काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
पृष्ठ 39, कुल 270 में से
संदर्भ में पढ़ें१६ काव्यादर्श [३।३ (२) भेदनिरूपण दण्डीकी दिशामें किया है । काव्यमें यमकका महत्त्व : यमकके महत्त्वके बारेमें आचार्य दण्डीका यह कथन बहुत व्यावहारिक है कि यमक अनुप्रासके समान एकान्तमधुर नहीं है । अर्थात् यदि इसका उचित मात्रामें प्रयोग किया जाता है, तब तो यह अनुप्रासके समान शोभाधायक है । पर यदि यमकपर ही जोर दे दिया जाये, तो यह वैरस्यकारक हो जाता है ।¹ • भामहने उस यमकसे कवियोंको कृती माना है, (१) जिसके शब्द प्रसिद्ध हों, (२) जो ओजस्वी हो, (३) जिसके पदोंकी सन्धि सुश्लिष्ट हो' (४) प्रसादगुणयुक्त हो तथा (५) जो अभिधान (उच्चारण) की दृष्टिसे सुखकर हो ।² अर्थात् भामह भी यमकको एकान्तमधुर (केवल आनन्ददायी) नहीं मानते । इसके निबन्धनमें (i) सुखोच्चार्यता और (ii) सुखबोध्यता मुख्यतया अपेक्षित हैं । वामनकी दृष्टि इसके विपरीत है : वे इसमें दुर्बोध्यताकारी विचलन (भङ्ग)को ही उत्कर्षका हेतु मानते हैं ।³ रुद्रटने प्रायेण भामहका कथन ही दुहराया है । एक बात विशेष रूपसे स्पष्ट की है कि महाकाव्योंमें, अर्थात् पद्यबद्ध काव्यविधानोंमें, यमकका प्रयोग कथावस्तु (वर्ण्य विषय) को दृष्टिमें रखते हुए औचित्यको समझकर बहुतायत से करना चाहिये ।⁴ अर्थात् वस्तुकी प्रस्तुतिके यदि वह अनुकूल नहीं है, काव्य १. आवृत्तिं वर्णसङ्घातगोचरां यमकं विदुः । तत्त नैकान्तमधुरमतः पश्चाद् विधास्यते ॥ काव्यादर्श १।६१ २. प्रतीतशब्दमोजस्वि, सुश्लिष्टपदसन्धि च । प्रसादि, स्वभिधानं च यमकं कृतिनां मतम् ॥ काव्यालङ्कार २।१८ ३. काव्याल० सूत्र ४।१।३-७ : भङ्गादुत्कर्षः । शृङ्खला, परिवर्तकश्चूर्णमिति भङ्गमार्गः । वर्णविच्छेदचलनं शृङ्खला । सङ्गविनिवृत्तौ स्वरूपापत्तिः परिवर्तकः । पिण्डाक्षरभेदे स्वरूपलोपश्चूर्णम् । इन तीन मार्गोंमें भी वामन वर्णसमुदायके स्वरूपलोप भेदको सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मानते हैं : अप्राप्तचूर्णभङ्गानि यथास्थानस्थितान्यपि । अलकानीव नात्यर्थं यमकानि चकासति ॥ ४. इति यमकमशेषं सम्यगालोचयद्भिः सुकविभिरभियुक्तैर्वस्तु चौचित्यविद्भिः । सुविहितपदभङ्गं, सुप्रसिद्धाभिधानं तदनु विरचनीयं सर्गबन्धेषु भूम्ना ॥ काव्यालङ्कार ३।५६