भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 52, कुल 270 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 52

३।१७] १.१ अन्यपेत पादादिज त्रिपाद यमक २६ १४. जयता त्वन्मुखेनास्मानकथं न कथं जितम् ? कमलङ्कमलङ्कुर्वदलिमद्दलि मत्प्रिये ॥ १७ ॥ १४. हे मेरी प्यारी, हमें जीतते हुए तुम्हारे मुखने नहीं बोलने वाला, जलकी शोभा बढ़ाता हुआ, भ्रमरोंसे सुशोभित, पँखुड़ियों वाला कमल कैसे नहीं जीता ? (अर्थात् वह तो जीत ही लिया है) ॥ १७ ॥ इससे नायक बहुत क्षीणता अनुभव कर रहा है । वह कामदेवसे प्रार्थना करता है कि कामदेव ऐसा कुछ करें कि वह मानिनी नायकके लिये कल्याण- कारिणी हो जाये । अर्थात् कामदेव नायिकापर भी अपने शरोंका ऐसे सन्धान करे कि वह मान छोड़नेको बाध्य हो जाए, जिससे कि नायकको नायिकासे मिलनका सुख प्राप्त हो । यहाँ अनुप्राससे तो माधुर्य है ही, त्रिपादादियमक भी मुख्य भावके अनु- कूल माधुर्यकी सृष्टि कर रहा है । 'कामदेवका तूणीर बनाना चाहती हुई' कथनमें 'इव' आदिके बिना उत्प्रेक्षा है । इससे नायककी अत्यन्त प्रेमविह्व- लता वस्तु व्यक्त होती है । प्रथम तनुताम् तनु (विस्तारे), कर्तरि लोट्, आत्मनेपद, प्रथम पुरुष, एक वचन, का रूप है । द्वितीय 'तनुताम्' तनु + तल्, द्वितीया, ए० व०, में 'यतः' (√ इण् गतौ, शतृ, पुंल्लिङ्ग, षष्ठी, ए० व०) का कर्म है ॥ १६ ॥ १४. (१. ग ४) द्वितीय-तृतीय-चतुर्थ-पादादि त्रिपाद्यमक - आदियमकके चौदहवें और पादादियमकके चौथे उदाहरणके रूपमें प्रस्तुत प्रकृत श्लोकमें आचार्य कवि दण्डीने आलम्बन विभाव नायिकाके वर्णनसे रतिको प्रस्तुत किया है । यहाँ 'अस्मान्'का व्यङ्ग्यार्थ यह है कि हम जो कि तेरे मुखकी प्रशंसा में इतने मुखर हैं, उनको तुम्हारे मुखने जीतकर दास बना लिया है, तब इस जड, मूक, जलको शोभित करने वाले इत्यादि प्रकारके कमलकी तो बिसात ही क्या है ! यहाँ कमलके विशेषणोंसे मुखके पानीदार होनेके अतिरिक्त चञ्चल भ्रमरसदृश नयनोंसे और कमलकी पँखुड़ी जैसे ओठोंसे सुशोभित मुखका कमलसे साम्य व्यक्त होता है । कमलको जीतनेसे नायिका के मुखकी कमलसे अधिक शोभा व्यक्त होती है । अतः व्यतिरेक व्यङ्ग्य है । दन्त्य वर्णोंकी अधिकतासे दन्तप्रभासदृश कान्तिमान् अनुप्राससे यहाँ माधुर्य गुण है । कोमल वर्णसमुदायकी तीन पादोंमें आवृत्तिसे पुष्ट हो गया है । १. अन्वयः - मत्प्रिये, अस्मान् जयता त्वन्मुखेन अकथं, कम् अलङ्कुर्वत्, अलिमत्, दलि कमलं कथं न जितम् ?