरण (१३६) १६४, एकार्थता अनित्य दोष है (१३७), एकार्थकी अलङ्कारताका उदाहरण (१३८) १६५, अन्य आचार्योंके मतमें एकार्थ १६६;