काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३।१२] १. १ अन्यपेत पादादि ख. द्विपद यमक २५ ६. कथं त्वदुपलम्भाशाविहताविह तादृशी । अवस्था नालमारोढुमङ्गनामङ्गनाशिनी ॥ १२ ॥ ६. तुम्हारी प्राप्तिकी आशाके इस विघातके होनेपर वैसी, अङ्गोंको नष्ट करने वाली (मरण) अवस्था सुन्दर अङ्गों वालीको कैसे न प्राप्त होवे ? ॥ १२ ॥ कल्पद्रुममें उद्धृत त्रिकाण्डशेष कोषके अनुसार 'मन्मन' (अकारान्त पुंल्लिङ्ग) 'गद्गदध्वनि' अर्थ में है । कृष्णमाचार्यने 'यह 'मुणमुण' आदिके समान अनु- करणात्मक शब्द भी हो सकता है', कहा है । रङ्गराजरेड्डी द्वारा उद्धृत विश्व- कोषमें इसे 'रतिभाषित' अर्थमें बताया है । चिन्तामणि (शब्दकल्पद्रुममें उद्धृत) ने भी इसे प्रेमियुगलके सुरतालापका वाचक बताया है ।१ अन्तिम अर्थ अवसरानुकूल तथा प्रमाणपुष्ट होनेसे उचित है । यह शब्द भौवादिक √मण शब्दे (१३।५२) से निष्पन्न है । 'मणित' इसीका पर्याय है ॥ ११ ॥ ६. (१. ख. ५) द्वितीय-चतुर्थ-पादादि द्विपद अव्यपेत सुकर यमक— विरहिणी नायिकाकी सहेली नायकके आगमनके प्रति हताश नायिकाकी कष्टयुक्त अवस्था नायकको बता रही है । इस प्रकार कष्टावस्था अनुभावके प्रतिपादनसे विप्रलम्भ रतिकी व्यञ्जना यहाँ हुई है । इसके लिये अत्यन्त कोमल एवं मधुर रचनाकी अपेक्षा है । दन्त्य वर्णोंकी आवृत्तिसे यहाँ श्रुत्यनु- प्रास इसे उत्पन्न कर रहा है । द्वितीय और चतुर्थ पादोंमें भी कोमल वर्ण- समुदायकी निरन्तर सुकर (अयत्नसाध्य) आवृत्तिसे यमक उस माधुर्यकी सृष्टि करके विप्रलम्भ रतिका उपकारी है । स्वरोंका आरोहावरोह भी मुख्य भावके अनुकूल है । 'इह'को रत्नश्रीज्ञानने 'विहतौ'का विशेषण माना है । वादी जी ने अध्या- हार्य 'अवसरे'का तथा तरुणवाचस्पतिने अपनी तरुणाईके अनुकूल 'वसन्ते'का उपस्थापक माना है । हमें रत्नश्रीज्ञान उचित प्रतीत होते हैं : मेरी सखी तुम्हें पानेकी बड़ी आशा लगाये बैठी है । तुम यदि यों उसकी आस तोड़ोगे, तो यह आशाविघात निश्चय ही उसे तोड़ डालेगा । उसकी हालत पहलेसे ही ऐसी-वैसी है । वह अब धीरे-धीरे मौतकी ओर बढ़ जायेगी । 'अङ्गनाशिनी १. सुरते कर्णमूले तु निजदेशीयभाषया । दम्पत्योः कथनं यत्तु मन्मनं तं विदुर्बुधाः ॥ २. वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी, भ्वादिगण, भवतोषिणी, पृष्ठ ४०१-४०२ ।