काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें·१२·] १. २. व्यपेत पादादि ख. द्विपाद यमक ३१ १६. मधुरेणदृशां मानं मधुरेण सुगन्धिना । सहकारोद्गमेनैव शब्दशेषं करिष्यति ॥ २० ॥ १६. मधु (वसन्त) मृगनयनियोंके (प्रियके प्रति) मान (रूठने) को मधुर, सुगन्धित आम्रकी बोरसे ही कथाशेष (समाप्त) कर देगा ॥ २० ॥ एकोन (तीन) भेद दिये हैं। (ख) चतुष्पाद्यमकके (१) चारों पादोंमें सजातीय वर्णसंघातकी आवृत्तिसे एक तथा (२) विभिन्न पदोंमें विविधतासे आवृत्तिसे तीन, इस प्रकार चार भेद दिये हैं। इस प्रकार आचार्यने यमककी रचनाकी यह भी एक दिशा अध्येताओंके सामने प्रस्तुत की है। यह प्रकार अन्य भेदोंपर भी लागू हो सकता है ॥ १६ ॥ १६. (२. ख. १.) व्यपेत प्रथम-द्वितीयपादादि सुकर द्विपाद यमक— दण्डीने (२. क) एकपादादि व्यपेत यमकके उदाहरण अत्यन्त सुगम तथा अन्य भेदोंके प्रदर्शनसे गतार्थ हो जानेसे नहीं दिये हैं। २०-२५ श्लोकोंमें (ख) द्विपाद यमकके व्यवधानयुक्त प्रकारके उदाहरण दिये हैं। २०वें श्लोकमें रतिभावके उद्दीपन विभाव वसन्तका वर्णन युवतियोंमें रतिका उद्दीप्त होना बताकर किया है। वसन्तको मृगलोचनाओंका मानभङ्ग करनेके लिए कामदेवके अन्य बाणोंको तैयार करनेकी आवश्यकता ही नहीं पड़ती। केवल आम्रमञ्जरीके प्रकट होते ही वह उनके मानको अतीतकी कहानी बता देगा। यहाँ 'मधुरेण' वर्णसमुदायकी आवृत्ति प्रथम और द्वितीय पादोंके आदिमें हुई है। परन्तु दोनों वर्णसमुदायोंके मध्य चार वर्णोंका व्यवधान है। अतः यहाँ व्यपेत द्विपादादियमक है। यह आवृत्ति सरल, सुखबोध्य और शोभाजनक होनेसे सुकर व्यावृत्ति है। कोमल और कुछ कठोर ध्वनियोंके मिश्रणसे सुश्लिष्ट वर्णविन्यास रतिभावके अनुकूल है। नासिक्य ध्वनियोंके विभवत विन्याससे उत्पन्न गूंज श्लोकको सुश्रव्य बनाती है। एणदृश्— 'एण' (मृग) शब्द पुँल्लिङ्ग है। किन्तु मान रमणियोंका मोहक होता है। अतः उपमेयकी अनुकूलतासे उपमेय 'एणी' है, 'एण' (पुं०) नहीं। एण्या दृशौ = एणदृशौ (षष्ठी तत्पु०)। ते इव दृशौ यस्याः, सा एण- दृक् :१ मृगीकी आँखोंके समान आँखों वाली। काव्यशास्त्रीय दृष्टिसे 'एण'से १. कुक्कुट्यादीनामण्डादिषु (वार्तिक ६।३।४२) से कुक्कुट्यादिगणान्तर्गत 'मृगी'के पर्यायभूत 'एणी'को अण्डादिके समान शेषसम्बन्धसे सम्बद्ध 'दृश्' उत्तरपद रहते पुंवद्भाव होता है। 'एणदृश् + दृश्' स्थितिमें उप- मानभूत 'दृश्'का 'सरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ' (अष्टा० २।२।६४) से लोप होनेसे 'एणदृश्' होता है।