भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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(१८) काव्यादर्श (४) ससंशय (१३६) १६८, भरतके भिन्नार्थकी व्याख्यासे यह दोष निकल सकता है, भामहके मतमें १६६, उदाहरण (१४०), ससंशय अनित्य दोष है (१४१) १७०, अलङ्कारताका उदाहरण (१४२) १७१, सङ्गति (१४३), समान भाव शाकुन्तलमें, भामहका ससंशय १७२; (५) अपक्रम (१४४), १७२, उदाहरण (१४५), अपक्रम अनित्य दोष है (१४६) १७३, उदाहरण (१४७), भामहसम्मत ससंशय १७४; (६) शब्दहीन (१४८) १७५, उदाहरण (१४६) १७७, व्याकरण- नियमके उल्लङ्घनमें भी निर्दोषताका उदाहरण (१५०) १७८, रत्नश्रीज्ञान का मत उचित नहीं है, शास्त्रोल्लङ्घनमें भी दोषाभावताकी सङ्गति (१५१) १७६, भरत और भामहसम्मत शब्दहीन; (७) यतिच्छेद (१५२) १८०, यतिका स्वरूप १८१, यतिभ्रष्टका उदा- हरण (१५३) १८३, उचित यतिका उदाहरण (१५३) १८४, पदमध्यमें विरामके अदोषत्वकी सङ्गति (१५४), कर्णकटु पदमध्यविराम वर्जनीय है (१५५) १८६, भरतने यतिभ्रष्टको 'विषमवृत्त' दोषमें समाहित किया है, प्राचीन दृष्टि १८७, भामहका यतिभ्रष्ट दण्डीके यतिभ्रष्टसे भिन्न है १८८, निष्कर्ष; (८) भिन्न-वृत्त (१५६) १८८, छन्दमें अपेक्षित तीन बातें—(क) अक्षरोंकी नियत संख्या १८६, (ख) लघु गुरु-विन्यास १६०, (ग) यति, (क. i) पादमें अक्षरकी न्यूनतासे भिन्नवृत्तताका उदाहरण (१५७), (ii) अक्षरकी अधिकतासे भिन्नवृत्तताका उदाहरण (१५७), (ख i) लघुके स्थानमें गुरुके प्रयोगसे भिन्नवृत्तताका उदाहरण (१५८) १६१, (ii) गुरुके स्थानमें लघुके प्रयोगसे भिन्नवृत्तताका उदाहरण (१५८), मतभेद; भरतने इसे 'विषम' नामसे दिया है १६२, भामहका 'भिन्नवृत्त'; (६) विसन्धि (१५६) १६३, (क) उदाहरण (१६०), पाठभेद १६४, (ख) निर्दोष विच्छेदके उदाहरण (१६१), भरतसम्मत विसन्धि १६५, अभि- नवगुप्तसम्मत सन्धिके तीन प्रकार, पाठपर विचार (पादटिप्पणी १), भामह का मत १६६, वामनका मत, परवर्ती आचार्यों द्वारा समन्वयका प्रयास; (१०) देशादिविरोध दोषके आधार देशादिके भेद (१६२-१६३) १६७- २००, इस दोषका मूल भरतके 'न्यायापेत'में है, काव्यके छह प्रमेयोंका दण्ड्युक्त स्वरूप : (क) देश, (ख) काल, (ग) कला (१६२) १६७, (घ) लोक, (ङ) न्याय, (च) आगम (१६३) १६६, इस दोषका लक्षण (१६४) २००, भामह और वामनके मत;