काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविषयानुक्रमणी (१६) (क) देशविरोध (१६५-१६६) २०१ : (अ) अद्रिविरोध (१६५) २०१, (आ) वन-विरोध, (इ) राष्ट्र-विरोध दो तरहसे (१६६) २०२, भामहके मतमें देशविरोध २०३; (ख) काल-विरोध (१६७-१६८॥) २०३-२०४ : (अ) रात्रिविरोध (१६७) २०३, (आ) दिनविरोध, (इ) ऋतुविरोध (१६७-१६८) २०४, काल-विरोधका उपसंहार (१६६), निर्दोषता २०५; (ग) कलाविरोध (१६६-१७१) २०५-२०६ : (i) नाट्यकलाविरोध (१७०) २०५, (ii) सङ्गीतकलाविरोध २०६, 'भिन्न-ग्राम' का अर्थ, 'भिन्न- मार्ग' पाठ उचित नहीं है २०७, कलाविरोधका उपसंहार (१७१) २०८, 'कला-परिच्छेद' का तात्पर्य, भामहके मतमें कला-विरोध २०६; (घ) लोक-विरोध (१७२-१७३) २१० : (i) वन्य पशुविरोध, (ii) ग्राम्य पशुविरोध, (iii) ग्राम्यवृक्ष, (v) वन्य वृक्ष विरोध, भामहके मतमें २११; (ङ) न्याय-विरोध (१७३-१७६) २११-२१३ : (अ) नास्तिक न्यायविरोध (१७४), (आ) आस्तिक न्याय-विरोध (१७५), यह नित्य दोष है (१७६) २८३, भामहके मतमें न्याय-विरोध; (च) आगम-विरोध (१७६-१७८) २१४-२१५ : (i) श्रुति-विरोध (१७७), दो आशय, (ii) स्मृति-विरोध (१७८) २१५, भामहका मत २१६; कविका कौशल दोषको भी गुण बना देता है (१७९-१८५) २१६ २२६— (१० क) देशविरोध (१८०) २१७, (ख) कालविरोध (१८१), (ग) कलाविरोध (१८२) २१८, (घ) लोकविरोध (१८३) २१६, (ङ) न्याय- विरोध (१८४) २२०, (च) आगमविरोध (१८५); दोषसमाप्ति मङ्गला- चरण २२२; दोषेतिहास मङ्गलाचरण २२२; दोषोंका इतिहास २२०; निष्कर्ष २२६, मङ्गलाचरण; तृतीय परिच्छेदका उपसंहार (१८६) २३०, तृतीय परिच्छेदकी फल-श्रुति (१८७), डॉ० जयशङ्कर त्रिपाठीके मतका खण्डन २३२;