भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 50, कुल 270 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 50

३।१४-१५] १. १ अव्यपेत पादादि ग. त्रिपाद यमक २७

कुरुते कुरुतेनेयं हंसी मामन्तकामिषम् ॥ १४ ॥ १२. विषमं विषमन्वेति मदनं मदनन्दनः । सहेन्दुकलयाऽपोढमलया मलयानिलः¹ ॥ १५ ॥ में यह शुक्लवर्णा हंसी अपनी दुखदायी आवाजसे मुझे मौतका निवाला बना रही है ॥ १४ ॥ १२. मुझे आनन्दरहित (अर्थात् दुःखी) करने वाला मलयमारुत निर्मल चन्द्रकलाके साथ विषम (तीक्ष्ण, दुःसह) विषस्वरूप मदनका अनुचर हो रहा है ॥ १५ ॥ ११(१. ग. १) प्रथम-द्वितीय-तृतीयपादादि त्रिपाद्यमक—आचार्य कवि दण्डीने १४वें श्लोकमें रति भावके उद्दीपन विभावका ही वर्णन पिछले श्लोकके समान सरोवरमें अपने प्रियतमके वियोगमें दुःखी हंसीके करुणरवसे प्रियाकी याद आ जानेके कारण बेचैन प्रेमीके वर्णनके द्वारा किया है । सरोवरके जलमें मस्त सारस तो विहार कर रहे हैं, पर हंसी बेचारी अकेली बैठी रो रही है । उसका यह दुःखपूर्ण होनेसे कुरव वर्ण्य उत्तमपुरुषाभिधेय पुरुषको मृत्युका ग्रास बना रहा है । अर्थात् 'अन्य स्त्रीपुरुष जब चहुँ ओर आनन्दविहार कर रहे हैं, तब उसकी प्रिया उसके वियोगमें इस हंसीके समान रो रही होगी', यह सोचकर उस पुरुषके प्राण मुँहको आ रहे हैं। यहाँ इस आर्थ शोभाके साथ तदनुकूल शब्द शोभा भी दन्त्य वर्णों और ओष्ठ्य मकार की आवृत्तिसे जन्य अनुप्राससे उत्पन्न हो रही है। तब अयत्नसाध्य अतएव सुकर त्रिपादादि अव्यपेत यमक इस माधुर्यको और भी पुष्ट कर रहा है। विशन्तः प्रविशन्तो गाहमानाः, आ समन्ततः = पूर्णतया, मत्ता यौवनेन प्रेम्णा च क्षीबाः, सारस्यश्च सारसाश्चेति सारसा यस्मिन्, तस्मिन् । सरस इदम् सारसम् । तस्मिन्² ॥ १४ ॥ १२. (१. ग. २) प्रथम-द्वितीय-चतुर्थ-पादादि अव्यपेत सुकर त्रिपाद- यमक—पन्द्रहवें श्लोकमें आदियमकके १२वें भेदका उदाहरण दिया है। १. अन्वयः—मत्-अनन्दनः मलयानिलः अपोढ-मलया इन्दु-कलया सह विषमं विषं मदनम् अन्वेति । २. सारसी और सारसके द्वन्द्व समासमें 'पुमान् स्त्रिया' (अष्टा० १।२।६७) से 'सारस'का एकशेष रहता है । 'सरस् + ङस्'से 'तस्येदम्' (अष्टा० ४।३।१२०) से अण्+सप्तमी ए० व०से निष्पन्न 'सारसे' 'जले'का विशेषण है।

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित) · पृष्ठ 50, कुल 270 में से · BharatKosha