भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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८ काव्यादर्श [३१३ नुप्राससे यमकको पृथक् करनेको, पर यह उनके अपने उदाहरणोंपर ही लागू नहीं होता । विशेषकर 'अर्थोंसे भेदकथन'का अंश । उनके उदाहरणोंमें समानार्थक पदोंकी आवृत्ति यदि है, तो अर्थरहित शब्दांश वर्णसमुदायकी आवृत्ति भी है ।¹ सम्भवतः इस दोषके परिहारके लिये परवर्ती अलङ्कार- शास्त्रियोंने 'यदि आवृत्त वर्ण सार्थक हैं, तो उनका अर्थ पृथक् होना चाहिये', यह परिष्कार किया है ।² ऊपरी तौरपर यह त्रुटि भरतके लक्षणमें भी थी : शब्दसे सार्थक वर्ण ही अभिप्रेत होते हैं । पर भरतके उदाहरणोंसे यह स्पष्ट हो जाता है कि भरतको यहाँ 'शब्द'का यह पारिभाषिक अर्थ अभीष्ट नहीं है । उनमें सार्थक समानार्थक शब्दोंकी भी आवृत्ति है, तो निरर्थक, वर्णसमुदायकी भी । दण्डीने स्पष्टतः वर्णसमुदायकी आवृत्तिमें यमक बताकर इस त्रुटिका सर्वथा परिहार कर दिया है । उन्होंने यमकमें अर्थकी अपेक्षापर विचार ही नहीं किया । इस लिये दण्डीका यमक पूर्णतया शब्दालङ्कार है । भामहका यमक उसमें अर्थपार्थक्यकी अपेक्षाके कारण उभयालङ्कारकी स्थितिको प्राप्त है । वह विशुद्ध शब्दालङ्कार नहीं है । लाटानुप्रासकी कल्पना भरतके समान दण्डीके यहाँ नहीं है । उसकी स्थिति यमकमें ही समावेशसे है । इन दोनों अलङ्कारोंमें भेद परवर्ती अलङ्कारशास्त्रियों भामह और उद्भटने आवृत्त शब्द या पदकी समानार्थकताके कारण ही माना है । अन्यथा दोनोंमें शब्दकी आवृत्तिसे शोभाकारिता समान धर्म है । वस्तुतः शब्दकी समानार्थकतासे लाटानुप्रासमें कोई विशेष चारुत्व नहीं उत्पन्न होता । आवृत्तिका ही चारुत्व होता है । इसे यदि अलङ्कार माना भी जाता है, तो अर्थविचारके कारण ही यमकसे पार्थक्य अभीष्ट होनेसे इसे शब्दार्थो- भयालङ्कार कहना चाहिये, केवल शब्दालङ्कार नहीं । यदि यमकसे पृथक् नाम ही देना था, तो इसे 'लाटीययमक' कहना चाहिये, 'अनुप्रास' नहीं । अनुप्रासमें वर्णोंकी आवृत्ति अपेक्षित होती है, पूरे शब्दकी नहीं । इसी प्रकार १. संसाराद्···असारात्, क्लेशान्त···प्रशान्तम्, व्याधीनां···मधीनां, ज्याय- स्त्वं···नयस्त्वम् (२।१२); रमणीयेषु सङ्गता···रमणी येषु सङ्गता (१३), सितासिताक्षी सुपयोधराधराम् सुसम्मदं व्यक्तमदां ललामदाम् । घनाघनानीलघनाघनालकां···मुत्सुकयन्ति यन्ति च (१४); समग्रशासनाः, प्रतिबद्धशासनाः । मार्गभिदां च शासनाः···तादृशासनाः (१५) । २. काव्यप्रकाश ११७ : अर्थे सत्यर्थभिन्नानां वर्णानां सा पुनः श्रुतिः । यमकम् ।