भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 33

१० काव्यादर्श [३१३ जानेके कारण यहां 'अपि' (भी') पदका प्रयोग किसी अनुक्त पदार्थका समु- च्चय करता है, और वह अनुक्त पदार्थ है अर्थका भेद । अर्थात् अर्थके अभेद और भेदमें लाटानुप्रास निष्पन्न होता है । यह स्थिति यमककी है। भरतके यमकके उदाहरणोंमें दोनों प्रकारके शब्दों और पदोंका अभ्यास उपलब्ध है । अतः यमकसे लाटानुप्रासको पृथक् करनेके लिये यहाँसे 'अपि'को हटाना होगा । तब यह भामहके यमकके ठीक विपरीत हो जायेगा । अन्तर केवल भामहके 'वर्णानां'के स्थानपर 'शब्दों' और 'पदों'का रहेगा । भामहको 'वर्णों' से निरर्थक और सार्थक वर्णसमुदाय अभीष्ट है, जबकि उद्भटको लाटानुप्रास में सार्थक वर्णसमुदाय ही । अतः दोनों अलङ्कारोंमें मुख्यभेद अर्थके भेद और अभेदका है । इस अन्तरकी प्राप्तिमें 'अपि' बाधक है । वामनने (१) पादादि स्थानोंके नियमनकी बात दण्डीकी ली, और (२) भिन्नार्थताकी बात भामहकी तथा (३) पद या वर्णकी आवृत्तिमें भरतका अनुकरण किया है : जिसका अर्थ एक ही नहीं है, अर्थात् भिन्न है, ऐसा पद या (अक्षर स्थानके नियमसे, हुआ नियत स्थानमें आवृत्त हुआ) 'यमक' कहलाता है ।१ 'स्थाननियम'की उनकी व्याख्या है : पद या वर्णकी अन्य पादमें वृत्तिसे आवृत्ति (स्ववृत्त्या आवृत्ति), तथा समानजातीय पद या वर्णके द्वारा पूरे स्वरूपसे या एकदेशसे अनेक पादोंकी व्याप्ति स्थाननियम है । एक पाद के भागोंमें ही अगर आवृत्ति है, तो वह अन्य श्लोकोंमें स्थित संस्थाननियम की अपेक्षासे स्थाननियम है । पाद, एक और एकाधिक पादोंके आदि, मध्य और अन्त भाग, ये नियत होने वाले स्थान हैं ।२ यहाँ वामनके 'आदिमध्यान्तभागा:'का विग्रह करके दण्डीके समान (क १) आदि, (२) मध्य, (३) अन्त, (ख १) आदि-मध्य, (२) मध्य-अन्त), (३) आदि-अन्त, (ग) आदि-मध्य-अन्त, ये सात स्थान निष्पन्न होते हैं । 'एक, अनेक पाद' कथनसे दण्डीके (क) एकपाद— (१) प्रथम, (२) द्वितीय, (३) तृतीय और (४) चतुर्थ, (ख) द्विपाद— (१) १. काव्याल०सूत्र ४।१।१ : पदमनेकार्थमक्षरं वा वृत्तं स्थाननियमे यमकम् । ...अनेकार्थं भिन्नार्थम् । स्ववृत्त्या, सजातीयेन वा कार्त्स्न्यैकदेशाभ्या- मनेकपादव्याप्तिः स्थाननियमः । यानि त्वेकपादभागवृत्तीनि यमकानि दृश्यन्ते, तेषु श्लोकान्तरस्थसंस्थाननियमापेक्षयैव स्थाननियम इति । २. काव्यालङ्कारसूत्र ४।१।२ : पादः, पादस्यैकस्यानेकस्य चादिमध्यान्तभागाः स्थानानि ।