काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
विषयानुक्रमणी (१६) (क) देशविरोध (१६५-१६६) २०१ : (अ) अद्रिविरोध (१६५) २०१, (आ) वन-विरोध, (इ) राष्ट्र-विरोध दो तरहसे (१६६) २०२, भामहके मतमें देशविरोध २०३; (ख) काल-विरोध (१६७-१६८॥) २०३-२०४ : (अ) रात्रिविरोध (१६७) २०३, (आ) दिनविरोध, (इ) ऋतुविरोध (१६७-१६८) २०४, काल-विरोधका उपसंहार (१६६), निर्दोषता २०५; (ग) कलाविरोध (१६६-१७१) २०५-२०६ : (i) नाट्यकलाविरोध (१७०) २०५, (ii) सङ्गीतकलाविरोध २०६, 'भिन्न-ग्राम' का अर्थ, 'भिन्न- मार्ग' पाठ उचित नहीं है २०७, कलाविरोधका उपसंहार (१७१) २०८, 'कला-परिच्छेद' का तात्पर्य, भामहके मतमें कला-विरोध २०६; (घ) लोक-विरोध (१७२-१७३) २१० : (i) वन्य पशुविरोध, (ii) ग्राम्य पशुविरोध, (iii) ग्राम्यवृक्ष, (v) वन्य वृक्ष विरोध, भामहके मतमें २११; (ङ) न्याय-विरोध (१७३-१७६) २११-२१३ : (अ) नास्तिक न्यायविरोध (१७४), (आ) आस्तिक न्याय-विरोध (१७५), यह नित्य दोष है (१७६) २८३, भामहके मतमें न्याय-विरोध; (च) आगम-विरोध (१७६-१७८) २१४-२१५ : (i) श्रुति-विरोध (१७७), दो आशय, (ii) स्मृति-विरोध (१७८) २१५, भामहका मत २१६; कविका कौशल दोषको भी गुण बना देता है (१७९-१८५) २१६ २२६— (१० क) देशविरोध (१८०) २१७, (ख) कालविरोध (१८१), (ग) कलाविरोध (१८२) २१८, (घ) लोकविरोध (१८३) २१६, (ङ) न्याय- विरोध (१८४) २२०, (च) आगमविरोध (१८५); दोषसमाप्ति मङ्गला- चरण २२२; दोषेतिहास मङ्गलाचरण २२२; दोषोंका इतिहास २२०; निष्कर्ष २२६, मङ्गलाचरण; तृतीय परिच्छेदका उपसंहार (१८६) २३०, तृतीय परिच्छेदकी फल-श्रुति (१८७), डॉ० जयशङ्कर त्रिपाठीके मतका खण्डन २३२;
(२०) काव्यादर्श टीकाकी समाप्तिकी तिथि २३२; काव्यादर्श-प्रशंसा २३३, दण्ड्याचार्यस्तुति, टीकाकारका परिचय, वृत्ति तथा रचनाओंका परिगणन २३४, परिशिष्ट—१. तृतीय-परिच्छेदकी श्लोक-सूची २३५, २. प्रसादिनी- मङ्गलश्लोक-सूची २३८, ३. सन्दर्भ-ग्रन्थ-सूची २४० । शुद्धिपत्र १. पृष्ठ १४६, श्लोक १२२ : केन कः सह सम्भूय २. पृष्ठ २०६, पादटिप्पणी ५ में जोड़ें : षड्ज-मध्यम-गान्धारास्त्रयो ग्रामाः प्रकीर्तिताः । भूर्लोकाज्जायते षड्जो भुवर्लोकाच्च मध्यमः ।। नारदीय शिक्षा १।२।६ स्वर्गान्नान्यत्र गान्धारो नारदस्य मतं यथा । ७ ३. पृष्ठ २०७, पादटिप्पणी २ में जोड़ें : स्वररागविशेषेण 'ग्रामराग' इति स्मृताः ।। नारदीय शिक्षा १।२।७ — ० — प्राप्य सरस्वती सुतं यदिदं सुपुत्रा पुण्यतमा धरा भवेच्च सदङ्कभूषा । भावमयं वपुस्त्वदीयं हृदये निधाय प्रार्थयते शिवस्त्वदा शिषमेष दण्डिन् ॥ सुभूमिकाविषयक्रमैर्बुधां वचसां परीअणैः सुकवेर्गभीरभावगुहाम् । प्रविश्य भावमणिप्रसादनैर्विबुधां शुभाशिषो दधती प्रसादिनी जयतात् ॥ व्याख्याता विबुधैः सद्भिर्बहुधाऽयं तु दण्डिनः । ग्रन्थस्तथाऽपि वैशिष्ट्यं प्रसादिन्या विलोक्यताम् ॥
॥ श्रीदण्डाचार्यविरचितः ॥ काव्यादर्शः 'दुष्कर' नामक तृतीय परिच्छेद (१ यमकका लक्षण तथा भेद) अव्यपेत-व्यपेतात्मा व्यावॄत्तिर्वर्णसंहतेः । यमकम्; वर्णसमुदायकी अव्यवहित और व्यवहित स्वरूप वाली विशिष्ट आवृत्ति 'यमक' होती है । प्रसादिनी चित्रं विचित्रसम्भारं जगच्चित्रं वितन्वती । गुणाढ्या मे महादेवी शिवस्य भावयेच्छिवम् ॥ १ ॥ सत्त्वाहिते तु चैतन्ये विष्णुपत्नी त्रिवर्गदा । रजोमुख्ये च तत्रेयं वाग्देवी सृष्टिकारणम् ॥ २ ॥ तमःप्रधानचैतन्या दुर्गेयं भक्तरक्षिणी । नाशिनी दुष्टवर्गस्य; भव्यं मे भावयन्त्विमाः ॥ ३ ॥ कृत्वा नखमणीन्स्वान्ते शुचिकान्तांस्तमोऽपहान् । बुधैश्च विबुधैश्चैव नित्यं भक्त्यानुराधितान् ॥ ४ ॥ शुचौ शुचौ रवौ पुष्ये द्वितीयेप्से कलानिधौ । प्रातरन्त्यपरिच्छेदव्याख्यानं प्रारभे शिवः ॥ ५ ॥ आचार्य दण्डीने द्वितीय परिच्छेदमें अर्थालङ्कारोंके निरूपणके बाद तृतीय परिच्छेदमें (१) काव्यशरीरकी शोभा शब्दके माध्यमसे सम्पन्न करने वाले शब्दालङ्कारोंका तथा (२) उसकी शब्दार्थोभयगत शोभाकी प्राप्तिमें व्याघात करने वाले दोषोंका निरूपण किया है ।
२ काव्यादर्श [३१
शब्दके माध्यमसे शोभा शब्दोंकी पच्चीकारीसे निष्पादित की जाती है । इस पच्चीकारीके दो प्रकार मुख्य हैं : (क) अनुप्रास और (ख) यमक । दोनोंमें शब्दके घटक वर्णोंकी आवृत्ति होती है । (क) जब यह आवृत्ति सामान्य होती है, एकाध वर्ण तक सीमित रहती है, या एक ही वर्णकी आवृत्ति न होकर नाना वर्णोंकी उनके उच्चारणके स्थान, प्रयत्न, मात्रा आदिकी समानताके रूपमें होती है, तब अनु अनुगामी या अनुकूल रूपमें शोभाकारक होनेसे प्र प्रकृष्ट रूपमें √अस् रखनेके कारण अनु+प्र+√ अस्+घञ् योग से 'अनुप्रास' कहलाती है । ह्रस्व, दीर्घ, प्लुतात्मक स्वरकी शोभाधायकता¹ छन्दके माध्यमसे अधिक होती है, अनुप्रासकी दृष्टिसे कम । इस लिये काव्यशास्त्रके आचार्योंने शब्दमें शोभाका आधान करने वाले अलङ्कारोंमें स्वरसाम्य, या स्वरोंकी आवृत्तिको अधिक महत्त्व नहीं दिया है । इस दृष्टिसे व्यञ्जनके साम्य और आवृत्तिपर ही अधिक ध्यान दिया गया है । अतः 'वर्ण'के 'स्वर' और 'व्यञ्जन' दो भेद होते हुए भी 'वर्ण' शब्द भरत आदिके द्वारा 'व्यञ्जन'के लिये अधिक प्रयुक्त हुआ है । स्वतन्त्र या वर्णारूढ स्वरोंके लिये तो 'अक्षर' सञ्ज्ञाका प्रयोग हुआ है ।² भरतने काव्यबन्धोंमें उदार एवं मधुर शब्दोंका प्रयोग आवश्यक बताया है ।³ शब्दोंमें माधुर्य समान ललित वर्णोंके न्याससे ही सम्भव है । भरतके अनुसार काव्यको मृदु एवं ललित पदोंसे भरपूर होना चाहिये ।⁴ पदोंमें मृदुता कोमल वर्णोंके अधिक प्रयोगसे आती है, और लालित्य समान वर्णोंके विन्यास से, अर्थात् अनुप्राससे । आचार्य दण्डी इसे प्रथम परिच्छेदके गुण-प्रकरणमें विस्तरेण बता चुके हैं । अनुप्रासका भी भरपूर विवेचन हम वहाँ (पृष्ठ १२४-१२७में) कर चुके हैं । भरतने अनुप्रासका निरूपण पृथक्से नहीं किया है । उन्होंने यमकको पर्याप्त विस्तारसे दिया है । १. ह्रस्वदीर्घप्लुतानीह यथाभावं यथारसम् । काव्ययोगेष्वक्षराणि यथाशोभं निवेशयेत् ।। नाट्य० १६।१२० २. एकमात्रं भवेद्ध्रस्वं, द्विमात्रं दीर्घमिष्यते । प्लुतं चैव त्रिमात्रं स्यादक्षरं वर्णसंश्रयम् ।। नाट्य० १६।११७ ३. ये बन्धाः पूर्वमुद्दिष्टा विषमार्थसमासमाः । उदारमधुरैः शब्दैः कार्यास्ते स्यु रसानुगाः ।। नाट्य० १६।१२१ ४. मृदुललितपदाढ्यं गूढशब्दार्थहीनं ⋯भवति जगति योग्यं नाटकं प्रेक्षकाणाम् । १६।१२४
३।१] १ यमकका लक्षण ३ यमक : लक्षण—यमकका शास्त्रीय निरूपण सर्वप्रथम भरतके नाट्य- शास्त्रमें मिलता है : शब्दका अभ्यास तो यमक होता है ।¹ यहाँ 'तो' पूर्वानु- वृत्त अर्थालङ्कारोंसे भेद दिखाता है कि यमक अर्थालङ्कारोंसे भिन्न शब्दा- लङ्कार है । 'शब्द' 'अर्थवान् वर्णसमुदाय' होता है, जो विभक्तिप्रत्यय लगने पर 'पद' कहलाता है । अतः वह भी 'शब्द' है । पदसमुदाय 'वाक्य' कह- लाता है । अतः वह भी 'शब्द' है । यह 'शब्द' वर्णोंसे घटित होता है । अतः अभिनवगुप्तके अनुसार 'वर्ण' भी 'शब्द' है । इस प्रकार भरतके 'शब्द' में वर्णसे लेकर पदसमुदायात्मक वाक्य तक समाविष्ट हैं ।² 'अभ्यास' आवृत्तिको कहते हैं । 'यमक' शब्द 'यम' (जुड़वाँ) से स्वार्थे 'क' प्रत्ययसे निष्पन्न है ।³ इस प्रकार एक वर्णकी आवृत्तिसे लेकर शब्द पद और वाक्यकी आवृत्ति 'यमक'के रूपमें अभिप्रेत है । इससे स्पष्ट होता है कि भरत अनुप्रास की अलगसे सत्ता नहीं मानते । अनुप्रासकी सर्वप्रथम चर्चा दण्डी और भामह के ग्रन्थोंमें उपलब्ध होती है । भामहमें दण्डीकी अपेक्षा विकसित रूपमें उप- लब्ध होती है । भामहके अनुप्रासविवरणको और आगे बढ़ाया है उद्भटने । दण्डीने भरतके 'शब्दाभ्यास'को दो भेदोंमें बाँटा है : (क) वर्णरूप शब्द की आवृत्तिमें 'अनुप्रास' होता है और (ख) वर्णसमुदायकी आवृत्तिमें यमक ।⁴ दण्डीके अनुप्रासके विवरण और बादके इतिहाससे विदित होता है कि अनुप्रासका आरम्भिक रूप वही है, जो बादमें 'वृत्त्यनुप्रास'के नामसे विकसित हुआ है । उसके अनन्तर 'श्रुत्यनुप्रास' अस्तित्वमें आया । भरतके 'शब्दाभ्यास'से दण्डीके उत्तरवर्ती लोगोंने शब्द और पदकी आवृत्तिसे भी अनुप्रासका एक अन्य प्रकार विकसित किया, जो 'लाटानुप्रास'के नामसे विदित हुआ । 'यमक'के अन्तर्गत जो समानार्थक (अभिन्नार्थक) शब्दोंका अभ्यास होता था, वह इस (लाटीय) अनुप्रासके नामसे विदित हुआ । बाकी जो बचा, वह 'यमक' रहा । अर्थात् (क) अभिन्नार्थक शब्दकी या (ख) निरर्थक शब्दकी (यानी शब्दके अवयव वर्णसमुदायकी) आवृत्ति होनेपर 'यमक' माना गया । १. शब्दाभ्यासस्तु यमकम्···। नाट्यशास्त्र० १६।५६ २. अभिनवभारती १६।५६ : तुरर्थालङ्कारेभ्यो व्यतिरेकमाह । 'शब्द'- शब्देन वाक्यं, पदं, तदेकदेशो वर्ण इति सर्वं गृह्यते । ३. यमकं यमजे, शब्दालङ्कारे, पुंसि संयमे । मेदिनीकोष १।१४२ ४. काव्यादर्श १।५५ : वर्णावृत्तिरनुप्रासः । ६१ : आवृत्तिमेव सङ्घात- गोचरां यमकं विदुः । 'विदुः'के कर्ताके रूपमें दण्डीको भरत अभिप्रेत हैं ।
४ काव्यादर्श [३१ पर वह स्थिति दण्डीके पश्चात्की है। भरतके उदाहरणोंमें (१) भिन्नार्थक, (२) समानार्थक, तथा (३) निरर्थक, तीनों प्रकारके शब्दोंकी आवृत्ति उदाहरणोंमें उपलब्ध है : चक्रवालयमकके उदाहरणमें 'पुङ्गैः खगैः'में प्रथम 'खगैः' शब्दावयव होनेसे निरर्थक है, 'खगैः । खगैः' में दोनों भिन्नार्थक हैं। इसी प्रकार 'सञ्चिताश्चिताः' में समानार्थक शब्दका तात्पर्यभेदसे प्रयोग है। 'चिताश्चिता' में भिन्नार्थता है। इसी प्रकार चतुर्व्यवसित यमकके उदाहरण (१६।८२) में भी 'वारण' शब्दसे 'वारण' नामक पुष्प, हस्ती, वारणक्रियायुक्त शत्रु, भिन्न- भिन्न अर्थ प्रतीत होते हैं। चतुर्थ पादमें 'वारणानां' छेदसे और ही अर्थ अभिप्रेत है। इससे स्पष्ट है कि 'लाटानुप्रास'को भरत यमकसे पृथक् नहीं मानते । आचार्य दण्डीने भरतके यमकलक्षणको स्पष्ट किया है। प्रथम परिच्छेद में वर्णवृत्तिको 'अनुप्रास' कहा था, तो वर्णसङ्घातकी आवृत्तिको 'यमक'। यमकके बारेमें यह कथन भरतके यमकलक्षणका स्पष्टतर शब्दोंमें अनुवाद ही है। अब इसके उचित अवसरपर उन्होंने भरतके लक्षणसे तीन बातें विशेषकीं हैं : (१) भरतके 'शब्द'से पर्यवसित 'वर्णसमुदाय'का स्पष्टतया कथन किया; (२) 'अभ्यास'के पर्याय 'आवृत्ति'का प्रयोग करके उसमें 'वि'के योगसे 'विशिष्टता' और 'विविधता'को जोड़ा : शोभाकारक तथा विविध प्रकारके न्यासके रूपमें आवृत्ति = व्यावृत्ति; (३) इस व्यावृत्तिका एक विशेषण दिया, जो भरतने नहीं दिया था : अव्यपेत-व्यपेतात्मा। यमकके मूल भेद : 'अव्यपेत ०' में 'अव्यपेत' और 'व्यपेत'का समास है, जिसका विग्रह दो प्रकारसे हो सकता है :—(क१) न व्यपेतः = अव्यपेतः । स च (२) व्यपेतश्चेति अव्यपेत-व्यपेतौ (इतरे० द्वन्द्व) तौ आत्मानौ यस्य, सोऽव्यपेत-व्यपेतात्मा (बहु०)। अर्थात् जिसका स्वरूप (१) अव्यपेत है, और (२) व्यपेत है, इस तरह दो प्रकारका है, वह व्यावृत्ति । (ख) अव्यपेतश्च व्यपे- तञ्च, तयोः समाहार इत्यव्यपेतव्यपेतम्, तद् आत्मा यस्याः, सा । अर्थात् जिसका स्वरूप अव्यपेत और व्यपेतका समाहार (मिश्र) है, वह व्यावृत्ति । इस प्रकार यहाँ (१) अव्यपेतात्मक, (२) व्यपेतात्मक और (३) अव्यपेत- १. ‘शैला यथा शत्रुभिराहता हता हताश्च भूयोऽप्यनु पुङ्गैः खगैः । खगैश्च सर्वैर्युधि सञ्चिताश्चिताश्चिताऽधिरूढा निहतास्तलैस्तलैः ॥’ नाटय० १६।७४
३।१-२] १ यमकके भेद ५ तच्च पादानामादिमध्यान्तगोचरम् ॥ १ ॥ एक-द्वि-त्रि-चतुष्पाद्यमकानां विकल्पना । और वह पादोंके आदि मध्य और अन्तमें होता है ॥ १ ॥ एक, दो, तीन और चार पादोंमें यमकोंके (१) आदिमें, (२) मध्यमें व्यपेतोभयात्मक, ये तीन भेद यमकके निष्पन्न होते हैं । रत्नश्रीज्ञान, वादि- जङ्घाल देव और तरुणवाचस्पतिने यहाँ प्रथम दो भेद ही बताये हैं : पर आचार्य दण्डीने आगे तृतीय भेद भी बताया है : 'अव्यपेत और व्यपेतके अति- रिक्त अव्यपेतव्यपेतात्मा भेद भी है (३३)' कहकर तीन (३४-३६) श्लोकोंमें इसके उदाहरण दिये हैं । अतः त्रिविधता ही आचार्यसम्मत है । अव्यवधानसे आवृत्ति व्यवहितकी अपेक्षा अधिक श्रुतिसुख देती है, इस लिये द्वन्द्वमें अल्पा- च्चतरका पूर्व प्रयोग न करके अभ्यर्हित होनेसे 'अव्यपेत' का पूर्व प्रयोग किया है । 'व्यपेत' शब्द 'वि + अप + √इ + क्त' से निष्पन्न है और 'व्यवहित' का पर्याय है । व्यवधान आवृत्त वर्णसमुदायसे भिन्न वर्णोंका ही होगा । अतः (१) व्यवधानसे रहित, अर्थात् वर्णसमुदायकी निरन्तर, विशिष्ट आवृत्तिसे 'यमक' निष्पन्न होता है, (२) वर्णान्तरके व्यवधानमें वर्णसमुदायकी विशिष्ट आवृत्तिसे भी यमक होता है, तो (३) इन दोनों प्रकारोंके मेलसे भी होता है । इस प्रकार दण्डीने यमकके ये तीन मूल भेद भी यहाँ लक्षणमें ही बता दिये हैं : (१) अव्यपेतयमक, (२) व्यपेतयमक, (३) अव्यपेत-व्यपेतयमक । भरतने यमकके भेदोंका आधार पादके विभिन्न अवयवों 'आदि', 'अन्त' को बताकर इसके कुल दस भेद किये हैं : (१) पादान्तमें, (२) आदि और अन्तमें काञ्ची (शृङ्खला), (३) विषम और सम पादोंमें समुद्ग, (४) एक पादके व्युत्क्रमणसे पादावृत्ति करके विक्रान्त, (५) पूर्वपादान्तकी अगले पाद के आदिमें आवृत्ति करके चक्रवाल, (६) आदिमें आवृत्तिसे सन्दष्ट, (७) चारों पादोंके आदिके समान अक्षरोंके विन्याससे पादादियमक, (८) चारों पादोंके अन्तमें एक पदकी द्विरुक्तिसे पादान्ताम्रेडित, (६) चारों पादोंमें समान अक्षरविन्याससे चतुर्व्यवसित, और (१०) एक व्यञ्जनके नाना रूप वाले स्वरोंसे युक्त होनेपर माला नामक यमक बताये हैं १ ॥ १ ॥ आचार्य दण्डीने भरतकी 'पादादिषु विकल्पतम्' उक्तिका विस्तार निम्न प्रकारसे किया है : (१) एक पाद, (२) दो पादों, (३) तीन पादों और
१. नाट्यशास्त्र १६।६२-८५ देखें ।
६ काव्यादर्श [३।२-३] आदिमध्यान्त-मध्यान्त-मध्याद्याद्यन्त-सर्वतः ॥ २ ॥ अत्यन्तबहवस्तेषां भेदाः सम्भेदयोनयः । या (३) अन्तमें, (४) मध्य और अन्तमें, (५) मध्य और आदिमें, (६) आदि और अन्तमें तथा (७) सब जगहोंमें होनेसे निष्पन्न होते हैं ॥ २ ॥ उनके आपसमें मिश्रणसे बनने वाले भेद मात्रामें बहुत ही अधिक हैं । (४) चार पादोंके (१) आदिमें, (२) मध्यमें या (३) अन्तमें अथवा (४) मध्य और अन्तमें, अथवा (५) मध्य और आदिमें, (६) आदि और अन्तमें तथा (७) आदि, मध्य और अन्त तीनों जगह वर्णसमुदायोंकी त्रिविध (अव्यपेत, व्यपेत और उभयात्मक) आवृत्तिसे इन भेदोंका स्वरूप बनता है । अन्तिम प्रकारमें समूचे पादोंकी भी आवृत्ति हो सकती है । तरुणवाचस्पतिके अनुसार ऊपर बताये चार पादोंके आदि, मध्यप्रभृति सप्तविध स्थानोंमें अव्यवहित और व्यवहित वर्णसमुदायकी आवृत्तिसे सम्पन्न यमकोंके सामान्यतः २१० भेद निष्पन्न होते हैं । तद् यथा—(१) आदि यमक—(क) प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ पादोंके आदिमें यमकके चार भेद निष्पन्न होते हैं । (ख. अ) पहले और दूसरे, तीसरे और चौथेके आदि में सम्पन्न यमकके तीन भेद होते हैं । (आ) दूसरे और तीसरे, चौथे पादोंके आदिमें यमकके दो भेद हुए । (इ) तृतीय और चतुर्थ पादोंमें आवृत्तिसे एक भेद बना । इस प्रकार द्विपादादियमकके छह भेद बनते हैं । (ग. अ) प्रथम, द्वितीय, तृतीय पादोंके आदिमें, (आ) प्रथम द्वितीय और चतुर्थ पादों के आदिमें, (इ) प्रथम, तृतीय और चतुर्थ पादोंके आदिमें, (ई) द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ पादोंके आदिमें, इस प्रकार त्रिपादादियमक के चार भेद निष्पन्न होते हैं । (घ) चारों पादोंमें आवृत्तिसे एक ही यमक निष्पन्न होता है । इस प्रकार आदियमकके एक पादमें ४, दो पादोंमें ६, तीन पादोंमें ४, एवं चार पादोंमें (१) कुल मिलाकर १५ भेद सम्पन्न हुए । यही सङ्ख्या (२) मध्ययमक, (३) अन्तयमक, (४) आदि- मध्ययमक, (५) आद्यन्तयमक, (६) मध्यान्तयमक तथा (७) आदि- मध्यान्तयमककी होगी । इससे इन सातोंके १०५ भेद निष्पन्न होते हैं । इन्हें (१) अव्यपेत, (२) व्यपेत¹ भेदोंमें गुणितकरनेसे २१० और (३) अव्यपेत-व्यपेतके १०५ भेद मिलानेसे यमकके कुल ३१५ भेद बनते हैं ॥ २ ॥ इन ३१५ भेदोंके परस्पर मिश्रणसे सम्पन्न होने वाले भेदोंकी गणना १. तरुणवाचस्पतिके मतमें यही भेद दण्डिसम्मत है !
३।३] १ यमक अन्य आचार्योंके मतमें ७ (क) सुकरा (ख) दुष्कराश्चैव दृश्यन्ते तत्र केचन ॥ ३ ॥ उनमेंसे (क) आसानीसे रचित होने वाले और (ख) कठिनाईसे रचित होने वाले कुछ भेद (आगे) देखे जा रहे हैं ॥ ३ ॥ नहीं की जा सकती । अतः मिश्रणसे भी यमक निष्पन्न होते हैं, यह एक दिग्दर्शन ही समझना चाहिये । इसके बाद आचार्यने सभी यमकोंके (क) सुकर और (ख) दुष्कर भेद किये हैं । इन अनन्त भेदोंका उदाहरणसे प्रदर्शन सम्भव नहीं है । अतः उनमें से कतिपय भेदोंके उदाहरण आचार्यने दिये हैं । (क १) सुकर अव्यवहित पादादि यमकोंके उदाहरण ४-१८ श्लोकोंमें, (२) व्यपेत सुकर पादादियमक के २०-३२में, (३) उभयात्मक सुकर आदियमकके उदाहरण ३४-३६में दिये हैं । (ख) दुष्कर यमकोंके कतिपय उदाहरण ३६-७७ में दिये हैं । भामहने यमकका निरूपण दस (काव्यालङ्कार २।६-१८) श्लोकोंमें बड़े अस्तव्यस्त प्रकारसे किया है : (क) उन्होंने भरतके सन्दष्टक और समुद्ग आदि भेदोंको (१) पादोंके आदिमें, (२) दो पदोंके मध्य और अन्तमें यमक, (३) पादाभ्यास, (४) आवली, (५) सब पादोंमें यमकके रूपमें दिया है । दशम श्लोकके उत्तरार्धमें सम्भवतः ९वें श्लोकका प्रथम पाद ही स्पष्ट किया गया है, ताकि उसे (१) आदि, (२) मध्य, (३) अन्त इन तीन भेदोंके रूपमें न समझ लिया जाये ।¹ इन पाँच भेदोंके अतिरिक्त उन्होंने (१) अन्तररहित (लगातार) और (२) एक पादके अन्तरसे, एवं (३) दो पादोंके अन्तमें भी, तथा (४) सभी पादोंमें पूर्ण पादकी आवृत्तिसे भी यमक बताये हैं, जो दुष्कर होते हैं ।² इसके बाद १७ वें श्लोकमें उन्होंने यमकका लक्षण दिया है : सुनने में समान, अर्थोसे परस्पर भिन्न वर्णोंको पुनः जो कहना है, वह यमक कहा जाता है ।³ भामहका यह लक्षण सम्भवतः लिखा तो गया था उनके लाटा- १. आदि-मध्यान्तयमकं पादाभ्यासं तथाऽऽवली । समस्तपादयमकमित्येतत्पञ्चधोच्यते ॥ काव्यालङ्कार २।६ सन्दष्टकसमुद्गादेरत्रैवान्तर्गतिर्मता । आदौ, मध्यान्तयोर्वा स्यादिति पञ्चैव, तद् यथा ॥ १० २. अनन्तरैकान्तरयोरेवं पादान्तयोरपि । कृत्स्नं च सर्वपादेषु दुष्कृतं साधु तादृशम् ॥ काव्यालङ्कार २।१६ ३. तुल्यश्रुतीनां भिन्नानामभिधेयैः परस्परम् । वर्णानां यः पुनर्वादो, यमकं तन्निगद्यते ॥ काव्यालङ्कार २।१७
८ काव्यादर्श [३१३ नुप्राससे यमकको पृथक् करनेको, पर यह उनके अपने उदाहरणोंपर ही लागू नहीं होता । विशेषकर 'अर्थोंसे भेदकथन'का अंश । उनके उदाहरणोंमें समानार्थक पदोंकी आवृत्ति यदि है, तो अर्थरहित शब्दांश वर्णसमुदायकी आवृत्ति भी है ।¹ सम्भवतः इस दोषके परिहारके लिये परवर्ती अलङ्कार- शास्त्रियोंने 'यदि आवृत्त वर्ण सार्थक हैं, तो उनका अर्थ पृथक् होना चाहिये', यह परिष्कार किया है ।² ऊपरी तौरपर यह त्रुटि भरतके लक्षणमें भी थी : शब्दसे सार्थक वर्ण ही अभिप्रेत होते हैं । पर भरतके उदाहरणोंसे यह स्पष्ट हो जाता है कि भरतको यहाँ 'शब्द'का यह पारिभाषिक अर्थ अभीष्ट नहीं है । उनमें सार्थक समानार्थक शब्दोंकी भी आवृत्ति है, तो निरर्थक, वर्णसमुदायकी भी । दण्डीने स्पष्टतः वर्णसमुदायकी आवृत्तिमें यमक बताकर इस त्रुटिका सर्वथा परिहार कर दिया है । उन्होंने यमकमें अर्थकी अपेक्षापर विचार ही नहीं किया । इस लिये दण्डीका यमक पूर्णतया शब्दालङ्कार है । भामहका यमक उसमें अर्थपार्थक्यकी अपेक्षाके कारण उभयालङ्कारकी स्थितिको प्राप्त है । वह विशुद्ध शब्दालङ्कार नहीं है । लाटानुप्रासकी कल्पना भरतके समान दण्डीके यहाँ नहीं है । उसकी स्थिति यमकमें ही समावेशसे है । इन दोनों अलङ्कारोंमें भेद परवर्ती अलङ्कारशास्त्रियों भामह और उद्भटने आवृत्त शब्द या पदकी समानार्थकताके कारण ही माना है । अन्यथा दोनोंमें शब्दकी आवृत्तिसे शोभाकारिता समान धर्म है । वस्तुतः शब्दकी समानार्थकतासे लाटानुप्रासमें कोई विशेष चारुत्व नहीं उत्पन्न होता । आवृत्तिका ही चारुत्व होता है । इसे यदि अलङ्कार माना भी जाता है, तो अर्थविचारके कारण ही यमकसे पार्थक्य अभीष्ट होनेसे इसे शब्दार्थो- भयालङ्कार कहना चाहिये, केवल शब्दालङ्कार नहीं । यदि यमकसे पृथक् नाम ही देना था, तो इसे 'लाटीययमक' कहना चाहिये, 'अनुप्रास' नहीं । अनुप्रासमें वर्णोंकी आवृत्ति अपेक्षित होती है, पूरे शब्दकी नहीं । इसी प्रकार १. संसाराद्···असारात्, क्लेशान्त···प्रशान्तम्, व्याधीनां···मधीनां, ज्याय- स्त्वं···नयस्त्वम् (२।१२); रमणीयेषु सङ्गता···रमणी येषु सङ्गता (१३), सितासिताक्षी सुपयोधराधराम् सुसम्मदं व्यक्तमदां ललामदाम् । घनाघनानीलघनाघनालकां···मुत्सुकयन्ति यन्ति च (१४); समग्रशासनाः, प्रतिबद्धशासनाः । मार्गभिदां च शासनाः···तादृशासनाः (१५) । २. काव्यप्रकाश ११७ : अर्थे सत्यर्थभिन्नानां वर्णानां सा पुनः श्रुतिः । यमकम् ।
१।३] १ यमक अन्य आचार्योंके मतमें ६ उद्भटद्वारा उद्भावित 'पुनरुक्तवदाभास' अलङ्कारमें चारुत्वाधानका हेतु अर्थ की आवृत्तिका आभास है, उसके अधिष्ठान शब्द (उच्चार्य और श्रव्य वाक्) की आवृत्ति नहीं है । अतः वह न शब्दालङ्कार है, न उभयालङ्कार ही है । इसके अतिरिक्त, भामहने यमकमें कुछ और विशेषताएँ भी वाञ्छनीय बताई हैं : यमकके शब्द प्रसिद्ध हों; वह ओजस्वी और पदोंकी सुघटित सन्धि वाला हो, प्रसादयुक्त एवं भली भाँति अर्थाभिधान करने वाला हो ।१ स्पष्ट है कि ये विशेषताएँ तो काव्यकी सामान्य अपेक्षाएँ हैं । इनका यमकसे कुछ विशेष लेना देना नहीं है । भामहके मतमें नाना धातुओंके अर्थोंसे गम्भीर यमक कहनेको ही 'यमक' होता है, वस्तुतः तो वह 'पहेली' ही है । इसका निरूपण रामशर्माने 'अच्युतो- त्तर' ग्रन्थमें किया है ।२ उद्भटने शब्दालङ्कारोंमें पुनरुक्तवदाभास और छेकानुप्रासकी उद्भावना की है और भामहोक्त ग्राम्य और उपनागरिका वृत्तियोंमें विभक्त द्विविध अनुप्रासमें एक परुषा वृत्ति और जोड़कर त्रिविध वृत्त्यनुप्रासका निरूपण करके लाटानुप्रासका विस्तरेण प्रतिपादन किया है । उनके लाटानुप्रासके कई उदा- हरण भरतके पादान्तयमक (नाट्यशास्त्र १६।६७), काञ्चीयमक (६६), समुद्गयमक (७१), चक्रवालयमक (७५) और सन्दष्टयमक (७७)के उदा- हरणोंसे मिलते-जुलते तो हैं ही, उनका लाटानुप्रासका लक्षण भी यमकको कुछ-कुछ समेटता प्रतीत होता है : शब्दों या पदोंके स्वरूप और अर्थमें अभेद होनेपर भी फल (तात्पर्य)के भेदके कारण पुनरुक्ति लाटानुप्रास कहाती है ।३ यहाँ कुछ विचार अपेक्षित है : (१) स्वरूपके भेदमें आवृत्ति (पुनरुक्ति) सम्भव ही नहीं है, अतः उसके अभेदका कथन स्वतः प्राप्त होनेसे यहाँ अपे- क्षित नहीं है । यदि इसे कहा भी है, तो यह प्राप्तका अनुवाद मात्र है, विधान नहीं है । अनुवाद लक्षणका अङ्ग नहीं हुआ करता । (२) अर्थके अभेदमें शब्दों या पदोंकी तात्पर्यभेदसे पुनरुक्तिसे लाटानुप्रासकी निष्पत्ति सिद्ध हो १. प्रतीतशब्दभोजस्वि, सुश्लिष्टपदसन्धि च । प्रसादि, स्वभिधानं च यमकं कृतिनां मतम् ॥ काव्यालङ्कार २।१८ २. नानाधात्वर्थगम्भीरा, यमकव्यपदेशिनी । प्रहेलिका सा ह्युदिता रामशर्माच्युतोत्तरे ॥ काव्यालङ्कार २।१६ ३. स्वरूपार्थाविशेषेऽपि पुनरुक्तिः फलान्तरात् । शब्दानां वा, पदानां वा लाटानुपास इष्यते ॥ काव्या०सार १।६
१० काव्यादर्श [३१३ जानेके कारण यहां 'अपि' (भी') पदका प्रयोग किसी अनुक्त पदार्थका समु- च्चय करता है, और वह अनुक्त पदार्थ है अर्थका भेद । अर्थात् अर्थके अभेद और भेदमें लाटानुप्रास निष्पन्न होता है । यह स्थिति यमककी है। भरतके यमकके उदाहरणोंमें दोनों प्रकारके शब्दों और पदोंका अभ्यास उपलब्ध है । अतः यमकसे लाटानुप्रासको पृथक् करनेके लिये यहाँसे 'अपि'को हटाना होगा । तब यह भामहके यमकके ठीक विपरीत हो जायेगा । अन्तर केवल भामहके 'वर्णानां'के स्थानपर 'शब्दों' और 'पदों'का रहेगा । भामहको 'वर्णों' से निरर्थक और सार्थक वर्णसमुदाय अभीष्ट है, जबकि उद्भटको लाटानुप्रास में सार्थक वर्णसमुदाय ही । अतः दोनों अलङ्कारोंमें मुख्यभेद अर्थके भेद और अभेदका है । इस अन्तरकी प्राप्तिमें 'अपि' बाधक है । वामनने (१) पादादि स्थानोंके नियमनकी बात दण्डीकी ली, और (२) भिन्नार्थताकी बात भामहकी तथा (३) पद या वर्णकी आवृत्तिमें भरतका अनुकरण किया है : जिसका अर्थ एक ही नहीं है, अर्थात् भिन्न है, ऐसा पद या (अक्षर स्थानके नियमसे, हुआ नियत स्थानमें आवृत्त हुआ) 'यमक' कहलाता है ।१ 'स्थाननियम'की उनकी व्याख्या है : पद या वर्णकी अन्य पादमें वृत्तिसे आवृत्ति (स्ववृत्त्या आवृत्ति), तथा समानजातीय पद या वर्णके द्वारा पूरे स्वरूपसे या एकदेशसे अनेक पादोंकी व्याप्ति स्थाननियम है । एक पाद के भागोंमें ही अगर आवृत्ति है, तो वह अन्य श्लोकोंमें स्थित संस्थाननियम की अपेक्षासे स्थाननियम है । पाद, एक और एकाधिक पादोंके आदि, मध्य और अन्त भाग, ये नियत होने वाले स्थान हैं ।२ यहाँ वामनके 'आदिमध्यान्तभागा:'का विग्रह करके दण्डीके समान (क १) आदि, (२) मध्य, (३) अन्त, (ख १) आदि-मध्य, (२) मध्य-अन्त), (३) आदि-अन्त, (ग) आदि-मध्य-अन्त, ये सात स्थान निष्पन्न होते हैं । 'एक, अनेक पाद' कथनसे दण्डीके (क) एकपाद— (१) प्रथम, (२) द्वितीय, (३) तृतीय और (४) चतुर्थ, (ख) द्विपाद— (१) १. काव्याल०सूत्र ४।१।१ : पदमनेकार्थमक्षरं वा वृत्तं स्थाननियमे यमकम् । ...अनेकार्थं भिन्नार्थम् । स्ववृत्त्या, सजातीयेन वा कार्त्स्न्यैकदेशाभ्या- मनेकपादव्याप्तिः स्थाननियमः । यानि त्वेकपादभागवृत्तीनि यमकानि दृश्यन्ते, तेषु श्लोकान्तरस्थसंस्थाननियमापेक्षयैव स्थाननियम इति । २. काव्यालङ्कारसूत्र ४।१।२ : पादः, पादस्यैकस्यानेकस्य चादिमध्यान्तभागाः स्थानानि ।
३।३] १ यमक अन्य आचार्योंके मतमें ११ प्रथम-द्वितीय, (२) प्रथम-तृतीय, (३) प्रथम-चतुर्थ, (४) द्वितीय-तृतीय, (५) द्वितीय-चतुर्थ, (६) तृतीय-चतुर्थ, (ग) त्रिपाद—(१) प्रथम-द्वितीय-तृतीय, (२) प्रथम-द्वितीय-चतुर्थ, (३) प्रथम-तृतीय-चतुर्थ, एवं (घ) चारों पादोंमें एक भेद निष्पन्न होते हैं । इन शुद्ध भेदोंके अतिरिक्त इनके सङ्करसे भी भेदोंकी उत्प्रेक्षा करनेकी राय वामनने दी है । इस प्रकार वामनके इस निरूपणपर दण्डीका प्रभाव स्पष्ट है । वामनके उदाहरणोंमें एक बात ध्यातव्य है कि यमकके घटक दोनों अवयव (आवर्त्य और आवृत्त) सब जगह सार्थक नहीं हैं । आवर्त्य यदि सार्थक है, तो आवृत्त अंश प्रायः निरर्थक वर्णसमुदाय है । अतः लक्षणमें 'अर्थ'का समावेश उदाहरणोंके प्रतिकूल है । इसके अतिरिक्त, वामनने एक या अधिक वर्णोंकी आवृत्तिसे जो यमक बताया है,१ उसकी यमकता भरतके समय भले उचित होती, पर वस्तुतः तो वह अनुप्रास ही है । भरतके मालायमकके अनुकरणमें वामनने 'पदयमकमाला' और वर्ण- यमकमाला' भी बताई हैं । वामनने वर्णविच्छेदसे यमकके शृङ्खला, परिवर्तन एवं चूर्ण नामक प्रकारों में उत्कर्ष बताया है ।२ वह वैयाकरणको भले 'उत्कर्ष' प्रतीत हो, काव्यरसे- च्छुको तो वेदनानिग्रहरसका सेवन करनेको बाध्य कर देगा । यही स्थिति उनके अद्भुत यमककी है, जिसमें विभक्तियोंके वैविध्य, एक वचन आदि सङ्ख्याओंकी, कारककी और सुबन्त और तिङन्त पदोंकी आवृत्ति विच्छेदसे होनेसे यमक निष्पन्न माना जाता है ।३ इस प्रकारके यमकके लिए भामहने १. काव्यालङ्कारसूत्र ४।१।२ पर वृत्ति : अक्षरयमकं त्वेकाक्षरमनेकाक्षरं च । एकाक्षरं यथा— नानाकारेण कान्ताभ्रूराराधितमनोभुवा । विविक्तेन विलासेन ततक्ष हृदयं नृणाम् ॥ २. काव्यालङ्कारसूत्र ३-४ : भङ्गादुत्कर्षः । भङ्गो नाम वर्णविच्छेदः । शृङ्खला परिवर्तकश्चूर्णमिति भङ्गमार्गः । ३. विभक्तीनां विभक्तत्वं, संख्यायाः, कारकस्य च । आवृत्तिः सुप्तिङन्तानां मिथश्च यमकाद्भुतम् ॥ काव्या० सूत्र ४।१।७
१२ काव्यादर्श [३।३ ठीक ही कहा था कि यदि काव्य भी शास्त्रके समान व्याख्यासे ही समझ आने लगे, तो इससे सुधी लोग ही आनन्दित होंगे, अल्पबुद्धि (साधारण जन) तो बेचारे मारे गये।¹ वामनने अनुप्रासका निरूपण सङ्क्षेपसे भेदकथनके बिना ही किया है। उद्भटके मतमें लाटानुप्रासके माने जाने वाले उदाहरणोंको वामनने सामान्य 'अनुप्रास' के उदाहरणोंके रूपमें ही दिया है।² रुद्रटने यमकका भामहोक्त लक्षण ही अपना लिया है, अन्तर वर्णोंके क्रम की तुल्यताका समावेश करने भरका है। नमि साधुने इसका प्रयोजन प्रति- लोम, अनुलोम, सर्वतोभद्र नामक बन्धों और अनुप्रास आदिका यमकसे भेद करना बताया है। भिन्नार्थताका प्रयोजन पुनरुक्त और यमकमें भेद बताना है। रुद्रटको 'अन्यार्थानां वर्णानाम्'में 'अर्थ' से 'वाच्य' ही नहीं, 'तात्पर्य' भी अभीष्ट है। यह स्पष्टतः रुद्रट द्वारा लाटानुप्रासको पृथक् अलङ्कारके रूपमें निरूपित करनेसे सम्बद्ध है। अर्थात् वे लाटानुप्रासको यमक ही मानते हैं। रुद्रटने यमकका विषय प्रायः छन्दमें, अर्थात् पद्य काव्यमें, ही बताया है।³ १. काव्यान्यपि यदिमानि व्याख्यागम्यानि शास्त्रवत् । उत्सवः सुधियामेव, हन्त दुर्मेधसो हताः ॥ काव्यालङ्कार २।२० २. काव्या० सूत्र ४।१।८ : शेषः सरूपोऽनुप्रासः । पदमेकार्थमनेकार्थं च स्था- नानियतं, तद्द्विधमक्षरं च शेषः । विशेषार्थं च 'सरूप'-ग्रहणम्— कात्स्न्येनैवावृत्तिः, कात्स्न्यैकदेशाभ्यां तु सारूप्यमिति । ६ : अनुलवणो वर्णानुप्रासः श्रेयान् । १० : पादानुप्रासः पादयमकवत् । यथा— कविराजमविज्ञाय कुतः काव्यक्रियादरः । कविराजं च विज्ञाय कुतः काव्यक्रियादरः ।। ३. तुल्यश्रुतिक्रयाणामन्यार्थानां मिथस्तु वर्णानाम् । पुनरावृत्तिर्यमकं, प्रायश्छन्दांसि विषयोऽस्य ।। काव्यालङ्कार ३।१ नमिटीका : 'क्रम'-ग्रहणात्प्रतिलोमानुलोम सर्वतोभद्रानुप्रासादीनां यमक- त्वनिरासः । 'मिथोन्यार्थानाम्' ... इत्यनेन तु पुनरुक्तस्य यमकत्वव्यु- दासः । 'अन्यार्था' इत्यत्र 'अर्थ'-शब्दः प्रयोजनवाच्यऽपि । विजृम्भितोद्दामरसेन चेतसां निरूप्यमाणं किमपि प्रियावपुः । तदेव वैराग्यवतो विभागशो निरूप्यमाणं किमपि प्रियावपुः ।।
३।३] १ यमक अन्य आचार्योंके मतमें १३ यमकके भेदोंके बारेमें रुद्रटते दण्डीका निरूपण थोड़ा इधर-उधर करके प्रस्तुत किया है : (क) पूरे पादोंकी आवृत्तिसे और (ख) पादके एक भाग- की आवृत्तिसे यमकके प्रथमतः दो भेद हैं। (क) प्रथम समस्तपादजके पादावृत्तिसे ६, अर्धवृत्तिसे और श्लोकावृत्तिसे एकेक, कुल ११ भेद बताये- हैं। (ख) एकदेशाजके पादोंके प्रथमार्धकी आवृत्तिसे आचार्यने २० भेद किये हैं। पादके उत्तरार्धकी अग्रिम पादके प्रथमार्धमें आवृत्तिसे ३ भेद बताए हैं। इत्यादि। रुद्रटके ये भेद नामकरणकी दृष्टिसे कल्पनाप्रवण हैं। इसका मूल स्रोत भरतके काञ्ची, शिखा, चक्रवाल, समुद्ग और सन्दष्ट आदि प्रकारके यमक हैं। विविध प्रकारके बन्धोंका मूल भी इसी प्रकारके यमकोंमें निहित है। अग्निपुराणमें एक वर्णकी पञ्चविध वृत्तियोंसे अनुप्रास बताया है। यही अन्यत्र वृत्तियोंके कारण 'वृत्त्यनुप्रास' नामसे कहा गया है। भिन्नार्थ- प्रतिपादिका अनेकवर्णवृत्ति यमक होती है। उसके अव्यपेत (आनन्तर्य) और व्यपेत दो भेद बताये हैं। इन दोनों ही प्रकारके यमकोंके पाद और उनमें स्थानके भेदसे चार प्रकार बताये हैं। स्थानभेदसे यह सात प्रकारका होता है।¹ इस प्रकार स्पष्ट है कि अग्निपुराणमें (१) लक्षणोंके बारेमें भामहका और (२) भेदोंके बारेमें दण्डीकी दृष्टिका आश्रय मुख्य रूपसे लिया गया है। अग्निपुराणके अलङ्कारशास्त्रीने भरतोक्त १० यमकोंको श्रेष्ठ यमक बताकर उनके अन्य बहुतसे भेद बताये है।² यहाँ लाटानुप्रासको 'आवृत्ति' के नामसे दिया गया है—भिन्न प्रयोजन वाले स्वतन्त्र और परतन्त्र पदकी दो प्रकारकी आवृत्तिसे 'आवृत्ति' अलङ्कार निष्पन्न होता है : (१) दोनों पदोंमें समाससे समस्ता आवृत्ति तथा समासाभावमें व्यस्ता होती है। यह व्यस्ता एक पादमें विग्रहसे भी निष्पन्न होती है। सम्भवतः यह भेद वामन १. स्यादावृत्तिरनुप्रासो वर्णानां पदवाक्ययोः । एकवर्णानिकवर्णवृत्तेर्वर्णगणो द्विधा ।। अग्निपुराण ३४३।१ एकवर्णगतावृत्तेर्जायन्ते पञ्च वृत्तयः । मधुरा, ललिता, प्रौढा, भद्रा परुषया सह ।। २ अनेकवर्णवृत्तिर्या भिन्नार्थप्रतिपादिका ।। ११ यमकं साऽव्यपेतं च व्यपेतं चेति तद् द्विधा । १२ इत्यादि २. पादान्तयमक चैव...मान्तायमकमेव च । दशधा यमकं श्रेष्ठं, तद्भेदा बहवोऽपरे ।। अग्निपुराण० ३४३।१७
१४ काव्यादर्श [३१३ के भङ्गवान् अनुप्रासपर आधारित है । वाक्यकी भी आवृत्ति हो जाती है ।¹ महाराज भोज यमक और लाटानुप्रासको पृथक्-पृथक् मानते हैं । इस लिये उन्होंने भी (१) लक्षणमें भामहका और (२) भेदकथनमें दण्डीका अनु- करण किया है ।² एक अन्तर है : अव्यपेत, व्यपेत और उभयात्मकको उन्होंने समुद्गापरपर्याय अर्धाभ्यास यमकमें सीमित माना है । दण्डीके समान साधा- रण भेद नहीं बताया है ।³ इसके अतिरिक्त इन्होंने कई वर्णोंकी आवृत्तिमें स्थूल और अल्पवर्णों (दो वर्णों) की आवृत्तिमें सूक्ष्म भेद भी माने हैं । रत्ने- श्वरमिश्रने एकवर्णकी आवृत्तिको सूक्ष्मतर बताया है ।⁴ आवृत्तिकी विषय वर्णसंहतिकी विभिन्नार्थतापर रत्नेश्वरमिश्रका यह कथन महत्त्वपूर्ण है कि इससे अर्थके अभेदका अभाव अभिप्रेत है । इससे दोनों वर्णसमुदाय या एक निरर्थक भी हों, तब भी यमक रहता है ।⁵ अर्थात् यमकमें वर्णसमुदायकी अर्थवत्ता आवश्यक नहीं है । यदि अर्थ हो, तो वह समान नहीं होना चाहिये । मम्मटका यमकका लक्षण रत्नेश्वरमिश्रकी इस व्याख्याका आधार है : अर्थ होनेपर अर्थके कारण भिन्न वर्णोंकी पुनः श्रुति यमक होता है । मम्मटके इस लक्षणका आधार भामहका लक्षण है । मम्मटने लाटानुप्रास और यमकमें १. स्वतन्त्रस्यान्यतन्त्रस्य पदस्यावर्तना द्विधा । भिन्नप्रयोजनपदस्यावृत्तिं मनुजा विदुः ॥ अग्निपुराण० ३४३।१८ द्वयोरावृत्तपदयोः समस्ता स्यात् समासतः । असमासात् तयोर्व्यस्ता पादे त्वेकत्र विग्रहात् ॥ १९ वाक्यस्यावृत्तिरप्येव यथासम्भवमिष्यते । २० २. विभिन्नार्थैकरूपाया याऽऽवृत्तिर्वर्णसंहतेः । अव्यपेतव्यपेतात्मा यमकं तन्निगद्यते ॥ सरस्वती० २।५८ ३. अर्धाभ्यासः समुद्गः स्यात्, तस्य भेदास्त्रयो मताः । व्यपेतश्चाव्यपेतश्च उभयात्मा च सूरिभिः ॥ सरस्वती० २।६६ ४. सरस्वतीकण्ठाभरण २।६४ तथा इसपर रत्नदर्पण : 'स्थूलं सूक्ष्मं च' इति पूर्वेणापि सम्बध्यते । बहुवर्णवृत्ति स्थूलम् । अबहुवर्णवृत्ति सूक्ष्मम् । उदाहरण १२७ पर : वर्णद्वयपर्यन्तमावृत्तिः सूक्ष्मता । सैवैकवर्णगोचरा सूक्ष्मंतरा । ५. रत्नदर्पण २।५८ : 'विभिन्नार्था' इत्यर्थाभेदव्यतिरेकपरम् । तेन द्वयोरेकस्य वा निरर्थकत्वेऽपि यमकमुपगृहीतं भवति ।
३१३] १ यमक अन्य आचार्योंके मतमें १५ साङ्कर्य निवारणके लिये ‘अर्थ होनेपर’ परिष्कार किया है । ‘समरसमरसोऽयम्’ इत्यादिमें कुछ (आवर्त्य) अंश अर्थवान् हैं, तो कुछ (आवृत्त) अंश अर्थरहित हैं, अतः ‘भिन्न अर्थ वाले’ कहना उचित नहीं है, इस लिये ‘अर्थ होनेपर’ कहा है ।¹ मम्मटके भी भेदनिरूपणका आधार दण्डीका निरूपण है । आचार्य कुन्तकने भी लक्षण भामहके अनुसार और भेद दण्डी अथवा तदनुसारी वामनके अनुसार किया है । पर उन्होंने यमकमें स्थाननियमके अतिरिक्त और किसी प्रकारकी शोभाके अभावके कारण उसके भेदोंका अधिक विस्तार करना उचित नहीं समझा है ।२ आचार्य रुय्यकने यमकमें कुछ स्पष्टता करके बहुत साधारण ढंगसे दिया है : स्वर और व्यञ्जनके समुदायकी अप्ररूढ पुनरुक्ति यमक होता है । यह वर्णसमुदायके (क) भिन्नार्थक, (ख) अभिन्नार्थक एवम् (ग) एक अंशके अर्थरहित और दूसरे अंशके सार्थक होनेके कारण सङ्क्षेपसे तीन प्रकारका होता है ।³ यह भेदकथन मम्मटके कथनका विस्तार है । आचार्य हेमचन्द्रने (१) रुद्रटके श्रुतिक्रमैक्यके और मम्मटके वर्णोंके अर्थ- वान् होनेपर भिन्नार्थताके कथनको मिलाकर अपना लक्षण पूरा किया है ।⁴ १. काव्यप्रकाश ११७ : अर्थे सत्यर्थभिन्नानां * वर्णानां सा पुनः श्रुतिः । यमकम् । ‘समरसमरसोऽयम्’ इत्यादावेकेषामर्थवत्त्वेऽन्येषामनर्थकत्वे ‘भिन्नार्थकानाम्’ इति न युज्यते वक्तुम् । इति ‘अर्थे सति’ इत्युक्तम् । भामहके ‘भिन्नानामभिधेयैः’का अनुवाद है यह । अतः ‘अर्थैर्भिन्नानाम्’ (तृतीया तत्पुरुष) इष्ट है । ‘भिन्ना अर्था येषाम्’ (बहुव्रीहि) में ‘निष्ठा’ (अष्टा० २।२।३६, से ‘भिन्न’ का पूर्वप्रयोग प्राप्त है । आहिताग्न्यादि आकृति गण (३७) से पूर्वप्रयोगका विकल्प मानना प्रयोजनाभावके कारण उचित नहीं है । २. समानवर्णमन्यार्थं, प्रसादि, श्रुतिपेशलम् । औचित्ययुक्तमाद्यादिनियतस्थानशोभि यत् ।। वक्रोक्तिजीवित० २।६ यमकं नाम कोऽप्यस्याः प्रकारः परिदृश्यते । स तु शोभाऽन्तराभावादिह नाति प्रतन्यते ।। ७ ३. अलङ्कारसर्वस्व ७ : स्वरव्यञ्जनसमुदायपौनरुक्त्यं यमकम् । अत्र (क) क्वचिद् भिन्नार्थत्वम्, (ख) क्वचिदभिन्नार्थत्वम्, (ग) क्वचिद् एकस्यानर्थकत्वमपरस्य सार्थकत्वमिति सङ्क्षेपतः प्रकारत्रयम् । ४. काव्यानुशासन, ५ अध्याय, पृष्ठ २४६ : सत्यर्थेऽन्यार्थानां वर्णानां श्रुति- क्रमैक्ये यमकम् ।
१६ काव्यादर्श [३।३ (२) भेदनिरूपण दण्डीकी दिशामें किया है । काव्यमें यमकका महत्त्व : यमकके महत्त्वके बारेमें आचार्य दण्डीका यह कथन बहुत व्यावहारिक है कि यमक अनुप्रासके समान एकान्तमधुर नहीं है । अर्थात् यदि इसका उचित मात्रामें प्रयोग किया जाता है, तब तो यह अनुप्रासके समान शोभाधायक है । पर यदि यमकपर ही जोर दे दिया जाये, तो यह वैरस्यकारक हो जाता है ।¹ • भामहने उस यमकसे कवियोंको कृती माना है, (१) जिसके शब्द प्रसिद्ध हों, (२) जो ओजस्वी हो, (३) जिसके पदोंकी सन्धि सुश्लिष्ट हो' (४) प्रसादगुणयुक्त हो तथा (५) जो अभिधान (उच्चारण) की दृष्टिसे सुखकर हो ।² अर्थात् भामह भी यमकको एकान्तमधुर (केवल आनन्ददायी) नहीं मानते । इसके निबन्धनमें (i) सुखोच्चार्यता और (ii) सुखबोध्यता मुख्यतया अपेक्षित हैं । वामनकी दृष्टि इसके विपरीत है : वे इसमें दुर्बोध्यताकारी विचलन (भङ्ग)को ही उत्कर्षका हेतु मानते हैं ।³ रुद्रटने प्रायेण भामहका कथन ही दुहराया है । एक बात विशेष रूपसे स्पष्ट की है कि महाकाव्योंमें, अर्थात् पद्यबद्ध काव्यविधानोंमें, यमकका प्रयोग कथावस्तु (वर्ण्य विषय) को दृष्टिमें रखते हुए औचित्यको समझकर बहुतायत से करना चाहिये ।⁴ अर्थात् वस्तुकी प्रस्तुतिके यदि वह अनुकूल नहीं है, काव्य १. आवृत्तिं वर्णसङ्घातगोचरां यमकं विदुः । तत्त नैकान्तमधुरमतः पश्चाद् विधास्यते ॥ काव्यादर्श १।६१ २. प्रतीतशब्दमोजस्वि, सुश्लिष्टपदसन्धि च । प्रसादि, स्वभिधानं च यमकं कृतिनां मतम् ॥ काव्यालङ्कार २।१८ ३. काव्याल० सूत्र ४।१।३-७ : भङ्गादुत्कर्षः । शृङ्खला, परिवर्तकश्चूर्णमिति भङ्गमार्गः । वर्णविच्छेदचलनं शृङ्खला । सङ्गविनिवृत्तौ स्वरूपापत्तिः परिवर्तकः । पिण्डाक्षरभेदे स्वरूपलोपश्चूर्णम् । इन तीन मार्गोंमें भी वामन वर्णसमुदायके स्वरूपलोप भेदको सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मानते हैं : अप्राप्तचूर्णभङ्गानि यथास्थानस्थितान्यपि । अलकानीव नात्यर्थं यमकानि चकासति ॥ ४. इति यमकमशेषं सम्यगालोचयद्भिः सुकविभिरभियुक्तैर्वस्तु चौचित्यविद्भिः । सुविहितपदभङ्गं, सुप्रसिद्धाभिधानं तदनु विरचनीयं सर्गबन्धेषु भूम्ना ॥ काव्यालङ्कार ३।५६
३।३] १. यमक अन्य आचार्यों के मतमें १७ की मुख्य शोभाकी मुख्यताके विपरीत है, उचित नहीं है, तो इसका प्रयोग वैरस्यकारक होनेसे हेय होगा। इस प्रकार रुद्रट भी यमकको एकान्तमधुर नहीं मानते। भट्ट लोल्लटने रुद्रटके मन्तव्यको ही यों स्पष्ट किया है : प्रबन्ध काव्य में नदी, पर्वत, समुद्र, वृक्ष (वन), अश्व (यह रथ, गजादिका भी उपलक्षक है), नगर और शत्रुके वर्णनमें श्रम करना कविकी शक्ति और प्रसिद्धिमें फलित होता है। किन्तु यमकके अनुलोम आदि दुष्कर भेद रसके अत्यन्त विरोधी हैं। ये केवल कविका अभिमानमात्र बढ़ाते हैं कि मैं कवि हूँ। अथवा और लोगोंकी देखादेखी एक भेड़चाल है। १ लोल्लटके इस कथनमें अनुलोम तथा तदितर प्रतिलोम आदि दुष्कर चित्रबन्धोंके साहचर्यके कारण यमक भी दुष्कर ही अभिप्रेत है। अतः सुकर यमकका यदि रसाविरोधी प्रयोग किया जाता है, तो वह हेय नहीं होगा। लोल्लटका यह आशय भी इस प्रकार दण्डी के कथनका ही स्पष्टीकरण है। आनन्दवर्धनने भी लोल्लटके अतिरसविरोधित्वको आधार बनाकर ही यमककी काव्यमें उपयोगिताका क्षेत्र यों प्रतिपादित किया है : ध्वनिकी आत्मास्वरूप शृङ्गारमें, उससे भी अधिक विप्रलम्भ शृङ्गारमें, यमक आदि दुष्कर अलङ्कारोंका निबन्धन कवि चाहे जितना समर्थ हो, पर यह उसका मुख्य वस्तुके प्रति प्रमाद ही होगा। कहीं कोई इक्का-दुक्का यमक यदि काव्यमें स्वाभाविक रूपसे आ जाये, तो कोई दोष नहीं है। पर बहुलतासे अन्य अलंकारों के समान रसके अङ्गके रूपमें भी इनका निबन्धन नहीं करना चाहिये। विप्र- लम्भशृङ्गारमें तो बिल्कुल नहीं। यमकके निबन्धनमें शब्दचयनमें विशेष यत्न करना पड़ता है। इससे अर्थ, वह भी रस, उपेक्षित हो जाता है। इस प्रकार १. काव्यानुशासन, ५ अध्याय, यमकपर उद्धृत : तथा च लोल्लटः— 'यस्तु सरिदद्रिसागरनग*तुरगपुरादिवर्णने यत्नः। कविशक्तिख्यातिफलो विततधियां नो मतः प्रबन्धेषु ।। यमकानुलोमतदितरचक्रादिभिदोऽति** रसरोधिन्धः । **अभिमानमात्रमेतद् गड्डुरिकाऽऽदिप्रवाहो वा ।। *शैलवृक्षौ नगावगौ (अमरकोष ३।३।१६) । **रुद्रटीय काव्यालङ्कार ३।५६की नमिब्याख्यामें 'यदुक्तम्' कहकर उद्धृत इस श्लोकमें 'भिदो हि' तथा 'अभिधान' पाठ है ।
१८ काव्यादर्श [३।३
यमकके स्थलमें रस गौण हो जाता है और यमक मुख्य ।¹ मम्मट, हेमचन्द्र, रुय्यक आदि परवर्ती आचार्यपरम्पराने आनन्दवर्धनका मत ही सङ्क्षेपसे या ब्यौरेसे प्रस्तुत किया है ।² आचार्य कुन्तकने वर्णविन्यासवक्रताके अन्तर्गत प्रस्तुत यमकके महत्त्वके बारेमें भामहका अनुसरण करके इसमें (i) प्रसाद गुण, (ii) श्रुतिरञ्जकता अर्थात् कोमलशब्दोंसे विरचितता तथा (iii) औचित्यसे युक्त होना शोभावह बताया है । 'औचित्य' से कुन्तकको वर्ण्य वस्तुके स्वरूपका उत्कर्ष अभीष्ट है ।³ निष्कर्ष : यमकके निबन्धनमें शब्दचयनपर अधिक बल अपेक्षित होनेके कारण (क) वस्तुको सौन्दर्य प्रदान करने वाले अर्थतत्त्वोंकी बलि हो जाती है । अतः यमक हृदयग्राही न होकर वैरस्योत्पादक हो जाता है । (ख) यमकत्वकी निष्पत्तिके लिये रचनामें भाषागत काठिन्य भी आ जाता है, जिससे वह सुख-
१. ध्वन्यात्मभूते शृङ्गारे यमकादिनिबन्धनम् । शक्तावपि प्रमादित्वं, विप्रलम्भे विशेषतः ।। ध्वन्यालोक २।१५ 'प्रमादित्वम्' इत्यनेनैतद् दर्शयते—'काकतालीयन्यायेन कदाचित् कस्यचिदेकस्य यमकादेर्निष्पत्तावपि भूम्नाऽलङ्कारान्तरवद् रसाङ्गत्वेन निबन्धो न कर्तव्य' इति ।...यमके च प्रबन्धेन बुद्धिपूर्वकं क्रियमाणे नियमेनैव यत्नान्तरपरिग्रह आपतति शब्दविशेषान्वेषणरूपः ।...यत्तू रस- वन्ति कानिचिद्* यमकादीनि दृश्यन्ते. तत्र रसादीनामङ्गता, यमकादीनां त्वङ्गितैव । * लोचन : 'कालिदासादिकृतानि' इत्यर्थः । २. काव्यप्रकाश ११८ वृत्ति : ...प्रभूततमभेदम् । तदेतत् काव्यान्तर्गडु*भूत- मिति नास्य भेदलक्षणं कृतम् । काव्यानुशासन, ५ अध्याय, पृष्ठ २५७ : एतस्य च कविशक्तिख्यापनमात्रफलत्वेन पुरुषार्थोपदेशानुपायत्वात् काव्यगडुभूततेति भेदलक्षणं न कृतम् । अलङ्कारसर्वस्व, ७, के 'सङ्क्षेपतः' का तात्पर्य जयरथने यह बताया है : एतच्च “काव्यात्मभूतरसचर्वणा- प्रत्यूहकारित्वात् प्रपञ्चयितुं न योग्यम्, इति चिरन्तनालङ्कारवन्न विभज्य लक्षितम्” इति भावः । * गडुः पृष्ठगुडे, कुब्जे (विश्वकोष) । गुडो गोलेक्षुपाकयोः (अमरकोष ३।३।४२) । ३. समानवर्णमन्यार्थं, प्रसादि, श्रुतिपेशलम् । औचित्ययुक्तम्, आद्यादिनियतस्थानशोभि यत् ।। वक्रोक्ति० २।६ औचित्यं वस्तुनः स्वभावोत्कर्षः ।... यत्र यमकोपनिबन्धनव्यसनित्वेनाप्यौ- चित्यमपरिक्लानमित्यर्थः ।