काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२० काव्यादर्श [ ३।५ (क २.) मेघनादेन हंसानां मदनो मदनोदिना । २. मदन (कामदेव) रति (शृङ्गारका स्थायी भाव, प्रेम तथा कामदेव प्रथम पादमें निरन्तर 'मानेन' वर्णसमुदायकी आवृत्ति की गई है । प्रथम 'मानेन' पद 'मान'का तृतीया एकवचनान्त रूप है, तो दूसरा 'मा + अनेन'का दीर्घसन्धिसे निष्पन्न वर्णसमुदाय है । पारिभाषिक शब्दत्व अथवा पदत्व दण्डीको अपेक्षित नहीं है । 'वर्णसमुदाय' अपेक्षित है । अतः यहाँ अर्थविचार की तनिक भी आवश्यकता नहीं है, और इस प्रकार यह पूर्णतया शब्दालङ्कार है । क्रियापद 'भूत्' में निषेधार्थक 'मा' (माङ्) के योगमें √भू से लुङ्का विधान तथा भूतकरण अट्का निषेध है ।¹ यहाँ विप्रलम्भरतिका निरूपण खण्डिता नायिकाके प्रति सखियोंकी उक्तिके माध्यमसे किया गया है । अन्य किसी स्त्रीके प्रति आसक्त नायककी प्रतीक्षा करती नायिका खण्डिता होती है ।² वह अपने नायकके प्रति यदि मान करती है,³ तो नायकके निर्लज्ज⁴ होनेकी आशङ्का रहती है । सखियोंने इस लिये खण्डिता नायिका को गृहागत प्रियके प्रति मान न करके उसे अपनाकर लज्जित करनेकी राय दी है, ताकि वह अपनी करनीपर लज्जा अनुभव करके भविष्यमें नायिकाके प्रति ऐसा अपराध न करे । यहाँ आचार्यने विप्रलम्भ शृङ्गारमें भी यमकका प्रयोग सरल स्वाभाविक रूपसे किया है । अतः यह रसविरोधी कथमपि नहीं है । आनन्दवर्धनका (ध्वन्यालोक २।१५में) विप्रलम्भमें यमकनिबन्धनका सर्वथा निषेध इस प्रकार के उदाहरणको देखते हुए अतिवाद ही है ।। ४ ।। २.(१. क. २) द्वितीयपादादि अव्यपेत एकपाद सुकर यमक — इस श्लोकमें विप्रलम्भ अवस्थामें मानवती कामिनियोंके मनमें उद्दीपन विभाव मेघगर्जनाके १. अष्टाध्यायी ३।३।१७५ : माङि लुङ् । ६।४।७४ : न माङ्योगे । २. व्यासङ्गादुचिते यस्या वासके नागतः प्रियः । तदनागमनार्ता तु खण्डितेत्यभिधीयते ।। नाट्यशास्त्र २२।२०६ ३. स मानो नायिका यस्मिन्नीर्ष्याया नायकं प्रति । धत्ते विकारमन्यस्त्रीसङ्गदोषवशाद् यथा ।। शृङ्गारतिलक २।४४ ४. वार्यमाणो दृढतरं यो नारीमुपसर्पति । संच्छिन्नः सापराधश्च, स 'निर्लज्ज' इति स्मृतः ।। नाट्यशास्त्र २२।३०६