भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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२२ काव्यादर्श [ ३।८ (१. १ अव्यपेत पादादि ख. द्विपाद यमक) ५. मधुरं मधुरम्भोजवदने वद नेत्रयोः । विभ्रमं भ्रमरभ्रान्त्या विडम्बयति किं न्विदम् ? ॥ ८ ॥ ५. हे कमलमुखी, तुम बताओ कि क्या वसन्त भ्रमरोंके भ्रमणसे नयनोंके मधुर विभ्रम (चञ्चलता) की नकल कर रहा है ? ॥ ८ ॥ आचार्य दण्डीने वर्ण्य राजाके शत्रुओंके दलबलके पूरी तरह संहारके बाद उनमें से कुछ कायर राजाओं द्वारा पलायन करके प्राण बचानेके और शूर शत्रुओं द्वारा लड़ते-लड़ते प्राणोत्सर्ग करनेके वर्णनसे विजयिराजगत उत्साहको अङ्ग बनाकर कविकि राजाके प्रति रति व्यक्त की है । वन और स्वर्गको 'आक्रान्त' कहनेसे भी अर्थविशेष सूचित होता है : अरण्यमें कोई विरोध करने वाला नहीं है, इसलिये कायरोंने वनपर आक्रमण किया, वनके तृण, गुल्म, मृग आदिपर अपना गुस्सा निकाला । जो शूर थे, उन्होंने भी सुखभोगी देवताओंके घरोंपर हल्ला बोला । जिन्होंने शत्रुओंको अपने घरोंतक पहुँचने दिया, वे क्या खाक उनका मुकाबला करेंगे ? इस प्रकार प्रकृत राजाकी देवताओंसे श्रेष्ठ शत्रुओंपर विजयके वर्णनसे कविका रतिभाव और भी पुष्ट होता है । दन्त्याक्षरोंकी आवृत्तिसे निष्पन्न श्रुत्यनुप्रास जैसे इस भावका अङ्ग होकर काव्यमें शोभा उत्पन्न कर रहा है, वैसे ही चतुर्थ पादके आरम्भमें 'रहिते' वर्णसमुदायकी निरन्तर सुकर आवृत्तिसे सम्पन्न यमक भी शोभा- कारक है । तृतीय पादमें चतुरङ्गिणी सेनाके अङ्गोंका क्रमभङ्ग छन्दके कारण करना पड़ा है । 'रथनागाश्व' से लक्षणासे रथी आदिका बोध होता है ॥ ७ ॥ (१. ख) अव्यपेत सुकर द्विपादादियमक—अव्यपेत सुकर आदियमकके (ख) द्विपाद भेदके ६ उदाहरण छह (८-१३) श्लोकोंमें दिये हैं : ५. (१. ख. १) प्रथम-द्वितीयपादादि द्विपादअव्यपेतयमक—अष्टम श्लोकमें वर्ण्य नायिकाके प्रति वर्णयिता नायककी नायिकाके नयनों (उद्दीपन विभाव) की चाटूपमासे पुष्ट रति व्यक्त की गई है । इसके प्रथम और द्वितीय पादोंके आरम्भमें 'मधुरम्' और 'वदने' वर्णसमुदायकी निरन्तर आवृत्तिसे सुखबोध्य द्विपादयमक सम्पन्न हुआ है । अर्थप्रतीतिमें तनिक भी क्लेश न होनेसे यह यमक काव्यमें माधुर्यका आधान करता है । तृतीय पादमें पदगत तथा पाद-