काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३।६-१०] १. १ अव्यपेत पादादि ख. द्विपद यमक २३ ६. वारणो वा रणोद्दामो हयो वा स्मर, दुर्धरः । न यतो नयतोऽन्तं नस्तदहो विक्रमस्तव ॥ ६ ॥ ७. राजितैराजितैक्ष्ण्येन जीयते त्वादृशैनृपैः । ६. हे कामदेव, हमें (हमारे जैसे विरहियोंको) मरण तक पहुँचाने वाले तुम्हारे (पास) क्योंकि न सङ्ग्राममें दुर्दम्य, उन्मुक्त (निर्बन्ध विचरण करता) हाथी है, और न काबूमें नहीं आने वाला अश्व ही है; अतः तुम्हारा पराक्रम अद्भुत है ॥ ६ ॥ ७. धरती तुम्हारे जैसे राजाओं द्वारा पहले तो जीती जाती है, और गत अनुप्रास भी रतिभावके अनुकूल माधुर्य उत्पन्न कर रहा है। इस प्रकार यह मुक्तक शब्द और अर्थ, दोनों दृष्टियोंसे इष्टार्थसे युक्त है। यमक इस इष्टार्थव्यवच्छेदमें साधक है, बाधक नहीं । अम्बोजपर वदनके आरोपसे भी सुन्दर अर्थकी प्रतीति होती है : अम्बोजपर भ्रमर भ्रमणशील हैं, तो वदनपर नेत्रोंका विभ्रम है । 'अम्बोजके तुल्य वदन वाली' व्याख्यामें वाचकलुप्ता समासोपमामें भी चारुत्व अव्याहत है। अतः इन दोनों रूपक और समासो- पमाका सन्देह होनेसे भामहादिके अनुसार सन्देहसङ्कर एवं रूपक, या उपमा या उनके सन्देहके चाटूपमाका अंग होनेसे अङ्गाङ्गिभावसङ्कर भी है। छन्दमें अक्षरयोजना भी विभ्रमयुक्त होनेसे अर्थके अनुकूल है ॥ ८ ॥ ६. (१. ख. २) प्रथम-तृतीयपादादि द्विपद अव्यपेतयमक—नवें श्लोकमें कामदेवका अद्भुत शौर्य दण्डीके मतमें हेतुवैकल्यविशेषोक्ति तथा उद्भटके मतमें विभावना अलङ्कारके द्वारा बताया गया है। शत्रुओंको मौतके घाट उतारनेके लिये राजा लोग चतुरङ्गिणी सेनाकी सहायता लिया करते हैं। पर इन प्रसिद्ध हेतुओंके बिना भी कामदेव वही काम कर रहा है, जो इन हेतुओंसे किया जाता है। 'वारण' और 'हय' दो ही अङ्गोंका कथन यह सूचित करता है कि जब हाथी या घोड़ा ही नहीं है, तब रथ और पैदल सेना तो कहाँ से होंगी ! यहाँ प्रथम और तृतीय पादोंके आरम्भमें वर्णसमुदायकी आवृत्ति निर- न्तर की गई है। किसी क्लिष्ट कल्पनाकी अपेक्षाके बिना ही सरलतासे अर्थ- बोध होनेके कारण यह यमक सुकर है ॥ ६ ॥ ७. (१. ख. ३) प्रथम-चतुर्थ-पादादि द्विपद सुकर अव्यपेतयमक—दसवें श्लोकमें कविने युद्धमें तीक्ष्णतासे उपलक्षित शौर्यके द्वारा भूमिजयसे राजाके