काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३।२३] १.२ व्यपेत ख. द्विपादादि यमक ३३ १६. स्वयमेव गलन्मानकलि कामिनि ते मनः । कलिकामद्य नीपस्य दृष्ट्वा कां नु स्पृशेद् दशाम् ? ॥ २३ ॥ १६. हे चाहने वाली, अपने आप ही नष्ट होते हुए मानकलह वाला तुम्हारा मन आज कदम्बकी कलीको देखकर किस अवस्थाको स्पर्श करेगा ? (अर्थात् अब कदम्बोंमें पहली कली चटकते ही उस (मन) की क्या हालत होगी ?) ॥ २३ ॥ एक बात यहाँ कविने बहुत उचित नहीं की है : कलाप (पिच्छसमूह) मयूरका ही अधिक भारी अतएव शोभायुक्त होता है । इस लिये कलापियों (नर मोरों) का वर्णन उचित होता, जैसाकि २४वें श्लोकमें है । मोरनियों का वर्णन उतना अच्छा नहीं लगता । कलापस्योल्लसनं कलापोल्लसनम्, तेन सहिता, सकलापोल्लसना, तया सकलापोल्लसनया । सकलाश्च ता आपः, सकलापः । ताः, 'विमुञ्चति'का कर्म होनेसे द्वितीया । उत्तर पद 'अप्'के प्रधान होनेसे नित्यबहुवचनान्तता है । अनु+√नूती गात्रविक्षेपे (दिवादि० १०), कर्मणि लट्, प्रथम पु०, ए० व० । २२ ॥ १६. (२. ख. ४) द्वितीय-तृतीय-पादादिगत व्यपेत सुकर यमक—२३ वें श्लोकमें प्रियासे रूठकर बैठी सुन्दरीके प्रियप्रेमवश मानरक्षा न कर पाने पर उसकी सहेलीकी चुहल इस श्लोकमें व्यक्त की गई है । जो रमणी प्रियके अपराध पर मान करके भी अपने आप ही, बिना प्रियकी चाटुकारिता, या अपराधक्षमाप्रार्थना अथवा अन्य किसी समुचित कारणके ही प्रियके प्रति रूठी न रह सकी, उसका 'कामिनीत्व' तो स्वतः स्पष्ट है । जब बिना कारण के ही उसकी यह हालत है, तो अब जब कदम्बोंमें इक्की-दुक्की कली दिख- लाई देने लगी है, तब उसकी क्या हालत होगी ? यहाँ दन्त्य तथा नासिक्य वर्णोंकी परस्पर व्यवहित अधिकतासे अनुप्रास तो माधुर्यका हेतु है ही, द्वितीय पादके आदिमें स्थित वर्णसमुदायकी पाँच कोमल मधुर वर्णोंके व्यवधानके बाद तृतीय पादके आदिमें आवृत्तिसे द्विपाद- वर्ती व्यपेत यमक भी इस माधुर्यको प्रगुणित कर रहा है । यह यमक झटिति अर्थसमर्पक होनेसे सुकर है, और श्लोकके मुख्य भाव रतिके पूर्णतया अनुकूल है ॥ २३ ॥