भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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३।५-७] १. १ अव्यपेत पादादि क. एकपद यमक २१ नुन्नमानं मनः स्त्रीणां सह रत्या विगाहते ॥ ५ ॥ ३. राजन्वत्यः प्रजा जाता भवन्तं प्राप्य साम्प्रतम् । चतुरं चतुरम्भोधिरसनोर्वीकरग्रहे ॥ ६ ॥ ४. अरण्यं कैश्चिदाक्रान्तमन्यैः सद्म दिवौकसाम् । पदाति-रथ-नागाश्वरहितैरहितैस्तव ॥ ७ ॥ की पत्नी रति) के साथ हंसोंके मदको बढ़ाने वाली मेघोंकी गर्जनाके द्वारा टूटे हुए मान वाले स्त्रियोंके मनमें अठखेलियाँ कर रहा है ॥ ५ ॥ ३. चारों समुद्रों रूपी करधनी वाली पृथ्वीका कर (हाथ, शुल्क) ग्रहण करनेपर अब चतुर आपको पाकर प्रजायें श्रेष्ठ राजा वाली¹ हो गई हैं ॥ ६ ॥ ४. पैदल, रथ, हाथी, घोड़ा (चतुरंगिणी सेना) से रहित तुम्हारे कुछ शत्रुओंने जङ्गलकी राह ली, कुछने देवोंके निवास (स्वर्ग) की ॥ ७ ॥ द्वारा प्रियतमोंके प्रति रतिके उद्दीपनका वर्णन किया गया है। यहाँ द्वितीय पादके आदिमें 'मदनो' वर्णसमुदायकी निरन्तर आवृत्तिसे यमक निष्पन्न है। श्रुत्यनुप्रासके समान ही यह यहाँ विप्रलम्भमें अपेक्षित माधुर्यको भलीभाँति व्यक्त कर रहा है। 'मनः' शब्दमें 'चित्त' और 'मानस' सरोवर (हंसोंकी क्रीडा- स्थली) का और 'रति' में शृङ्गारके स्थायी भाव प्रेम तथा कामदेवकी पत्नी का श्लेष (दण्डीका अभङ्गपद, उद्भटका अर्थश्लेष) है। 'सहोक्ति अलङ्कार भी शोभाकारक है। इन सबमें मुख्यता विप्रलम्भ रति भावकी है ॥ ५ ॥ ३. (१. क. ३) तृतीयपादादि अव्यपेत एकपाद यमक—प्रकृत श्लोकमें समुद्रोंपर रसनाके आरोपसे तथा 'कर' शब्दके (पाणि और शुल्क) अर्थ- श्लेषसे 'हाथ' अर्थके बलपर उर्वीकी नायिकाके रूपमें और भवत्पदवाच्य राजाकी नायकके रूपमें प्रतीतिके कारण समासोक्ति अलङ्कार है। कविका राजाके प्रति रति भाव व्यक्त होनेसे ऊर्जस्वी अलङ्कार व्यक्त है। तृतीय पादके आदिमें 'चतुरम्' वर्णसमुदायकी निरन्तर आवृत्तिसे सम्पन्न यमक मुख्य अलङ्कार ऊर्जस्वीके अनुकूल ही है, प्रतिकूल नहीं। इस प्रकार यह सुकर यमक भी काव्यमें शोभोत्पादक होनेसे अलङ्कार है। जकारकी आवृत्तिसे निष्पन्न अनुप्रास भी काव्यशोभा उत्पन्न कर रहा है। इस प्रकार यह उदाहरण शब्द और अर्थ, दोनों दृष्टियोंसे शोभायुक्त है ॥ ६ ॥ ४. (१. क. ४) चतुर्थपादादि अव्यपेत एकपाद यमक—सातवें श्लोकमें १. अष्टा० ८।२।१४ : राजन्वान् सौराज्ये । अमरकोष २।१।१३ : सुराज्ञि देशे राजन्वान् स्यात् ततोऽन्यत्र राजवान् ।