काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३।३] १ यमक अन्य आचार्योंके मतमें १३ यमकके भेदोंके बारेमें रुद्रटते दण्डीका निरूपण थोड़ा इधर-उधर करके प्रस्तुत किया है : (क) पूरे पादोंकी आवृत्तिसे और (ख) पादके एक भाग- की आवृत्तिसे यमकके प्रथमतः दो भेद हैं। (क) प्रथम समस्तपादजके पादावृत्तिसे ६, अर्धवृत्तिसे और श्लोकावृत्तिसे एकेक, कुल ११ भेद बताये- हैं। (ख) एकदेशाजके पादोंके प्रथमार्धकी आवृत्तिसे आचार्यने २० भेद किये हैं। पादके उत्तरार्धकी अग्रिम पादके प्रथमार्धमें आवृत्तिसे ३ भेद बताए हैं। इत्यादि। रुद्रटके ये भेद नामकरणकी दृष्टिसे कल्पनाप्रवण हैं। इसका मूल स्रोत भरतके काञ्ची, शिखा, चक्रवाल, समुद्ग और सन्दष्ट आदि प्रकारके यमक हैं। विविध प्रकारके बन्धोंका मूल भी इसी प्रकारके यमकोंमें निहित है। अग्निपुराणमें एक वर्णकी पञ्चविध वृत्तियोंसे अनुप्रास बताया है। यही अन्यत्र वृत्तियोंके कारण 'वृत्त्यनुप्रास' नामसे कहा गया है। भिन्नार्थ- प्रतिपादिका अनेकवर्णवृत्ति यमक होती है। उसके अव्यपेत (आनन्तर्य) और व्यपेत दो भेद बताये हैं। इन दोनों ही प्रकारके यमकोंके पाद और उनमें स्थानके भेदसे चार प्रकार बताये हैं। स्थानभेदसे यह सात प्रकारका होता है।¹ इस प्रकार स्पष्ट है कि अग्निपुराणमें (१) लक्षणोंके बारेमें भामहका और (२) भेदोंके बारेमें दण्डीकी दृष्टिका आश्रय मुख्य रूपसे लिया गया है। अग्निपुराणके अलङ्कारशास्त्रीने भरतोक्त १० यमकोंको श्रेष्ठ यमक बताकर उनके अन्य बहुतसे भेद बताये है।² यहाँ लाटानुप्रासको 'आवृत्ति' के नामसे दिया गया है—भिन्न प्रयोजन वाले स्वतन्त्र और परतन्त्र पदकी दो प्रकारकी आवृत्तिसे 'आवृत्ति' अलङ्कार निष्पन्न होता है : (१) दोनों पदोंमें समाससे समस्ता आवृत्ति तथा समासाभावमें व्यस्ता होती है। यह व्यस्ता एक पादमें विग्रहसे भी निष्पन्न होती है। सम्भवतः यह भेद वामन १. स्यादावृत्तिरनुप्रासो वर्णानां पदवाक्ययोः । एकवर्णानिकवर्णवृत्तेर्वर्णगणो द्विधा ।। अग्निपुराण ३४३।१ एकवर्णगतावृत्तेर्जायन्ते पञ्च वृत्तयः । मधुरा, ललिता, प्रौढा, भद्रा परुषया सह ।। २ अनेकवर्णवृत्तिर्या भिन्नार्थप्रतिपादिका ।। ११ यमकं साऽव्यपेतं च व्यपेतं चेति तद् द्विधा । १२ इत्यादि २. पादान्तयमक चैव...मान्तायमकमेव च । दशधा यमकं श्रेष्ठं, तद्भेदा बहवोऽपरे ।। अग्निपुराण० ३४३।१७