भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 49, कुल 270 में से

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पृष्ठ 49

२६ काव्यादर्श [३।१३-१४ १०. निगृह्य नेत्रे कर्षन्ति बालपल्लवशोभिना । तरुणा तरुणाकृष्टानलिनो नलिनोन्मुखाः ॥ १३ ॥ (१. १ अव्यपेत पादादि ग. त्रिपाद यमक) ११. विशदा विशदामत्तसारसे सारसे जले । १०. कोंपलोंसे सुशोभित वृक्षके द्वारा आकृष्ट युवाओंको कमलोंपर मँड- राते हुये भ्रमर दोनों आँखें जकड़कर खींच लेते हैं ॥ १३ ॥ ११. अवगाहन करते हुए, खूब मत्त सारसी-सारसों वाले सरोवरके जल अवस्था' प्रेमकी दशवीं अवस्था है ।¹ बाकी नौ दशाएँ तो हो चुकी हैं । दसवीं की कसर है । अतः समय रहते चेत जाओ ! कोमलाङ्गी अबलाके वधका महापाप अपने सिर मत लो ! रत्नश्रीज्ञान और वादीजी द्वारा दिया 'तादृशीम्' पाठभेद 'अङ्गनाम्'का विशेषण है, जो अङ्गनाकी प्रेमपरवशताको व्यक्त करता है ॥ १२ । १०. (१. ख. ६.) तृतीय-चतुर्थपादादि अव्यपेत सुकर द्विपादयमक— तेरहवें श्लोकमें कवि आचार्य दण्डीने रति भावके उद्दीपन विभाव वसन्तमें वृक्षोंके पल्लवित होने तथा कमलोंपर मँडराते भौरोंके द्वारा तरुणोंको आकृष्ट किये जानेका वर्णन किया है । यहाँ बालपल्लवशोभी तरुसे तरुणीका नवयौवन के अङ्कुरोंसे सुशोभित देह व्यक्त होता है तथा नलिनोन्मुख भ्रमरोंसे नलिन (कमल) के सदृश मुखपर स्थित चञ्चल कजरारे नयन अभीष्ट हैं : पहले तरुणीका छरहरा खिलता हुआ शरीर तरुणोंका आकर्षण करता है, फिर उनको जकड़कर खींच लेते हैं मुखकमलपर मँडराते नयनभ्रमर । इस प्रकार यहाँ वस्तुसे रूपक ध्वनित है । श्लोकके पूर्वार्धमें कण्ठ्य और दन्त्य वर्णोंकी आवृत्तिसे श्रुत्यनुप्रास है । उत्तरार्धके दोनों पादोंके आदिमें एकेक वर्णसमुदाय निरन्तर रूपसे आवृत्त है । अर्थावबोधमें क्षणांशकी भी बाधा न होनेसे यह यमक सुकर है ॥ १३ ॥ (१.ग) त्रिपादादि अव्यपेत सुकर यमक—आचार्यने अगले चार (१४- १७) श्लोकोंमें तीन पादोंके आदिमें निरन्तर (अव्यपेत) सुकर यमकके चार उदाहरण प्रस्तुत किये हैं । १. एवंविधैः कामलिङ्गैरप्राप्तसुरतोत्सवा । दशावस्थागतं कामं नानाभावं प्रदर्शयेत् ॥ नाट्य० २२।१६०-१६१ सर्वैः कृतैः प्रतीकारैर्यदि नास्ति समागमः । कामाग्निना प्रदीप्ताया जायते मरणं ततः ॥ १६२

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