भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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२८ काव्यादर्श [३।१६ १३. मानिनी मा निनीषुस्ते निषङ्गत्वमनङ्ग मे । हारिणी हारिणी शर्म तनतां तनुतां यतः ॥ १६ ॥ १३. हे कामदेव, मुझे तुम्हारे बाणोंका तूणीर (भण्डार) बनाना चाहती हुई, (मुझपर) मान किये बैठी, मोतियोंके हारसे सुशोभित, मनोहर (मेरी प्रिया) मुझ दुबला होते हुएका कल्याण करे । अर्थात् मान छोड़कर मुझे अपनाये ॥ १६ ॥ इसमें भी रतिके उद्दीपन विभावका वर्णन है। मलयपवन उत्तमपुरुषवाच्य पुरुष या स्त्रीको यों तो पहले ही दुःखदायी था। पर वसन्त ऋतुकी चाँदनी रातोंके शुरू होते ही कोहरा छँट जानेके कारण निर्मल चन्द्रकलाके साथ मिलकर तो वह अत्यन्त दुस्सह विष, अर्थात् आशु प्राणहारी, अर्थात् उसके समान प्रेमकी पीरको बढ़ाकर प्राणलेवा, मदनका अनुगामी, बन रहा है। इस प्रकार यहाँ उद्दीपन विभावके द्वारा विप्रलम्भ रति प्रतिपादित है। दन्त्य वर्णोंकी बहुलतासे अनुप्रास तो माधुर्यकारक है ही, प्रथम, द्वितीय और चतुर्थ इन तीन पादोंमें एकेक वर्णसमुदायकी निरन्तर एवं सरल आवृत्तिसे भी माधुर्यकी सृष्टि होती है। इस प्रकार यहाँ यमक विप्रलम्भरतिके सर्वथा अनु- कूल है। प्रथम और द्वितीय पादोंमें प्रथम वर्णसमुदायमें नासिक्य ध्वनि अनु- स्वार या परसवर्ण है, तो आवृत्तमें नकार है। नासिक्यत्वकी समानताके कारण ध्वनिप्रभावमें अन्तर नहीं आनेसे निरन्तरतामें बाधा नहीं आती ॥ १५ ॥ १३. (१. ग. ३) प्रथमतृतीय-चतुर्थ-पादादि अव्यपेत सुकर पादादियमक— आदियमकके तेरहवें और त्रिपादयमकके तीसरे भेदके इस (१६वें श्लोकमें दिये) उदाहरणमें कविने मानिनी प्रियाके प्रति नायककी विप्रलम्भ रतिका प्रतिपादन दोनों आलम्बनों तथा तनुत्व अनुभावके वर्णनसे किया है। नायककी प्रियाके स्वाभाविक सौन्दर्यकी अभिव्यक्ति प्रथम 'हारिणी' से तथा आहार्य सौन्दर्यकी द्वितीय 'हारिणी' से की है। नायकके प्रति मानवती स्वाभाविक तथा आहार्य सौन्दर्यसे सम्पन्न नायिकाके प्रति नायकका प्रेम इतना बढ़ गया है कि उसे लगता है जैसे कामदेवके सारे बाण उसके हाथ लग गये हैं, और वह उन सबका प्रयोग नायकपर कर रही है। ऐसा लगता है मानों वह नायकको कामदेवका तूणीर ही बना देना चाहती है। १. अन्वयः—अनङ्ग, मा ते निषङ्गत्वं निनीषुः, मानिनी, हारिणी, हारिणी तनुतां यतः मे शर्म तनुताम् ।