काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३।३] १. यमक अन्य आचार्यों के मतमें १७ की मुख्य शोभाकी मुख्यताके विपरीत है, उचित नहीं है, तो इसका प्रयोग वैरस्यकारक होनेसे हेय होगा। इस प्रकार रुद्रट भी यमकको एकान्तमधुर नहीं मानते। भट्ट लोल्लटने रुद्रटके मन्तव्यको ही यों स्पष्ट किया है : प्रबन्ध काव्य में नदी, पर्वत, समुद्र, वृक्ष (वन), अश्व (यह रथ, गजादिका भी उपलक्षक है), नगर और शत्रुके वर्णनमें श्रम करना कविकी शक्ति और प्रसिद्धिमें फलित होता है। किन्तु यमकके अनुलोम आदि दुष्कर भेद रसके अत्यन्त विरोधी हैं। ये केवल कविका अभिमानमात्र बढ़ाते हैं कि मैं कवि हूँ। अथवा और लोगोंकी देखादेखी एक भेड़चाल है। १ लोल्लटके इस कथनमें अनुलोम तथा तदितर प्रतिलोम आदि दुष्कर चित्रबन्धोंके साहचर्यके कारण यमक भी दुष्कर ही अभिप्रेत है। अतः सुकर यमकका यदि रसाविरोधी प्रयोग किया जाता है, तो वह हेय नहीं होगा। लोल्लटका यह आशय भी इस प्रकार दण्डी के कथनका ही स्पष्टीकरण है। आनन्दवर्धनने भी लोल्लटके अतिरसविरोधित्वको आधार बनाकर ही यमककी काव्यमें उपयोगिताका क्षेत्र यों प्रतिपादित किया है : ध्वनिकी आत्मास्वरूप शृङ्गारमें, उससे भी अधिक विप्रलम्भ शृङ्गारमें, यमक आदि दुष्कर अलङ्कारोंका निबन्धन कवि चाहे जितना समर्थ हो, पर यह उसका मुख्य वस्तुके प्रति प्रमाद ही होगा। कहीं कोई इक्का-दुक्का यमक यदि काव्यमें स्वाभाविक रूपसे आ जाये, तो कोई दोष नहीं है। पर बहुलतासे अन्य अलंकारों के समान रसके अङ्गके रूपमें भी इनका निबन्धन नहीं करना चाहिये। विप्र- लम्भशृङ्गारमें तो बिल्कुल नहीं। यमकके निबन्धनमें शब्दचयनमें विशेष यत्न करना पड़ता है। इससे अर्थ, वह भी रस, उपेक्षित हो जाता है। इस प्रकार १. काव्यानुशासन, ५ अध्याय, यमकपर उद्धृत : तथा च लोल्लटः— 'यस्तु सरिदद्रिसागरनग*तुरगपुरादिवर्णने यत्नः। कविशक्तिख्यातिफलो विततधियां नो मतः प्रबन्धेषु ।। यमकानुलोमतदितरचक्रादिभिदोऽति** रसरोधिन्धः । **अभिमानमात्रमेतद् गड्डुरिकाऽऽदिप्रवाहो वा ।। *शैलवृक्षौ नगावगौ (अमरकोष ३।३।१६) । **रुद्रटीय काव्यालङ्कार ३।५६की नमिब्याख्यामें 'यदुक्तम्' कहकर उद्धृत इस श्लोकमें 'भिदो हि' तथा 'अभिधान' पाठ है ।