काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१३] १ यमक अन्य आचार्योंके मतमें १५ साङ्कर्य निवारणके लिये ‘अर्थ होनेपर’ परिष्कार किया है । ‘समरसमरसोऽयम्’ इत्यादिमें कुछ (आवर्त्य) अंश अर्थवान् हैं, तो कुछ (आवृत्त) अंश अर्थरहित हैं, अतः ‘भिन्न अर्थ वाले’ कहना उचित नहीं है, इस लिये ‘अर्थ होनेपर’ कहा है ।¹ मम्मटके भी भेदनिरूपणका आधार दण्डीका निरूपण है । आचार्य कुन्तकने भी लक्षण भामहके अनुसार और भेद दण्डी अथवा तदनुसारी वामनके अनुसार किया है । पर उन्होंने यमकमें स्थाननियमके अतिरिक्त और किसी प्रकारकी शोभाके अभावके कारण उसके भेदोंका अधिक विस्तार करना उचित नहीं समझा है ।२ आचार्य रुय्यकने यमकमें कुछ स्पष्टता करके बहुत साधारण ढंगसे दिया है : स्वर और व्यञ्जनके समुदायकी अप्ररूढ पुनरुक्ति यमक होता है । यह वर्णसमुदायके (क) भिन्नार्थक, (ख) अभिन्नार्थक एवम् (ग) एक अंशके अर्थरहित और दूसरे अंशके सार्थक होनेके कारण सङ्क्षेपसे तीन प्रकारका होता है ।³ यह भेदकथन मम्मटके कथनका विस्तार है । आचार्य हेमचन्द्रने (१) रुद्रटके श्रुतिक्रमैक्यके और मम्मटके वर्णोंके अर्थ- वान् होनेपर भिन्नार्थताके कथनको मिलाकर अपना लक्षण पूरा किया है ।⁴ १. काव्यप्रकाश ११७ : अर्थे सत्यर्थभिन्नानां * वर्णानां सा पुनः श्रुतिः । यमकम् । ‘समरसमरसोऽयम्’ इत्यादावेकेषामर्थवत्त्वेऽन्येषामनर्थकत्वे ‘भिन्नार्थकानाम्’ इति न युज्यते वक्तुम् । इति ‘अर्थे सति’ इत्युक्तम् । भामहके ‘भिन्नानामभिधेयैः’का अनुवाद है यह । अतः ‘अर्थैर्भिन्नानाम्’ (तृतीया तत्पुरुष) इष्ट है । ‘भिन्ना अर्था येषाम्’ (बहुव्रीहि) में ‘निष्ठा’ (अष्टा० २।२।३६, से ‘भिन्न’ का पूर्वप्रयोग प्राप्त है । आहिताग्न्यादि आकृति गण (३७) से पूर्वप्रयोगका विकल्प मानना प्रयोजनाभावके कारण उचित नहीं है । २. समानवर्णमन्यार्थं, प्रसादि, श्रुतिपेशलम् । औचित्ययुक्तमाद्यादिनियतस्थानशोभि यत् ।। वक्रोक्तिजीवित० २।६ यमकं नाम कोऽप्यस्याः प्रकारः परिदृश्यते । स तु शोभाऽन्तराभावादिह नाति प्रतन्यते ।। ७ ३. अलङ्कारसर्वस्व ७ : स्वरव्यञ्जनसमुदायपौनरुक्त्यं यमकम् । अत्र (क) क्वचिद् भिन्नार्थत्वम्, (ख) क्वचिदभिन्नार्थत्वम्, (ग) क्वचिद् एकस्यानर्थकत्वमपरस्य सार्थकत्वमिति सङ्क्षेपतः प्रकारत्रयम् । ४. काव्यानुशासन, ५ अध्याय, पृष्ठ २४६ : सत्यर्थेऽन्यार्थानां वर्णानां श्रुति- क्रमैक्ये यमकम् ।