काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
३।३] १ यमक अन्य आचार्योंके मतमें १३ यमकके भेदोंके बारेमें रुद्रटते दण्डीका निरूपण थोड़ा इधर-उधर करके प्रस्तुत किया है : (क) पूरे पादोंकी आवृत्तिसे और (ख) पादके एक भाग- की आवृत्तिसे यमकके प्रथमतः दो भेद हैं। (क) प्रथम समस्तपादजके पादावृत्तिसे ६, अर्धवृत्तिसे और श्लोकावृत्तिसे एकेक, कुल ११ भेद बताये- हैं। (ख) एकदेशाजके पादोंके प्रथमार्धकी आवृत्तिसे आचार्यने २० भेद किये हैं। पादके उत्तरार्धकी अग्रिम पादके प्रथमार्धमें आवृत्तिसे ३ भेद बताए हैं। इत्यादि। रुद्रटके ये भेद नामकरणकी दृष्टिसे कल्पनाप्रवण हैं। इसका मूल स्रोत भरतके काञ्ची, शिखा, चक्रवाल, समुद्ग और सन्दष्ट आदि प्रकारके यमक हैं। विविध प्रकारके बन्धोंका मूल भी इसी प्रकारके यमकोंमें निहित है। अग्निपुराणमें एक वर्णकी पञ्चविध वृत्तियोंसे अनुप्रास बताया है। यही अन्यत्र वृत्तियोंके कारण 'वृत्त्यनुप्रास' नामसे कहा गया है। भिन्नार्थ- प्रतिपादिका अनेकवर्णवृत्ति यमक होती है। उसके अव्यपेत (आनन्तर्य) और व्यपेत दो भेद बताये हैं। इन दोनों ही प्रकारके यमकोंके पाद और उनमें स्थानके भेदसे चार प्रकार बताये हैं। स्थानभेदसे यह सात प्रकारका होता है।¹ इस प्रकार स्पष्ट है कि अग्निपुराणमें (१) लक्षणोंके बारेमें भामहका और (२) भेदोंके बारेमें दण्डीकी दृष्टिका आश्रय मुख्य रूपसे लिया गया है। अग्निपुराणके अलङ्कारशास्त्रीने भरतोक्त १० यमकोंको श्रेष्ठ यमक बताकर उनके अन्य बहुतसे भेद बताये है।² यहाँ लाटानुप्रासको 'आवृत्ति' के नामसे दिया गया है—भिन्न प्रयोजन वाले स्वतन्त्र और परतन्त्र पदकी दो प्रकारकी आवृत्तिसे 'आवृत्ति' अलङ्कार निष्पन्न होता है : (१) दोनों पदोंमें समाससे समस्ता आवृत्ति तथा समासाभावमें व्यस्ता होती है। यह व्यस्ता एक पादमें विग्रहसे भी निष्पन्न होती है। सम्भवतः यह भेद वामन १. स्यादावृत्तिरनुप्रासो वर्णानां पदवाक्ययोः । एकवर्णानिकवर्णवृत्तेर्वर्णगणो द्विधा ।। अग्निपुराण ३४३।१ एकवर्णगतावृत्तेर्जायन्ते पञ्च वृत्तयः । मधुरा, ललिता, प्रौढा, भद्रा परुषया सह ।। २ अनेकवर्णवृत्तिर्या भिन्नार्थप्रतिपादिका ।। ११ यमकं साऽव्यपेतं च व्यपेतं चेति तद् द्विधा । १२ इत्यादि २. पादान्तयमक चैव...मान्तायमकमेव च । दशधा यमकं श्रेष्ठं, तद्भेदा बहवोऽपरे ।। अग्निपुराण० ३४३।१७
१४ काव्यादर्श [३१३ के भङ्गवान् अनुप्रासपर आधारित है । वाक्यकी भी आवृत्ति हो जाती है ।¹ महाराज भोज यमक और लाटानुप्रासको पृथक्-पृथक् मानते हैं । इस लिये उन्होंने भी (१) लक्षणमें भामहका और (२) भेदकथनमें दण्डीका अनु- करण किया है ।² एक अन्तर है : अव्यपेत, व्यपेत और उभयात्मकको उन्होंने समुद्गापरपर्याय अर्धाभ्यास यमकमें सीमित माना है । दण्डीके समान साधा- रण भेद नहीं बताया है ।³ इसके अतिरिक्त इन्होंने कई वर्णोंकी आवृत्तिमें स्थूल और अल्पवर्णों (दो वर्णों) की आवृत्तिमें सूक्ष्म भेद भी माने हैं । रत्ने- श्वरमिश्रने एकवर्णकी आवृत्तिको सूक्ष्मतर बताया है ।⁴ आवृत्तिकी विषय वर्णसंहतिकी विभिन्नार्थतापर रत्नेश्वरमिश्रका यह कथन महत्त्वपूर्ण है कि इससे अर्थके अभेदका अभाव अभिप्रेत है । इससे दोनों वर्णसमुदाय या एक निरर्थक भी हों, तब भी यमक रहता है ।⁵ अर्थात् यमकमें वर्णसमुदायकी अर्थवत्ता आवश्यक नहीं है । यदि अर्थ हो, तो वह समान नहीं होना चाहिये । मम्मटका यमकका लक्षण रत्नेश्वरमिश्रकी इस व्याख्याका आधार है : अर्थ होनेपर अर्थके कारण भिन्न वर्णोंकी पुनः श्रुति यमक होता है । मम्मटके इस लक्षणका आधार भामहका लक्षण है । मम्मटने लाटानुप्रास और यमकमें १. स्वतन्त्रस्यान्यतन्त्रस्य पदस्यावर्तना द्विधा । भिन्नप्रयोजनपदस्यावृत्तिं मनुजा विदुः ॥ अग्निपुराण० ३४३।१८ द्वयोरावृत्तपदयोः समस्ता स्यात् समासतः । असमासात् तयोर्व्यस्ता पादे त्वेकत्र विग्रहात् ॥ १९ वाक्यस्यावृत्तिरप्येव यथासम्भवमिष्यते । २० २. विभिन्नार्थैकरूपाया याऽऽवृत्तिर्वर्णसंहतेः । अव्यपेतव्यपेतात्मा यमकं तन्निगद्यते ॥ सरस्वती० २।५८ ३. अर्धाभ्यासः समुद्गः स्यात्, तस्य भेदास्त्रयो मताः । व्यपेतश्चाव्यपेतश्च उभयात्मा च सूरिभिः ॥ सरस्वती० २।६६ ४. सरस्वतीकण्ठाभरण २।६४ तथा इसपर रत्नदर्पण : 'स्थूलं सूक्ष्मं च' इति पूर्वेणापि सम्बध्यते । बहुवर्णवृत्ति स्थूलम् । अबहुवर्णवृत्ति सूक्ष्मम् । उदाहरण १२७ पर : वर्णद्वयपर्यन्तमावृत्तिः सूक्ष्मता । सैवैकवर्णगोचरा सूक्ष्मंतरा । ५. रत्नदर्पण २।५८ : 'विभिन्नार्था' इत्यर्थाभेदव्यतिरेकपरम् । तेन द्वयोरेकस्य वा निरर्थकत्वेऽपि यमकमुपगृहीतं भवति ।
३१३] १ यमक अन्य आचार्योंके मतमें १५ साङ्कर्य निवारणके लिये ‘अर्थ होनेपर’ परिष्कार किया है । ‘समरसमरसोऽयम्’ इत्यादिमें कुछ (आवर्त्य) अंश अर्थवान् हैं, तो कुछ (आवृत्त) अंश अर्थरहित हैं, अतः ‘भिन्न अर्थ वाले’ कहना उचित नहीं है, इस लिये ‘अर्थ होनेपर’ कहा है ।¹ मम्मटके भी भेदनिरूपणका आधार दण्डीका निरूपण है । आचार्य कुन्तकने भी लक्षण भामहके अनुसार और भेद दण्डी अथवा तदनुसारी वामनके अनुसार किया है । पर उन्होंने यमकमें स्थाननियमके अतिरिक्त और किसी प्रकारकी शोभाके अभावके कारण उसके भेदोंका अधिक विस्तार करना उचित नहीं समझा है ।२ आचार्य रुय्यकने यमकमें कुछ स्पष्टता करके बहुत साधारण ढंगसे दिया है : स्वर और व्यञ्जनके समुदायकी अप्ररूढ पुनरुक्ति यमक होता है । यह वर्णसमुदायके (क) भिन्नार्थक, (ख) अभिन्नार्थक एवम् (ग) एक अंशके अर्थरहित और दूसरे अंशके सार्थक होनेके कारण सङ्क्षेपसे तीन प्रकारका होता है ।³ यह भेदकथन मम्मटके कथनका विस्तार है । आचार्य हेमचन्द्रने (१) रुद्रटके श्रुतिक्रमैक्यके और मम्मटके वर्णोंके अर्थ- वान् होनेपर भिन्नार्थताके कथनको मिलाकर अपना लक्षण पूरा किया है ।⁴ १. काव्यप्रकाश ११७ : अर्थे सत्यर्थभिन्नानां * वर्णानां सा पुनः श्रुतिः । यमकम् । ‘समरसमरसोऽयम्’ इत्यादावेकेषामर्थवत्त्वेऽन्येषामनर्थकत्वे ‘भिन्नार्थकानाम्’ इति न युज्यते वक्तुम् । इति ‘अर्थे सति’ इत्युक्तम् । भामहके ‘भिन्नानामभिधेयैः’का अनुवाद है यह । अतः ‘अर्थैर्भिन्नानाम्’ (तृतीया तत्पुरुष) इष्ट है । ‘भिन्ना अर्था येषाम्’ (बहुव्रीहि) में ‘निष्ठा’ (अष्टा० २।२।३६, से ‘भिन्न’ का पूर्वप्रयोग प्राप्त है । आहिताग्न्यादि आकृति गण (३७) से पूर्वप्रयोगका विकल्प मानना प्रयोजनाभावके कारण उचित नहीं है । २. समानवर्णमन्यार्थं, प्रसादि, श्रुतिपेशलम् । औचित्ययुक्तमाद्यादिनियतस्थानशोभि यत् ।। वक्रोक्तिजीवित० २।६ यमकं नाम कोऽप्यस्याः प्रकारः परिदृश्यते । स तु शोभाऽन्तराभावादिह नाति प्रतन्यते ।। ७ ३. अलङ्कारसर्वस्व ७ : स्वरव्यञ्जनसमुदायपौनरुक्त्यं यमकम् । अत्र (क) क्वचिद् भिन्नार्थत्वम्, (ख) क्वचिदभिन्नार्थत्वम्, (ग) क्वचिद् एकस्यानर्थकत्वमपरस्य सार्थकत्वमिति सङ्क्षेपतः प्रकारत्रयम् । ४. काव्यानुशासन, ५ अध्याय, पृष्ठ २४६ : सत्यर्थेऽन्यार्थानां वर्णानां श्रुति- क्रमैक्ये यमकम् ।
१६ काव्यादर्श [३।३ (२) भेदनिरूपण दण्डीकी दिशामें किया है । काव्यमें यमकका महत्त्व : यमकके महत्त्वके बारेमें आचार्य दण्डीका यह कथन बहुत व्यावहारिक है कि यमक अनुप्रासके समान एकान्तमधुर नहीं है । अर्थात् यदि इसका उचित मात्रामें प्रयोग किया जाता है, तब तो यह अनुप्रासके समान शोभाधायक है । पर यदि यमकपर ही जोर दे दिया जाये, तो यह वैरस्यकारक हो जाता है ।¹ • भामहने उस यमकसे कवियोंको कृती माना है, (१) जिसके शब्द प्रसिद्ध हों, (२) जो ओजस्वी हो, (३) जिसके पदोंकी सन्धि सुश्लिष्ट हो' (४) प्रसादगुणयुक्त हो तथा (५) जो अभिधान (उच्चारण) की दृष्टिसे सुखकर हो ।² अर्थात् भामह भी यमकको एकान्तमधुर (केवल आनन्ददायी) नहीं मानते । इसके निबन्धनमें (i) सुखोच्चार्यता और (ii) सुखबोध्यता मुख्यतया अपेक्षित हैं । वामनकी दृष्टि इसके विपरीत है : वे इसमें दुर्बोध्यताकारी विचलन (भङ्ग)को ही उत्कर्षका हेतु मानते हैं ।³ रुद्रटने प्रायेण भामहका कथन ही दुहराया है । एक बात विशेष रूपसे स्पष्ट की है कि महाकाव्योंमें, अर्थात् पद्यबद्ध काव्यविधानोंमें, यमकका प्रयोग कथावस्तु (वर्ण्य विषय) को दृष्टिमें रखते हुए औचित्यको समझकर बहुतायत से करना चाहिये ।⁴ अर्थात् वस्तुकी प्रस्तुतिके यदि वह अनुकूल नहीं है, काव्य १. आवृत्तिं वर्णसङ्घातगोचरां यमकं विदुः । तत्त नैकान्तमधुरमतः पश्चाद् विधास्यते ॥ काव्यादर्श १।६१ २. प्रतीतशब्दमोजस्वि, सुश्लिष्टपदसन्धि च । प्रसादि, स्वभिधानं च यमकं कृतिनां मतम् ॥ काव्यालङ्कार २।१८ ३. काव्याल० सूत्र ४।१।३-७ : भङ्गादुत्कर्षः । शृङ्खला, परिवर्तकश्चूर्णमिति भङ्गमार्गः । वर्णविच्छेदचलनं शृङ्खला । सङ्गविनिवृत्तौ स्वरूपापत्तिः परिवर्तकः । पिण्डाक्षरभेदे स्वरूपलोपश्चूर्णम् । इन तीन मार्गोंमें भी वामन वर्णसमुदायके स्वरूपलोप भेदको सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मानते हैं : अप्राप्तचूर्णभङ्गानि यथास्थानस्थितान्यपि । अलकानीव नात्यर्थं यमकानि चकासति ॥ ४. इति यमकमशेषं सम्यगालोचयद्भिः सुकविभिरभियुक्तैर्वस्तु चौचित्यविद्भिः । सुविहितपदभङ्गं, सुप्रसिद्धाभिधानं तदनु विरचनीयं सर्गबन्धेषु भूम्ना ॥ काव्यालङ्कार ३।५६
३।३] १. यमक अन्य आचार्यों के मतमें १७ की मुख्य शोभाकी मुख्यताके विपरीत है, उचित नहीं है, तो इसका प्रयोग वैरस्यकारक होनेसे हेय होगा। इस प्रकार रुद्रट भी यमकको एकान्तमधुर नहीं मानते। भट्ट लोल्लटने रुद्रटके मन्तव्यको ही यों स्पष्ट किया है : प्रबन्ध काव्य में नदी, पर्वत, समुद्र, वृक्ष (वन), अश्व (यह रथ, गजादिका भी उपलक्षक है), नगर और शत्रुके वर्णनमें श्रम करना कविकी शक्ति और प्रसिद्धिमें फलित होता है। किन्तु यमकके अनुलोम आदि दुष्कर भेद रसके अत्यन्त विरोधी हैं। ये केवल कविका अभिमानमात्र बढ़ाते हैं कि मैं कवि हूँ। अथवा और लोगोंकी देखादेखी एक भेड़चाल है। १ लोल्लटके इस कथनमें अनुलोम तथा तदितर प्रतिलोम आदि दुष्कर चित्रबन्धोंके साहचर्यके कारण यमक भी दुष्कर ही अभिप्रेत है। अतः सुकर यमकका यदि रसाविरोधी प्रयोग किया जाता है, तो वह हेय नहीं होगा। लोल्लटका यह आशय भी इस प्रकार दण्डी के कथनका ही स्पष्टीकरण है। आनन्दवर्धनने भी लोल्लटके अतिरसविरोधित्वको आधार बनाकर ही यमककी काव्यमें उपयोगिताका क्षेत्र यों प्रतिपादित किया है : ध्वनिकी आत्मास्वरूप शृङ्गारमें, उससे भी अधिक विप्रलम्भ शृङ्गारमें, यमक आदि दुष्कर अलङ्कारोंका निबन्धन कवि चाहे जितना समर्थ हो, पर यह उसका मुख्य वस्तुके प्रति प्रमाद ही होगा। कहीं कोई इक्का-दुक्का यमक यदि काव्यमें स्वाभाविक रूपसे आ जाये, तो कोई दोष नहीं है। पर बहुलतासे अन्य अलंकारों के समान रसके अङ्गके रूपमें भी इनका निबन्धन नहीं करना चाहिये। विप्र- लम्भशृङ्गारमें तो बिल्कुल नहीं। यमकके निबन्धनमें शब्दचयनमें विशेष यत्न करना पड़ता है। इससे अर्थ, वह भी रस, उपेक्षित हो जाता है। इस प्रकार १. काव्यानुशासन, ५ अध्याय, यमकपर उद्धृत : तथा च लोल्लटः— 'यस्तु सरिदद्रिसागरनग*तुरगपुरादिवर्णने यत्नः। कविशक्तिख्यातिफलो विततधियां नो मतः प्रबन्धेषु ।। यमकानुलोमतदितरचक्रादिभिदोऽति** रसरोधिन्धः । **अभिमानमात्रमेतद् गड्डुरिकाऽऽदिप्रवाहो वा ।। *शैलवृक्षौ नगावगौ (अमरकोष ३।३।१६) । **रुद्रटीय काव्यालङ्कार ३।५६की नमिब्याख्यामें 'यदुक्तम्' कहकर उद्धृत इस श्लोकमें 'भिदो हि' तथा 'अभिधान' पाठ है ।
१८ काव्यादर्श [३।३
यमकके स्थलमें रस गौण हो जाता है और यमक मुख्य ।¹ मम्मट, हेमचन्द्र, रुय्यक आदि परवर्ती आचार्यपरम्पराने आनन्दवर्धनका मत ही सङ्क्षेपसे या ब्यौरेसे प्रस्तुत किया है ।² आचार्य कुन्तकने वर्णविन्यासवक्रताके अन्तर्गत प्रस्तुत यमकके महत्त्वके बारेमें भामहका अनुसरण करके इसमें (i) प्रसाद गुण, (ii) श्रुतिरञ्जकता अर्थात् कोमलशब्दोंसे विरचितता तथा (iii) औचित्यसे युक्त होना शोभावह बताया है । 'औचित्य' से कुन्तकको वर्ण्य वस्तुके स्वरूपका उत्कर्ष अभीष्ट है ।³ निष्कर्ष : यमकके निबन्धनमें शब्दचयनपर अधिक बल अपेक्षित होनेके कारण (क) वस्तुको सौन्दर्य प्रदान करने वाले अर्थतत्त्वोंकी बलि हो जाती है । अतः यमक हृदयग्राही न होकर वैरस्योत्पादक हो जाता है । (ख) यमकत्वकी निष्पत्तिके लिये रचनामें भाषागत काठिन्य भी आ जाता है, जिससे वह सुख-
१. ध्वन्यात्मभूते शृङ्गारे यमकादिनिबन्धनम् । शक्तावपि प्रमादित्वं, विप्रलम्भे विशेषतः ।। ध्वन्यालोक २।१५ 'प्रमादित्वम्' इत्यनेनैतद् दर्शयते—'काकतालीयन्यायेन कदाचित् कस्यचिदेकस्य यमकादेर्निष्पत्तावपि भूम्नाऽलङ्कारान्तरवद् रसाङ्गत्वेन निबन्धो न कर्तव्य' इति ।...यमके च प्रबन्धेन बुद्धिपूर्वकं क्रियमाणे नियमेनैव यत्नान्तरपरिग्रह आपतति शब्दविशेषान्वेषणरूपः ।...यत्तू रस- वन्ति कानिचिद्* यमकादीनि दृश्यन्ते. तत्र रसादीनामङ्गता, यमकादीनां त्वङ्गितैव । * लोचन : 'कालिदासादिकृतानि' इत्यर्थः । २. काव्यप्रकाश ११८ वृत्ति : ...प्रभूततमभेदम् । तदेतत् काव्यान्तर्गडु*भूत- मिति नास्य भेदलक्षणं कृतम् । काव्यानुशासन, ५ अध्याय, पृष्ठ २५७ : एतस्य च कविशक्तिख्यापनमात्रफलत्वेन पुरुषार्थोपदेशानुपायत्वात् काव्यगडुभूततेति भेदलक्षणं न कृतम् । अलङ्कारसर्वस्व, ७, के 'सङ्क्षेपतः' का तात्पर्य जयरथने यह बताया है : एतच्च “काव्यात्मभूतरसचर्वणा- प्रत्यूहकारित्वात् प्रपञ्चयितुं न योग्यम्, इति चिरन्तनालङ्कारवन्न विभज्य लक्षितम्” इति भावः । * गडुः पृष्ठगुडे, कुब्जे (विश्वकोष) । गुडो गोलेक्षुपाकयोः (अमरकोष ३।३।४२) । ३. समानवर्णमन्यार्थं, प्रसादि, श्रुतिपेशलम् । औचित्ययुक्तम्, आद्यादिनियतस्थानशोभि यत् ।। वक्रोक्ति० २।६ औचित्यं वस्तुनः स्वभावोत्कर्षः ।... यत्र यमकोपनिबन्धनव्यसनित्वेनाप्यौ- चित्यमपरिक्लानमित्यर्थः ।
३१४] १. १ अव्यपेत पादादि क. एकपाद यमक १६ ( १. १ अव्यपेत पादादि क. एकपाद यमक ) १. मानेन मानेन सखि, प्रणयो भूत् प्रिये जने । खण्डिता कण्ठमाश्लिष्य तमेव कुरु सत्रपम् ॥ ४ ॥ १. हे सखि, प्रिय जनके प्रति इस मानसे परिचय न हो जाये । खण्डित (उपेक्षित) तू गले लगाकर उसे ही लज्जित कर ।। ४ ।। बोध्य नहीं रहता । (ग) पदोंकी सन्धियोंके कारण सुखश्रव्यता भी नहीं रह पाती । (घ) माथा मारकर यमकको समझ लेनेके बाद भी सहृदयको ऊपरी धरातलके आवृत्तश्रवणलभ्य आरम्भिक चारुत्वके अतिरिक्त कुछ पल्ले नहीं पड़ता । यह तो बिना गिरी (गोले) या जलका नारियल है । इस लिये मम्मटने इसका महत्त्व 'सौ सुनारकी, एक लुहारकी' मुहावरेके अनुसार 'काव्यमें कूबड़' कहकर ठीक ही स्पष्ट किया है । इस प्रकार यमकके महत्त्वकथनकी यात्रा दण्डीके 'वह अनुप्रासके विपरीत एकान्तः मधुर नहीं है' कथनसे प्रारम्भ होकर आनन्दवर्धनके युक्तियुक्त विस्तृत विवेचनपर समाप्त हो जाती है । बादमें तो उन्हींकी बातोंको दोहराया गया है ।। ३ ।। आषाढशुक्लषष्ठ्यां हि मृगाङ्के सिंहगे गुरौ । यूलिद्वितीयघस्रे च यमकैतिह्यमीक्षितम् ।। १ ।। सुकरं दुष्करं वृत्तं साधयन्ती शिवा मम । सदसन्मार्गयोर्भूयात् कल्याणाभिनिवेशनी ।। २ ।। चन्द्रिकागौरवर्ण्यं चन्द्रिकागौरवर्णिकाम् । वृत्तिं कीर्त्ति च मे शश्वद् देयात् कुर्याच्च शाश्वती ।। ३ ।। —०— अर्थाभापोऽमला यस्य दिव्या हरन्ति धीमलम् । शास्त्रालवणवाराशेरूर्म्मिषूत्तारिणीं तरीम् ।। १ ।। यमकोदाहृतिव्याख्यां प्रकुर्वे साम्प्रतं सुगाम् । अध्येतॄणां सदा तोषमावहेच्छास्त्रगाहिनाम् ।। २ ।। १. यमकके उदाहरण—आचार्य दण्डीने अगले पन्द्रह (४-१८) श्लोकोंमें (क) अव्यपेत सुकर आदियमकके सब १५ भेदोंके उदाहरण दिये हैं । १. (१. क. १.) प्रथमपादादि अव्यपेत एकपादयमक—चतुर्थ श्लोकके
२० काव्यादर्श [ ३।५ (क २.) मेघनादेन हंसानां मदनो मदनोदिना । २. मदन (कामदेव) रति (शृङ्गारका स्थायी भाव, प्रेम तथा कामदेव प्रथम पादमें निरन्तर 'मानेन' वर्णसमुदायकी आवृत्ति की गई है । प्रथम 'मानेन' पद 'मान'का तृतीया एकवचनान्त रूप है, तो दूसरा 'मा + अनेन'का दीर्घसन्धिसे निष्पन्न वर्णसमुदाय है । पारिभाषिक शब्दत्व अथवा पदत्व दण्डीको अपेक्षित नहीं है । 'वर्णसमुदाय' अपेक्षित है । अतः यहाँ अर्थविचार की तनिक भी आवश्यकता नहीं है, और इस प्रकार यह पूर्णतया शब्दालङ्कार है । क्रियापद 'भूत्' में निषेधार्थक 'मा' (माङ्) के योगमें √भू से लुङ्का विधान तथा भूतकरण अट्का निषेध है ।¹ यहाँ विप्रलम्भरतिका निरूपण खण्डिता नायिकाके प्रति सखियोंकी उक्तिके माध्यमसे किया गया है । अन्य किसी स्त्रीके प्रति आसक्त नायककी प्रतीक्षा करती नायिका खण्डिता होती है ।² वह अपने नायकके प्रति यदि मान करती है,³ तो नायकके निर्लज्ज⁴ होनेकी आशङ्का रहती है । सखियोंने इस लिये खण्डिता नायिका को गृहागत प्रियके प्रति मान न करके उसे अपनाकर लज्जित करनेकी राय दी है, ताकि वह अपनी करनीपर लज्जा अनुभव करके भविष्यमें नायिकाके प्रति ऐसा अपराध न करे । यहाँ आचार्यने विप्रलम्भ शृङ्गारमें भी यमकका प्रयोग सरल स्वाभाविक रूपसे किया है । अतः यह रसविरोधी कथमपि नहीं है । आनन्दवर्धनका (ध्वन्यालोक २।१५में) विप्रलम्भमें यमकनिबन्धनका सर्वथा निषेध इस प्रकार के उदाहरणको देखते हुए अतिवाद ही है ।। ४ ।। २.(१. क. २) द्वितीयपादादि अव्यपेत एकपाद सुकर यमक — इस श्लोकमें विप्रलम्भ अवस्थामें मानवती कामिनियोंके मनमें उद्दीपन विभाव मेघगर्जनाके १. अष्टाध्यायी ३।३।१७५ : माङि लुङ् । ६।४।७४ : न माङ्योगे । २. व्यासङ्गादुचिते यस्या वासके नागतः प्रियः । तदनागमनार्ता तु खण्डितेत्यभिधीयते ।। नाट्यशास्त्र २२।२०६ ३. स मानो नायिका यस्मिन्नीर्ष्याया नायकं प्रति । धत्ते विकारमन्यस्त्रीसङ्गदोषवशाद् यथा ।। शृङ्गारतिलक २।४४ ४. वार्यमाणो दृढतरं यो नारीमुपसर्पति । संच्छिन्नः सापराधश्च, स 'निर्लज्ज' इति स्मृतः ।। नाट्यशास्त्र २२।३०६
३।५-७] १. १ अव्यपेत पादादि क. एकपद यमक २१ नुन्नमानं मनः स्त्रीणां सह रत्या विगाहते ॥ ५ ॥ ३. राजन्वत्यः प्रजा जाता भवन्तं प्राप्य साम्प्रतम् । चतुरं चतुरम्भोधिरसनोर्वीकरग्रहे ॥ ६ ॥ ४. अरण्यं कैश्चिदाक्रान्तमन्यैः सद्म दिवौकसाम् । पदाति-रथ-नागाश्वरहितैरहितैस्तव ॥ ७ ॥ की पत्नी रति) के साथ हंसोंके मदको बढ़ाने वाली मेघोंकी गर्जनाके द्वारा टूटे हुए मान वाले स्त्रियोंके मनमें अठखेलियाँ कर रहा है ॥ ५ ॥ ३. चारों समुद्रों रूपी करधनी वाली पृथ्वीका कर (हाथ, शुल्क) ग्रहण करनेपर अब चतुर आपको पाकर प्रजायें श्रेष्ठ राजा वाली¹ हो गई हैं ॥ ६ ॥ ४. पैदल, रथ, हाथी, घोड़ा (चतुरंगिणी सेना) से रहित तुम्हारे कुछ शत्रुओंने जङ्गलकी राह ली, कुछने देवोंके निवास (स्वर्ग) की ॥ ७ ॥ द्वारा प्रियतमोंके प्रति रतिके उद्दीपनका वर्णन किया गया है। यहाँ द्वितीय पादके आदिमें 'मदनो' वर्णसमुदायकी निरन्तर आवृत्तिसे यमक निष्पन्न है। श्रुत्यनुप्रासके समान ही यह यहाँ विप्रलम्भमें अपेक्षित माधुर्यको भलीभाँति व्यक्त कर रहा है। 'मनः' शब्दमें 'चित्त' और 'मानस' सरोवर (हंसोंकी क्रीडा- स्थली) का और 'रति' में शृङ्गारके स्थायी भाव प्रेम तथा कामदेवकी पत्नी का श्लेष (दण्डीका अभङ्गपद, उद्भटका अर्थश्लेष) है। 'सहोक्ति अलङ्कार भी शोभाकारक है। इन सबमें मुख्यता विप्रलम्भ रति भावकी है ॥ ५ ॥ ३. (१. क. ३) तृतीयपादादि अव्यपेत एकपाद यमक—प्रकृत श्लोकमें समुद्रोंपर रसनाके आरोपसे तथा 'कर' शब्दके (पाणि और शुल्क) अर्थ- श्लेषसे 'हाथ' अर्थके बलपर उर्वीकी नायिकाके रूपमें और भवत्पदवाच्य राजाकी नायकके रूपमें प्रतीतिके कारण समासोक्ति अलङ्कार है। कविका राजाके प्रति रति भाव व्यक्त होनेसे ऊर्जस्वी अलङ्कार व्यक्त है। तृतीय पादके आदिमें 'चतुरम्' वर्णसमुदायकी निरन्तर आवृत्तिसे सम्पन्न यमक मुख्य अलङ्कार ऊर्जस्वीके अनुकूल ही है, प्रतिकूल नहीं। इस प्रकार यह सुकर यमक भी काव्यमें शोभोत्पादक होनेसे अलङ्कार है। जकारकी आवृत्तिसे निष्पन्न अनुप्रास भी काव्यशोभा उत्पन्न कर रहा है। इस प्रकार यह उदाहरण शब्द और अर्थ, दोनों दृष्टियोंसे शोभायुक्त है ॥ ६ ॥ ४. (१. क. ४) चतुर्थपादादि अव्यपेत एकपाद यमक—सातवें श्लोकमें १. अष्टा० ८।२।१४ : राजन्वान् सौराज्ये । अमरकोष २।१।१३ : सुराज्ञि देशे राजन्वान् स्यात् ततोऽन्यत्र राजवान् ।
२२ काव्यादर्श [ ३।८ (१. १ अव्यपेत पादादि ख. द्विपाद यमक) ५. मधुरं मधुरम्भोजवदने वद नेत्रयोः । विभ्रमं भ्रमरभ्रान्त्या विडम्बयति किं न्विदम् ? ॥ ८ ॥ ५. हे कमलमुखी, तुम बताओ कि क्या वसन्त भ्रमरोंके भ्रमणसे नयनोंके मधुर विभ्रम (चञ्चलता) की नकल कर रहा है ? ॥ ८ ॥ आचार्य दण्डीने वर्ण्य राजाके शत्रुओंके दलबलके पूरी तरह संहारके बाद उनमें से कुछ कायर राजाओं द्वारा पलायन करके प्राण बचानेके और शूर शत्रुओं द्वारा लड़ते-लड़ते प्राणोत्सर्ग करनेके वर्णनसे विजयिराजगत उत्साहको अङ्ग बनाकर कविकि राजाके प्रति रति व्यक्त की है । वन और स्वर्गको 'आक्रान्त' कहनेसे भी अर्थविशेष सूचित होता है : अरण्यमें कोई विरोध करने वाला नहीं है, इसलिये कायरोंने वनपर आक्रमण किया, वनके तृण, गुल्म, मृग आदिपर अपना गुस्सा निकाला । जो शूर थे, उन्होंने भी सुखभोगी देवताओंके घरोंपर हल्ला बोला । जिन्होंने शत्रुओंको अपने घरोंतक पहुँचने दिया, वे क्या खाक उनका मुकाबला करेंगे ? इस प्रकार प्रकृत राजाकी देवताओंसे श्रेष्ठ शत्रुओंपर विजयके वर्णनसे कविका रतिभाव और भी पुष्ट होता है । दन्त्याक्षरोंकी आवृत्तिसे निष्पन्न श्रुत्यनुप्रास जैसे इस भावका अङ्ग होकर काव्यमें शोभा उत्पन्न कर रहा है, वैसे ही चतुर्थ पादके आरम्भमें 'रहिते' वर्णसमुदायकी निरन्तर सुकर आवृत्तिसे सम्पन्न यमक भी शोभा- कारक है । तृतीय पादमें चतुरङ्गिणी सेनाके अङ्गोंका क्रमभङ्ग छन्दके कारण करना पड़ा है । 'रथनागाश्व' से लक्षणासे रथी आदिका बोध होता है ॥ ७ ॥ (१. ख) अव्यपेत सुकर द्विपादादियमक—अव्यपेत सुकर आदियमकके (ख) द्विपाद भेदके ६ उदाहरण छह (८-१३) श्लोकोंमें दिये हैं : ५. (१. ख. १) प्रथम-द्वितीयपादादि द्विपादअव्यपेतयमक—अष्टम श्लोकमें वर्ण्य नायिकाके प्रति वर्णयिता नायककी नायिकाके नयनों (उद्दीपन विभाव) की चाटूपमासे पुष्ट रति व्यक्त की गई है । इसके प्रथम और द्वितीय पादोंके आरम्भमें 'मधुरम्' और 'वदने' वर्णसमुदायकी निरन्तर आवृत्तिसे सुखबोध्य द्विपादयमक सम्पन्न हुआ है । अर्थप्रतीतिमें तनिक भी क्लेश न होनेसे यह यमक काव्यमें माधुर्यका आधान करता है । तृतीय पादमें पदगत तथा पाद-
३।६-१०] १. १ अव्यपेत पादादि ख. द्विपद यमक २३ ६. वारणो वा रणोद्दामो हयो वा स्मर, दुर्धरः । न यतो नयतोऽन्तं नस्तदहो विक्रमस्तव ॥ ६ ॥ ७. राजितैराजितैक्ष्ण्येन जीयते त्वादृशैनृपैः । ६. हे कामदेव, हमें (हमारे जैसे विरहियोंको) मरण तक पहुँचाने वाले तुम्हारे (पास) क्योंकि न सङ्ग्राममें दुर्दम्य, उन्मुक्त (निर्बन्ध विचरण करता) हाथी है, और न काबूमें नहीं आने वाला अश्व ही है; अतः तुम्हारा पराक्रम अद्भुत है ॥ ६ ॥ ७. धरती तुम्हारे जैसे राजाओं द्वारा पहले तो जीती जाती है, और गत अनुप्रास भी रतिभावके अनुकूल माधुर्य उत्पन्न कर रहा है। इस प्रकार यह मुक्तक शब्द और अर्थ, दोनों दृष्टियोंसे इष्टार्थसे युक्त है। यमक इस इष्टार्थव्यवच्छेदमें साधक है, बाधक नहीं । अम्बोजपर वदनके आरोपसे भी सुन्दर अर्थकी प्रतीति होती है : अम्बोजपर भ्रमर भ्रमणशील हैं, तो वदनपर नेत्रोंका विभ्रम है । 'अम्बोजके तुल्य वदन वाली' व्याख्यामें वाचकलुप्ता समासोपमामें भी चारुत्व अव्याहत है। अतः इन दोनों रूपक और समासो- पमाका सन्देह होनेसे भामहादिके अनुसार सन्देहसङ्कर एवं रूपक, या उपमा या उनके सन्देहके चाटूपमाका अंग होनेसे अङ्गाङ्गिभावसङ्कर भी है। छन्दमें अक्षरयोजना भी विभ्रमयुक्त होनेसे अर्थके अनुकूल है ॥ ८ ॥ ६. (१. ख. २) प्रथम-तृतीयपादादि द्विपद अव्यपेतयमक—नवें श्लोकमें कामदेवका अद्भुत शौर्य दण्डीके मतमें हेतुवैकल्यविशेषोक्ति तथा उद्भटके मतमें विभावना अलङ्कारके द्वारा बताया गया है। शत्रुओंको मौतके घाट उतारनेके लिये राजा लोग चतुरङ्गिणी सेनाकी सहायता लिया करते हैं। पर इन प्रसिद्ध हेतुओंके बिना भी कामदेव वही काम कर रहा है, जो इन हेतुओंसे किया जाता है। 'वारण' और 'हय' दो ही अङ्गोंका कथन यह सूचित करता है कि जब हाथी या घोड़ा ही नहीं है, तब रथ और पैदल सेना तो कहाँ से होंगी ! यहाँ प्रथम और तृतीय पादोंके आरम्भमें वर्णसमुदायकी आवृत्ति निर- न्तर की गई है। किसी क्लिष्ट कल्पनाकी अपेक्षाके बिना ही सरलतासे अर्थ- बोध होनेके कारण यह यमक सुकर है ॥ ६ ॥ ७. (१. ख. ३) प्रथम-चतुर्थ-पादादि द्विपद सुकर अव्यपेतयमक—दसवें श्लोकमें कविने युद्धमें तीक्ष्णतासे उपलक्षित शौर्यके द्वारा भूमिजयसे राजाके
२४ काव्यादर्श [३।१०-११ नीयते च पुनस्तृप्तिं वसुधा वसुधारया ॥ १० ॥ ८. करोति सहकारस्य कलिकोत्कलिकोत्तरम् । मन्मनो मन्मनोऽप्येष मत्तकोकिलनिस्वनः ॥ ११ ॥ फिर धनकी धारसे तृप्त की जाती है ॥ १० ॥ ८. आमकी बोर मेरे मनको प्रबल उत्कण्ठासे युक्त कर रही है । मत्त कोकिलकी यह अव्यक्त मधुर सुरतालापरूपी कूक भी (मेरे मनको अत्यधिक उत्कण्ठायुक्त कर रही है) ॥ ११ ॥ युद्धवीर और वसुधोपलक्षित प्रजाकी वसुधारासे तृप्तिके वर्णनसे दानवीर स्वरूपकी व्यञ्जना की गई है । कर्ता 'नृप' और एक कर्मकारक 'वसुधा' का भिन्न क्रियाओं 'जीयते' और 'नीयते' से सम्बन्ध होनेसे यहाँ द्रव्य (कारक) दीपक है । तालव्य और दन्त्य वर्णोंकी आवृत्तिसे श्रुत्यनुप्रास माधुर्यकारक है । प्रथम और चतुर्थ पादोंके आदिमें एकेक वर्णसमुदायकी सुकर तथा निर- न्तर आवृत्तिसे अव्यपेत द्विपादद्वयमक है । यह यमक मुख्य भाव द्विविध उत्साहकी अभिव्यक्तिमें कथमपि बाधा नहीं डालता । अतः यह यमक मधुर (रसाविरोधी) है ॥ १० ॥ ८. (१. ख. ४) द्वितीय-तृतीय-पादादि द्विपाद अव्यपेत सुकर यमक-- ग्यारहवें श्लोकमें आम्रमञ्जरी और कोयलकी कूक उद्दीपन विभाव तथा अत्यधिक उत्कण्ठासे युक्त करना अनुभावसे विप्रलम्भरति व्यक्त की गई है । कोकिलकी कूकपर सुरतालापके आरोपसे रूपक भी इसके अत्यधिक अनुकूल है । कण्ठ्य और दन्त्य वर्णोंकी आवृत्तिसे जन्य श्रुत्यनुप्रास माधुर्यका सर्जक है । द्वितीय पादमें कलिकोत् वर्णसमुदायकी तथा तृतीय पादमें मन्मनो वर्ण- समुदायकी निरन्तर सुकर आवृत्तिसे जनित यमक इस माधुर्यको और पुष्ट कर रहा है । इस प्रकार यहाँ यमक विप्रलम्भको उद्दीप्त ही कर रहा है । उसकी शोभाको कम नहीं कर रहा । अतः यमक अङ्ग है और विप्रलम्भरति अङ्गी । तृतीय पादमें आवृत्त 'मन्मनः' को रत्नश्रीज्ञानने 'मत् + मनस्' ही समझा है । वादी जङ्घालदेवने 'अत्यन्त मधुर' अर्थ किया है, १ तो तरुण वाचस्पतिने मथ् + √ मन् से निष्पादित करके 'पीडाकर' अर्थमें पर्यवसित किया है । शब्द- १. रत्नश्री : मत्तस्य कोकिलस्य निस्वनः = शब्दोऽप्येष मधुरो 'मन्मन उत्कलिकोत्तरं करोति' इति प्रकृतम् । वादीटीका : मन्मनोऽत्यन्तमधुरो मधुरतरोऽप्येष मत्तकोकिलनिस्वनः ।
३।१२] १. १ अन्यपेत पादादि ख. द्विपद यमक २५ ६. कथं त्वदुपलम्भाशाविहताविह तादृशी । अवस्था नालमारोढुमङ्गनामङ्गनाशिनी ॥ १२ ॥ ६. तुम्हारी प्राप्तिकी आशाके इस विघातके होनेपर वैसी, अङ्गोंको नष्ट करने वाली (मरण) अवस्था सुन्दर अङ्गों वालीको कैसे न प्राप्त होवे ? ॥ १२ ॥ कल्पद्रुममें उद्धृत त्रिकाण्डशेष कोषके अनुसार 'मन्मन' (अकारान्त पुंल्लिङ्ग) 'गद्गदध्वनि' अर्थ में है । कृष्णमाचार्यने 'यह 'मुणमुण' आदिके समान अनु- करणात्मक शब्द भी हो सकता है', कहा है । रङ्गराजरेड्डी द्वारा उद्धृत विश्व- कोषमें इसे 'रतिभाषित' अर्थमें बताया है । चिन्तामणि (शब्दकल्पद्रुममें उद्धृत) ने भी इसे प्रेमियुगलके सुरतालापका वाचक बताया है ।१ अन्तिम अर्थ अवसरानुकूल तथा प्रमाणपुष्ट होनेसे उचित है । यह शब्द भौवादिक √मण शब्दे (१३।५२) से निष्पन्न है । 'मणित' इसीका पर्याय है ॥ ११ ॥ ६. (१. ख. ५) द्वितीय-चतुर्थ-पादादि द्विपद अव्यपेत सुकर यमक— विरहिणी नायिकाकी सहेली नायकके आगमनके प्रति हताश नायिकाकी कष्टयुक्त अवस्था नायकको बता रही है । इस प्रकार कष्टावस्था अनुभावके प्रतिपादनसे विप्रलम्भ रतिकी व्यञ्जना यहाँ हुई है । इसके लिये अत्यन्त कोमल एवं मधुर रचनाकी अपेक्षा है । दन्त्य वर्णोंकी आवृत्तिसे यहाँ श्रुत्यनु- प्रास इसे उत्पन्न कर रहा है । द्वितीय और चतुर्थ पादोंमें भी कोमल वर्ण- समुदायकी निरन्तर सुकर (अयत्नसाध्य) आवृत्तिसे यमक उस माधुर्यकी सृष्टि करके विप्रलम्भ रतिका उपकारी है । स्वरोंका आरोहावरोह भी मुख्य भावके अनुकूल है । 'इह'को रत्नश्रीज्ञानने 'विहतौ'का विशेषण माना है । वादी जी ने अध्या- हार्य 'अवसरे'का तथा तरुणवाचस्पतिने अपनी तरुणाईके अनुकूल 'वसन्ते'का उपस्थापक माना है । हमें रत्नश्रीज्ञान उचित प्रतीत होते हैं : मेरी सखी तुम्हें पानेकी बड़ी आशा लगाये बैठी है । तुम यदि यों उसकी आस तोड़ोगे, तो यह आशाविघात निश्चय ही उसे तोड़ डालेगा । उसकी हालत पहलेसे ही ऐसी-वैसी है । वह अब धीरे-धीरे मौतकी ओर बढ़ जायेगी । 'अङ्गनाशिनी १. सुरते कर्णमूले तु निजदेशीयभाषया । दम्पत्योः कथनं यत्तु मन्मनं तं विदुर्बुधाः ॥ २. वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी, भ्वादिगण, भवतोषिणी, पृष्ठ ४०१-४०२ ।
२६ काव्यादर्श [३।१३-१४ १०. निगृह्य नेत्रे कर्षन्ति बालपल्लवशोभिना । तरुणा तरुणाकृष्टानलिनो नलिनोन्मुखाः ॥ १३ ॥ (१. १ अव्यपेत पादादि ग. त्रिपाद यमक) ११. विशदा विशदामत्तसारसे सारसे जले । १०. कोंपलोंसे सुशोभित वृक्षके द्वारा आकृष्ट युवाओंको कमलोंपर मँड- राते हुये भ्रमर दोनों आँखें जकड़कर खींच लेते हैं ॥ १३ ॥ ११. अवगाहन करते हुए, खूब मत्त सारसी-सारसों वाले सरोवरके जल अवस्था' प्रेमकी दशवीं अवस्था है ।¹ बाकी नौ दशाएँ तो हो चुकी हैं । दसवीं की कसर है । अतः समय रहते चेत जाओ ! कोमलाङ्गी अबलाके वधका महापाप अपने सिर मत लो ! रत्नश्रीज्ञान और वादीजी द्वारा दिया 'तादृशीम्' पाठभेद 'अङ्गनाम्'का विशेषण है, जो अङ्गनाकी प्रेमपरवशताको व्यक्त करता है ॥ १२ । १०. (१. ख. ६.) तृतीय-चतुर्थपादादि अव्यपेत सुकर द्विपादयमक— तेरहवें श्लोकमें कवि आचार्य दण्डीने रति भावके उद्दीपन विभाव वसन्तमें वृक्षोंके पल्लवित होने तथा कमलोंपर मँडराते भौरोंके द्वारा तरुणोंको आकृष्ट किये जानेका वर्णन किया है । यहाँ बालपल्लवशोभी तरुसे तरुणीका नवयौवन के अङ्कुरोंसे सुशोभित देह व्यक्त होता है तथा नलिनोन्मुख भ्रमरोंसे नलिन (कमल) के सदृश मुखपर स्थित चञ्चल कजरारे नयन अभीष्ट हैं : पहले तरुणीका छरहरा खिलता हुआ शरीर तरुणोंका आकर्षण करता है, फिर उनको जकड़कर खींच लेते हैं मुखकमलपर मँडराते नयनभ्रमर । इस प्रकार यहाँ वस्तुसे रूपक ध्वनित है । श्लोकके पूर्वार्धमें कण्ठ्य और दन्त्य वर्णोंकी आवृत्तिसे श्रुत्यनुप्रास है । उत्तरार्धके दोनों पादोंके आदिमें एकेक वर्णसमुदाय निरन्तर रूपसे आवृत्त है । अर्थावबोधमें क्षणांशकी भी बाधा न होनेसे यह यमक सुकर है ॥ १३ ॥ (१.ग) त्रिपादादि अव्यपेत सुकर यमक—आचार्यने अगले चार (१४- १७) श्लोकोंमें तीन पादोंके आदिमें निरन्तर (अव्यपेत) सुकर यमकके चार उदाहरण प्रस्तुत किये हैं । १. एवंविधैः कामलिङ्गैरप्राप्तसुरतोत्सवा । दशावस्थागतं कामं नानाभावं प्रदर्शयेत् ॥ नाट्य० २२।१६०-१६१ सर्वैः कृतैः प्रतीकारैर्यदि नास्ति समागमः । कामाग्निना प्रदीप्ताया जायते मरणं ततः ॥ १६२
३।१४-१५] १. १ अव्यपेत पादादि ग. त्रिपाद यमक २७
कुरुते कुरुतेनेयं हंसी मामन्तकामिषम् ॥ १४ ॥ १२. विषमं विषमन्वेति मदनं मदनन्दनः । सहेन्दुकलयाऽपोढमलया मलयानिलः¹ ॥ १५ ॥ में यह शुक्लवर्णा हंसी अपनी दुखदायी आवाजसे मुझे मौतका निवाला बना रही है ॥ १४ ॥ १२. मुझे आनन्दरहित (अर्थात् दुःखी) करने वाला मलयमारुत निर्मल चन्द्रकलाके साथ विषम (तीक्ष्ण, दुःसह) विषस्वरूप मदनका अनुचर हो रहा है ॥ १५ ॥ ११(१. ग. १) प्रथम-द्वितीय-तृतीयपादादि त्रिपाद्यमक—आचार्य कवि दण्डीने १४वें श्लोकमें रति भावके उद्दीपन विभावका ही वर्णन पिछले श्लोकके समान सरोवरमें अपने प्रियतमके वियोगमें दुःखी हंसीके करुणरवसे प्रियाकी याद आ जानेके कारण बेचैन प्रेमीके वर्णनके द्वारा किया है । सरोवरके जलमें मस्त सारस तो विहार कर रहे हैं, पर हंसी बेचारी अकेली बैठी रो रही है । उसका यह दुःखपूर्ण होनेसे कुरव वर्ण्य उत्तमपुरुषाभिधेय पुरुषको मृत्युका ग्रास बना रहा है । अर्थात् 'अन्य स्त्रीपुरुष जब चहुँ ओर आनन्दविहार कर रहे हैं, तब उसकी प्रिया उसके वियोगमें इस हंसीके समान रो रही होगी', यह सोचकर उस पुरुषके प्राण मुँहको आ रहे हैं। यहाँ इस आर्थ शोभाके साथ तदनुकूल शब्द शोभा भी दन्त्य वर्णों और ओष्ठ्य मकार की आवृत्तिसे जन्य अनुप्राससे उत्पन्न हो रही है। तब अयत्नसाध्य अतएव सुकर त्रिपादादि अव्यपेत यमक इस माधुर्यको और भी पुष्ट कर रहा है। विशन्तः प्रविशन्तो गाहमानाः, आ समन्ततः = पूर्णतया, मत्ता यौवनेन प्रेम्णा च क्षीबाः, सारस्यश्च सारसाश्चेति सारसा यस्मिन्, तस्मिन् । सरस इदम् सारसम् । तस्मिन्² ॥ १४ ॥ १२. (१. ग. २) प्रथम-द्वितीय-चतुर्थ-पादादि अव्यपेत सुकर त्रिपाद- यमक—पन्द्रहवें श्लोकमें आदियमकके १२वें भेदका उदाहरण दिया है। १. अन्वयः—मत्-अनन्दनः मलयानिलः अपोढ-मलया इन्दु-कलया सह विषमं विषं मदनम् अन्वेति । २. सारसी और सारसके द्वन्द्व समासमें 'पुमान् स्त्रिया' (अष्टा० १।२।६७) से 'सारस'का एकशेष रहता है । 'सरस् + ङस्'से 'तस्येदम्' (अष्टा० ४।३।१२०) से अण्+सप्तमी ए० व०से निष्पन्न 'सारसे' 'जले'का विशेषण है।
२८ काव्यादर्श [३।१६ १३. मानिनी मा निनीषुस्ते निषङ्गत्वमनङ्ग मे । हारिणी हारिणी शर्म तनतां तनुतां यतः ॥ १६ ॥ १३. हे कामदेव, मुझे तुम्हारे बाणोंका तूणीर (भण्डार) बनाना चाहती हुई, (मुझपर) मान किये बैठी, मोतियोंके हारसे सुशोभित, मनोहर (मेरी प्रिया) मुझ दुबला होते हुएका कल्याण करे । अर्थात् मान छोड़कर मुझे अपनाये ॥ १६ ॥ इसमें भी रतिके उद्दीपन विभावका वर्णन है। मलयपवन उत्तमपुरुषवाच्य पुरुष या स्त्रीको यों तो पहले ही दुःखदायी था। पर वसन्त ऋतुकी चाँदनी रातोंके शुरू होते ही कोहरा छँट जानेके कारण निर्मल चन्द्रकलाके साथ मिलकर तो वह अत्यन्त दुस्सह विष, अर्थात् आशु प्राणहारी, अर्थात् उसके समान प्रेमकी पीरको बढ़ाकर प्राणलेवा, मदनका अनुगामी, बन रहा है। इस प्रकार यहाँ उद्दीपन विभावके द्वारा विप्रलम्भ रति प्रतिपादित है। दन्त्य वर्णोंकी बहुलतासे अनुप्रास तो माधुर्यकारक है ही, प्रथम, द्वितीय और चतुर्थ इन तीन पादोंमें एकेक वर्णसमुदायकी निरन्तर एवं सरल आवृत्तिसे भी माधुर्यकी सृष्टि होती है। इस प्रकार यहाँ यमक विप्रलम्भरतिके सर्वथा अनु- कूल है। प्रथम और द्वितीय पादोंमें प्रथम वर्णसमुदायमें नासिक्य ध्वनि अनु- स्वार या परसवर्ण है, तो आवृत्तमें नकार है। नासिक्यत्वकी समानताके कारण ध्वनिप्रभावमें अन्तर नहीं आनेसे निरन्तरतामें बाधा नहीं आती ॥ १५ ॥ १३. (१. ग. ३) प्रथमतृतीय-चतुर्थ-पादादि अव्यपेत सुकर पादादियमक— आदियमकके तेरहवें और त्रिपादयमकके तीसरे भेदके इस (१६वें श्लोकमें दिये) उदाहरणमें कविने मानिनी प्रियाके प्रति नायककी विप्रलम्भ रतिका प्रतिपादन दोनों आलम्बनों तथा तनुत्व अनुभावके वर्णनसे किया है। नायककी प्रियाके स्वाभाविक सौन्दर्यकी अभिव्यक्ति प्रथम 'हारिणी' से तथा आहार्य सौन्दर्यकी द्वितीय 'हारिणी' से की है। नायकके प्रति मानवती स्वाभाविक तथा आहार्य सौन्दर्यसे सम्पन्न नायिकाके प्रति नायकका प्रेम इतना बढ़ गया है कि उसे लगता है जैसे कामदेवके सारे बाण उसके हाथ लग गये हैं, और वह उन सबका प्रयोग नायकपर कर रही है। ऐसा लगता है मानों वह नायकको कामदेवका तूणीर ही बना देना चाहती है। १. अन्वयः—अनङ्ग, मा ते निषङ्गत्वं निनीषुः, मानिनी, हारिणी, हारिणी तनुतां यतः मे शर्म तनुताम् ।
३।१७] १.१ अन्यपेत पादादिज त्रिपाद यमक २६ १४. जयता त्वन्मुखेनास्मानकथं न कथं जितम् ? कमलङ्कमलङ्कुर्वदलिमद्दलि मत्प्रिये ॥ १७ ॥ १४. हे मेरी प्यारी, हमें जीतते हुए तुम्हारे मुखने नहीं बोलने वाला, जलकी शोभा बढ़ाता हुआ, भ्रमरोंसे सुशोभित, पँखुड़ियों वाला कमल कैसे नहीं जीता ? (अर्थात् वह तो जीत ही लिया है) ॥ १७ ॥ इससे नायक बहुत क्षीणता अनुभव कर रहा है । वह कामदेवसे प्रार्थना करता है कि कामदेव ऐसा कुछ करें कि वह मानिनी नायकके लिये कल्याण- कारिणी हो जाये । अर्थात् कामदेव नायिकापर भी अपने शरोंका ऐसे सन्धान करे कि वह मान छोड़नेको बाध्य हो जाए, जिससे कि नायकको नायिकासे मिलनका सुख प्राप्त हो । यहाँ अनुप्राससे तो माधुर्य है ही, त्रिपादादियमक भी मुख्य भावके अनु- कूल माधुर्यकी सृष्टि कर रहा है । 'कामदेवका तूणीर बनाना चाहती हुई' कथनमें 'इव' आदिके बिना उत्प्रेक्षा है । इससे नायककी अत्यन्त प्रेमविह्व- लता वस्तु व्यक्त होती है । प्रथम तनुताम् तनु (विस्तारे), कर्तरि लोट्, आत्मनेपद, प्रथम पुरुष, एक वचन, का रूप है । द्वितीय 'तनुताम्' तनु + तल्, द्वितीया, ए० व०, में 'यतः' (√ इण् गतौ, शतृ, पुंल्लिङ्ग, षष्ठी, ए० व०) का कर्म है ॥ १६ ॥ १४. (१. ग ४) द्वितीय-तृतीय-चतुर्थ-पादादि त्रिपाद्यमक - आदियमकके चौदहवें और पादादियमकके चौथे उदाहरणके रूपमें प्रस्तुत प्रकृत श्लोकमें आचार्य कवि दण्डीने आलम्बन विभाव नायिकाके वर्णनसे रतिको प्रस्तुत किया है । यहाँ 'अस्मान्'का व्यङ्ग्यार्थ यह है कि हम जो कि तेरे मुखकी प्रशंसा में इतने मुखर हैं, उनको तुम्हारे मुखने जीतकर दास बना लिया है, तब इस जड, मूक, जलको शोभित करने वाले इत्यादि प्रकारके कमलकी तो बिसात ही क्या है ! यहाँ कमलके विशेषणोंसे मुखके पानीदार होनेके अतिरिक्त चञ्चल भ्रमरसदृश नयनोंसे और कमलकी पँखुड़ी जैसे ओठोंसे सुशोभित मुखका कमलसे साम्य व्यक्त होता है । कमलको जीतनेसे नायिका के मुखकी कमलसे अधिक शोभा व्यक्त होती है । अतः व्यतिरेक व्यङ्ग्य है । दन्त्य वर्णोंकी अधिकतासे दन्तप्रभासदृश कान्तिमान् अनुप्राससे यहाँ माधुर्य गुण है । कोमल वर्णसमुदायकी तीन पादोंमें आवृत्तिसे पुष्ट हो गया है । १. अन्वयः - मत्प्रिये, अस्मान् जयता त्वन्मुखेन अकथं, कम् अलङ्कुर्वत्, अलिमत्, दलि कमलं कथं न जितम् ?
३० काव्यादर्श [३।१८-१६ (१. १ अव्यपेत पादादि घ. चतुष्पाद यमक) १५. रमणी रमणीया मे पाटला पाटलांशुका । वारुणीवारुणीभूत-सौरभा सौरभास्पदम् १ ॥ १८ ॥ इति पादादियमकमव्यपेतं विकल्पितम् । (१. २ व्यपेत पादादि यमक) व्यपेतस्यापि वर्ण्यन्ते विकल्पास्तस्य केचन ॥ १६ ॥ १५. गुलाबी रेशमी वस्त्रोंवाली, महकता गुलाबका फूल, पश्चिम दिशा- सदृश अरुणवर्ण सूर्यकी कान्तिवाली सुन्दरी मेरे रमणके योग्य है ॥ १८ ॥ इस प्रकार यहाँ पादोंके आदिमें प्रयुक्त अव्यपेत (अन्तररहित) यमकके भेद बताये गये । अब उस (पादादियमक) के व्यवधानमें प्रयुक्तके भी कुछ भेदोंका वर्णन किया जा रहा है ॥ १६ ॥ अकथम्—अविद्यमाना कथा वचनं यस्य, तत् (बहुव्रीहि) । तुम्हारे मुख के आगे कोई कमलकी बात भी नहीं पूछता है, भले ही वह कितना भी पानीको शोभायुक्त करे, या भ्रमर उसपर मँडरायें, या वह सुन्दर पँखुड़ियोंसे युक्त हो । यह आशय भी 'अकथम्'का हो सकता है ॥ १७ ॥ १५. (१. घ.) अव्यपेत सुकर चतुष्पादादियमक—आदियमकके पन्द्रहवें भेदके इस उदाहरणमें नायककी रतिकी आलम्बन नायिकाके सौन्दर्यका वर्णन किया गया है । नायिकापर गुलाबके फूल के धर्मसहित आरोपसे रूपक तथा वारुणीसे सादृश्य बतानेसे उपमा अर्थालङ्कार हैं । चारों पादोंके आदिमें एकैक वर्णसमुदायकी निरन्तर आवृत्तिसे यहाँ अव्यपेत चतुष्पादादि- यमक है । वह असंयुक्त एवं कोमल वर्णोंसे घटित होनेसे वर्ण्य वस्तुके सर्वथा अनुकूल है । क्लिष्ट कल्पनासे रहित है । अतः मधुर है ॥ १८ ॥ इस प्रकार १५ उदाहरणोंमें सुकर अव्यपेत आदियमकके १५ भेदोंके उदाहरण देनेके बाद आचार्यने व्यपेत आदियमकके पन्द्रह भेदोंमेंसे कुछके वर्णनकी प्रतिज्ञा इस (१६वें) श्लोकके उत्तरार्धमें की है । व्यपेत यमकके भी अव्यपेतके समान १५ भेद होते हैं । दिग्दर्शनार्थ उनमें से १३ भेदोंके उदाहरण दिये हैं । इनमें (क) एकपाद यमकके चार तथा (ग) त्रिपादका एक भेद नहीं हैं । (ख)द्विपादके सब (छह)तथा (ग) त्रिपादयमकके १. अन्वयः—पाटलांशुका, सौरभास्पदपाटला, वारुणीव अरुणीभूत-सौरभा रमणी मे रमणीया । २. पाटला पाटली स्त्री स्यादस्याः पुष्पे पुनर्न ना ।
·१२·] १. २. व्यपेत पादादि ख. द्विपाद यमक ३१ १६. मधुरेणदृशां मानं मधुरेण सुगन्धिना । सहकारोद्गमेनैव शब्दशेषं करिष्यति ॥ २० ॥ १६. मधु (वसन्त) मृगनयनियोंके (प्रियके प्रति) मान (रूठने) को मधुर, सुगन्धित आम्रकी बोरसे ही कथाशेष (समाप्त) कर देगा ॥ २० ॥ एकोन (तीन) भेद दिये हैं। (ख) चतुष्पाद्यमकके (१) चारों पादोंमें सजातीय वर्णसंघातकी आवृत्तिसे एक तथा (२) विभिन्न पदोंमें विविधतासे आवृत्तिसे तीन, इस प्रकार चार भेद दिये हैं। इस प्रकार आचार्यने यमककी रचनाकी यह भी एक दिशा अध्येताओंके सामने प्रस्तुत की है। यह प्रकार अन्य भेदोंपर भी लागू हो सकता है ॥ १६ ॥ १६. (२. ख. १.) व्यपेत प्रथम-द्वितीयपादादि सुकर द्विपाद यमक— दण्डीने (२. क) एकपादादि व्यपेत यमकके उदाहरण अत्यन्त सुगम तथा अन्य भेदोंके प्रदर्शनसे गतार्थ हो जानेसे नहीं दिये हैं। २०-२५ श्लोकोंमें (ख) द्विपाद यमकके व्यवधानयुक्त प्रकारके उदाहरण दिये हैं। २०वें श्लोकमें रतिभावके उद्दीपन विभाव वसन्तका वर्णन युवतियोंमें रतिका उद्दीप्त होना बताकर किया है। वसन्तको मृगलोचनाओंका मानभङ्ग करनेके लिए कामदेवके अन्य बाणोंको तैयार करनेकी आवश्यकता ही नहीं पड़ती। केवल आम्रमञ्जरीके प्रकट होते ही वह उनके मानको अतीतकी कहानी बता देगा। यहाँ 'मधुरेण' वर्णसमुदायकी आवृत्ति प्रथम और द्वितीय पादोंके आदिमें हुई है। परन्तु दोनों वर्णसमुदायोंके मध्य चार वर्णोंका व्यवधान है। अतः यहाँ व्यपेत द्विपादादियमक है। यह आवृत्ति सरल, सुखबोध्य और शोभाजनक होनेसे सुकर व्यावृत्ति है। कोमल और कुछ कठोर ध्वनियोंके मिश्रणसे सुश्लिष्ट वर्णविन्यास रतिभावके अनुकूल है। नासिक्य ध्वनियोंके विभवत विन्याससे उत्पन्न गूंज श्लोकको सुश्रव्य बनाती है। एणदृश्— 'एण' (मृग) शब्द पुँल्लिङ्ग है। किन्तु मान रमणियोंका मोहक होता है। अतः उपमेयकी अनुकूलतासे उपमेय 'एणी' है, 'एण' (पुं०) नहीं। एण्या दृशौ = एणदृशौ (षष्ठी तत्पु०)। ते इव दृशौ यस्याः, सा एण- दृक् :१ मृगीकी आँखोंके समान आँखों वाली। काव्यशास्त्रीय दृष्टिसे 'एण'से १. कुक्कुट्यादीनामण्डादिषु (वार्तिक ६।३।४२) से कुक्कुट्यादिगणान्तर्गत 'मृगी'के पर्यायभूत 'एणी'को अण्डादिके समान शेषसम्बन्धसे सम्बद्ध 'दृश्' उत्तरपद रहते पुंवद्भाव होता है। 'एणदृश् + दृश्' स्थितिमें उप- मानभूत 'दृश्'का 'सरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ' (अष्टा० २।२।६४) से लोप होनेसे 'एणदृश्' होता है।
३२ काव्यादर्श [३।२१-२२ १७. करोतिताम्रो रामाणां तन्त्रीताडनविभ्रमम् । करोति सेर्षयं कान्ते वा श्रवणोत्पलताडनम् ॥ २१ ॥ १८. सकलापोल्लसनया कलापिन्याऽनुनृत्यते । मेघाली नर्तिता वातैः सकलापो विमुञ्चति ॥ २२ ॥ १७. रमणियोंका अत्यन्त ताम्र (लाल) हाथ (या तो) वीणाके (तारों के) ताडनरूपी विभ्रम (लीला) को करता है, या प्रियतमके प्रति कर्णोत्पल का ईर्ष्यायुक्त प्रहार (करता है) ॥ २१ ॥ १८. हवाओंसे नचाई हुई मेघमाला सारा पानी छोड़ रही है । अपने पिच्छभारको फैलाकर मयूरी उसके अनुकरणमें नृत्य कर रही है ॥ २२ ॥ गृहीत 'एणी'की तत्सम्बद्ध दृष्टिमें लक्षणासे 'एण-दृश्' शब्द निष्पन्न होता है ॥ २० ॥ १७. (२. ख. २.) प्रथम-तृतीयपादत व्यपेत सुकर द्विपादादियमक— इस श्लोकमें रतिकी आलम्बन रमणियोंके कोमल करका तथा ईर्ष्या व्यभि- चारी भावका वर्णन कविने किया है । समूचे श्लोकमें व्याप्त अनुप्रास तो माधुर्यकारक है ही, प्रथम पादके आदिमें स्थित वर्णसमुदायकी आवृत्ति तृतीय पादमें करनेसे भी विशिष्ट शोभा और माधुर्यकी सृष्टि हुई है । इसके अति- रिक्त यहाँ एक 'करोति' क्रियापद दो कर्मोंका एक साथ दीपन करके दो वाक्योंको दीप्त कर रहा है । अतः दीपक अलङ्कार भी है ॥ २१ ॥ १८. (२. ख ३.) प्रथम-चतुर्थपादादिगत व्यपेत सुकर द्विपाद यमक— २२वें श्लोकमें आचार्यने वर्षाकालमे मयूरियोंके अनुनृत्य (किसीके अनुकरणमें किये जा रहे नृत्य) का वर्णन किया है । पुरवैया हवाओंके द्वारा मेघमालाको इधरसे उधर करनेको कविने लाक्षणिक 'नर्तिता'से व्यक्त किया है । 'आली' शब्द भी 'माला', 'पङ्क्ति'के अतिरिक्त 'सखी'का भाव भी देता है । 'वात- नर्तिता'से प्रियतमके सङ्गसुखके कारण झूमती कलापिनी सखीस्वरूपा मेघाली को नाचती देखकर उसके अनुकरणमें नाच उठती है । कर्मवाच्यके प्रयोगसे मेघालीके ऋतुप्रवृत्त नर्तनकी मुख्यता व्यक्त होती है । बरखा बहारमें सुखविभोर होकर अनुनृत्य करती मयूरीके स्वाभाविक वर्णनसे स्वभावोक्ति तो है ही, प्रियसङ्गमें सुखवर्षाका अनुभव करती रमणीका भाव भी व्यक्त होता है । यहाँ भी अनुप्रास तो माधुर्यकारक है ही, द्वितीयपादके आदिमें स्थित वर्णसमुदायकी चौथे पादके आदिमें व्यावृत्तिसे निष्पन्न व्यपेत सुकर यमक इस माधुर्यकी पुष्टि कर रहा है ।