भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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३।३] १ यमक अन्य आचार्योंके मतमें ११ प्रथम-द्वितीय, (२) प्रथम-तृतीय, (३) प्रथम-चतुर्थ, (४) द्वितीय-तृतीय, (५) द्वितीय-चतुर्थ, (६) तृतीय-चतुर्थ, (ग) त्रिपाद—(१) प्रथम-द्वितीय-तृतीय, (२) प्रथम-द्वितीय-चतुर्थ, (३) प्रथम-तृतीय-चतुर्थ, एवं (घ) चारों पादोंमें एक भेद निष्पन्न होते हैं । इन शुद्ध भेदोंके अतिरिक्त इनके सङ्करसे भी भेदोंकी उत्प्रेक्षा करनेकी राय वामनने दी है । इस प्रकार वामनके इस निरूपणपर दण्डीका प्रभाव स्पष्ट है । वामनके उदाहरणोंमें एक बात ध्यातव्य है कि यमकके घटक दोनों अवयव (आवर्त्य और आवृत्त) सब जगह सार्थक नहीं हैं । आवर्त्य यदि सार्थक है, तो आवृत्त अंश प्रायः निरर्थक वर्णसमुदाय है । अतः लक्षणमें 'अर्थ'का समावेश उदाहरणोंके प्रतिकूल है । इसके अतिरिक्त, वामनने एक या अधिक वर्णोंकी आवृत्तिसे जो यमक बताया है,१ उसकी यमकता भरतके समय भले उचित होती, पर वस्तुतः तो वह अनुप्रास ही है । भरतके मालायमकके अनुकरणमें वामनने 'पदयमकमाला' और वर्ण- यमकमाला' भी बताई हैं । वामनने वर्णविच्छेदसे यमकके शृङ्खला, परिवर्तन एवं चूर्ण नामक प्रकारों में उत्कर्ष बताया है ।२ वह वैयाकरणको भले 'उत्कर्ष' प्रतीत हो, काव्यरसे- च्छुको तो वेदनानिग्रहरसका सेवन करनेको बाध्य कर देगा । यही स्थिति उनके अद्भुत यमककी है, जिसमें विभक्तियोंके वैविध्य, एक वचन आदि सङ्ख्याओंकी, कारककी और सुबन्त और तिङन्त पदोंकी आवृत्ति विच्छेदसे होनेसे यमक निष्पन्न माना जाता है ।३ इस प्रकारके यमकके लिए भामहने १. काव्यालङ्कारसूत्र ४।१।२ पर वृत्ति : अक्षरयमकं त्वेकाक्षरमनेकाक्षरं च । एकाक्षरं यथा— नानाकारेण कान्ताभ्रूराराधितमनोभुवा । विविक्तेन विलासेन ततक्ष हृदयं नृणाम् ॥ २. काव्यालङ्कारसूत्र ३-४ : भङ्गादुत्कर्षः । भङ्गो नाम वर्णविच्छेदः । शृङ्खला परिवर्तकश्चूर्णमिति भङ्गमार्गः । ३. विभक्तीनां विभक्तत्वं, संख्यायाः, कारकस्य च । आवृत्तिः सुप्तिङन्तानां मिथश्च यमकाद्भुतम् ॥ काव्या० सूत्र ४।१।७