भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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३२ काव्यादर्श [३।२१-२२ १७. करोतिताम्रो रामाणां तन्त्रीताडनविभ्रमम् । करोति सेर्षयं कान्ते वा श्रवणोत्पलताडनम् ॥ २१ ॥ १८. सकलापोल्लसनया कलापिन्याऽनुनृत्यते । मेघाली नर्तिता वातैः सकलापो विमुञ्चति ॥ २२ ॥ १७. रमणियोंका अत्यन्त ताम्र (लाल) हाथ (या तो) वीणाके (तारों के) ताडनरूपी विभ्रम (लीला) को करता है, या प्रियतमके प्रति कर्णोत्पल का ईर्ष्यायुक्त प्रहार (करता है) ॥ २१ ॥ १८. हवाओंसे नचाई हुई मेघमाला सारा पानी छोड़ रही है । अपने पिच्छभारको फैलाकर मयूरी उसके अनुकरणमें नृत्य कर रही है ॥ २२ ॥ गृहीत 'एणी'की तत्सम्बद्ध दृष्टिमें लक्षणासे 'एण-दृश्' शब्द निष्पन्न होता है ॥ २० ॥ १७. (२. ख. २.) प्रथम-तृतीयपादत व्यपेत सुकर द्विपादादियमक— इस श्लोकमें रतिकी आलम्बन रमणियोंके कोमल करका तथा ईर्ष्या व्यभि- चारी भावका वर्णन कविने किया है । समूचे श्लोकमें व्याप्त अनुप्रास तो माधुर्यकारक है ही, प्रथम पादके आदिमें स्थित वर्णसमुदायकी आवृत्ति तृतीय पादमें करनेसे भी विशिष्ट शोभा और माधुर्यकी सृष्टि हुई है । इसके अति- रिक्त यहाँ एक 'करोति' क्रियापद दो कर्मोंका एक साथ दीपन करके दो वाक्योंको दीप्त कर रहा है । अतः दीपक अलङ्कार भी है ॥ २१ ॥ १८. (२. ख ३.) प्रथम-चतुर्थपादादिगत व्यपेत सुकर द्विपाद यमक— २२वें श्लोकमें आचार्यने वर्षाकालमे मयूरियोंके अनुनृत्य (किसीके अनुकरणमें किये जा रहे नृत्य) का वर्णन किया है । पुरवैया हवाओंके द्वारा मेघमालाको इधरसे उधर करनेको कविने लाक्षणिक 'नर्तिता'से व्यक्त किया है । 'आली' शब्द भी 'माला', 'पङ्क्ति'के अतिरिक्त 'सखी'का भाव भी देता है । 'वात- नर्तिता'से प्रियतमके सङ्गसुखके कारण झूमती कलापिनी सखीस्वरूपा मेघाली को नाचती देखकर उसके अनुकरणमें नाच उठती है । कर्मवाच्यके प्रयोगसे मेघालीके ऋतुप्रवृत्त नर्तनकी मुख्यता व्यक्त होती है । बरखा बहारमें सुखविभोर होकर अनुनृत्य करती मयूरीके स्वाभाविक वर्णनसे स्वभावोक्ति तो है ही, प्रियसङ्गमें सुखवर्षाका अनुभव करती रमणीका भाव भी व्यक्त होता है । यहाँ भी अनुप्रास तो माधुर्यकारक है ही, द्वितीयपादके आदिमें स्थित वर्णसमुदायकी चौथे पादके आदिमें व्यावृत्तिसे निष्पन्न व्यपेत सुकर यमक इस माधुर्यकी पुष्टि कर रहा है ।