काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
पृष्ठ 32, कुल 270 में से
संदर्भ में पढ़ें१।३] १ यमक अन्य आचार्योंके मतमें ६ उद्भटद्वारा उद्भावित 'पुनरुक्तवदाभास' अलङ्कारमें चारुत्वाधानका हेतु अर्थ की आवृत्तिका आभास है, उसके अधिष्ठान शब्द (उच्चार्य और श्रव्य वाक्) की आवृत्ति नहीं है । अतः वह न शब्दालङ्कार है, न उभयालङ्कार ही है । इसके अतिरिक्त, भामहने यमकमें कुछ और विशेषताएँ भी वाञ्छनीय बताई हैं : यमकके शब्द प्रसिद्ध हों; वह ओजस्वी और पदोंकी सुघटित सन्धि वाला हो, प्रसादयुक्त एवं भली भाँति अर्थाभिधान करने वाला हो ।१ स्पष्ट है कि ये विशेषताएँ तो काव्यकी सामान्य अपेक्षाएँ हैं । इनका यमकसे कुछ विशेष लेना देना नहीं है । भामहके मतमें नाना धातुओंके अर्थोंसे गम्भीर यमक कहनेको ही 'यमक' होता है, वस्तुतः तो वह 'पहेली' ही है । इसका निरूपण रामशर्माने 'अच्युतो- त्तर' ग्रन्थमें किया है ।२ उद्भटने शब्दालङ्कारोंमें पुनरुक्तवदाभास और छेकानुप्रासकी उद्भावना की है और भामहोक्त ग्राम्य और उपनागरिका वृत्तियोंमें विभक्त द्विविध अनुप्रासमें एक परुषा वृत्ति और जोड़कर त्रिविध वृत्त्यनुप्रासका निरूपण करके लाटानुप्रासका विस्तरेण प्रतिपादन किया है । उनके लाटानुप्रासके कई उदा- हरण भरतके पादान्तयमक (नाट्यशास्त्र १६।६७), काञ्चीयमक (६६), समुद्गयमक (७१), चक्रवालयमक (७५) और सन्दष्टयमक (७७)के उदा- हरणोंसे मिलते-जुलते तो हैं ही, उनका लाटानुप्रासका लक्षण भी यमकको कुछ-कुछ समेटता प्रतीत होता है : शब्दों या पदोंके स्वरूप और अर्थमें अभेद होनेपर भी फल (तात्पर्य)के भेदके कारण पुनरुक्ति लाटानुप्रास कहाती है ।३ यहाँ कुछ विचार अपेक्षित है : (१) स्वरूपके भेदमें आवृत्ति (पुनरुक्ति) सम्भव ही नहीं है, अतः उसके अभेदका कथन स्वतः प्राप्त होनेसे यहाँ अपे- क्षित नहीं है । यदि इसे कहा भी है, तो यह प्राप्तका अनुवाद मात्र है, विधान नहीं है । अनुवाद लक्षणका अङ्ग नहीं हुआ करता । (२) अर्थके अभेदमें शब्दों या पदोंकी तात्पर्यभेदसे पुनरुक्तिसे लाटानुप्रासकी निष्पत्ति सिद्ध हो १. प्रतीतशब्दभोजस्वि, सुश्लिष्टपदसन्धि च । प्रसादि, स्वभिधानं च यमकं कृतिनां मतम् ॥ काव्यालङ्कार २।१८ २. नानाधात्वर्थगम्भीरा, यमकव्यपदेशिनी । प्रहेलिका सा ह्युदिता रामशर्माच्युतोत्तरे ॥ काव्यालङ्कार २।१६ ३. स्वरूपार्थाविशेषेऽपि पुनरुक्तिः फलान्तरात् । शब्दानां वा, पदानां वा लाटानुपास इष्यते ॥ काव्या०सार १।६