काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ काव्यादर्श [३।३ ठीक ही कहा था कि यदि काव्य भी शास्त्रके समान व्याख्यासे ही समझ आने लगे, तो इससे सुधी लोग ही आनन्दित होंगे, अल्पबुद्धि (साधारण जन) तो बेचारे मारे गये।¹ वामनने अनुप्रासका निरूपण सङ्क्षेपसे भेदकथनके बिना ही किया है। उद्भटके मतमें लाटानुप्रासके माने जाने वाले उदाहरणोंको वामनने सामान्य 'अनुप्रास' के उदाहरणोंके रूपमें ही दिया है।² रुद्रटने यमकका भामहोक्त लक्षण ही अपना लिया है, अन्तर वर्णोंके क्रम की तुल्यताका समावेश करने भरका है। नमि साधुने इसका प्रयोजन प्रति- लोम, अनुलोम, सर्वतोभद्र नामक बन्धों और अनुप्रास आदिका यमकसे भेद करना बताया है। भिन्नार्थताका प्रयोजन पुनरुक्त और यमकमें भेद बताना है। रुद्रटको 'अन्यार्थानां वर्णानाम्'में 'अर्थ' से 'वाच्य' ही नहीं, 'तात्पर्य' भी अभीष्ट है। यह स्पष्टतः रुद्रट द्वारा लाटानुप्रासको पृथक् अलङ्कारके रूपमें निरूपित करनेसे सम्बद्ध है। अर्थात् वे लाटानुप्रासको यमक ही मानते हैं। रुद्रटने यमकका विषय प्रायः छन्दमें, अर्थात् पद्य काव्यमें, ही बताया है।³ १. काव्यान्यपि यदिमानि व्याख्यागम्यानि शास्त्रवत् । उत्सवः सुधियामेव, हन्त दुर्मेधसो हताः ॥ काव्यालङ्कार २।२० २. काव्या० सूत्र ४।१।८ : शेषः सरूपोऽनुप्रासः । पदमेकार्थमनेकार्थं च स्था- नानियतं, तद्द्विधमक्षरं च शेषः । विशेषार्थं च 'सरूप'-ग्रहणम्— कात्स्न्येनैवावृत्तिः, कात्स्न्यैकदेशाभ्यां तु सारूप्यमिति । ६ : अनुलवणो वर्णानुप्रासः श्रेयान् । १० : पादानुप्रासः पादयमकवत् । यथा— कविराजमविज्ञाय कुतः काव्यक्रियादरः । कविराजं च विज्ञाय कुतः काव्यक्रियादरः ।। ३. तुल्यश्रुतिक्रयाणामन्यार्थानां मिथस्तु वर्णानाम् । पुनरावृत्तिर्यमकं, प्रायश्छन्दांसि विषयोऽस्य ।। काव्यालङ्कार ३।१ नमिटीका : 'क्रम'-ग्रहणात्प्रतिलोमानुलोम सर्वतोभद्रानुप्रासादीनां यमक- त्वनिरासः । 'मिथोन्यार्थानाम्' ... इत्यनेन तु पुनरुक्तस्य यमकत्वव्यु- दासः । 'अन्यार्था' इत्यत्र 'अर्थ'-शब्दः प्रयोजनवाच्यऽपि । विजृम्भितोद्दामरसेन चेतसां निरूप्यमाणं किमपि प्रियावपुः । तदेव वैराग्यवतो विभागशो निरूप्यमाणं किमपि प्रियावपुः ।।