भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 57

३४ काव्यदर्श [३।२४-२५ २०. आरुह्याक्रीडशैलस्य चन्द्रकान्तस्थलीमिमाम् । नृत्येत्येष चलच्चारुचन्द्रकान्तशिखावलः ॥ २४ ॥ २१. उद्धृता राजकादुव्री ध्रियतेऽद्य भुजेन ते । वराहेणोद्धृता१ याऽसौ वराहेरुपार स्थिता ॥ २५ ॥ २०. हिलते हुए सुन्दर चन्दों (पिच्छों) के अन्त भाग वाला यह मयूर क्रीडापर्वतकी इस चन्द्रकान्त मणियोंसे बनी स्थलीपर चढ़कर नाच रहा है ॥ २४ ॥ २१. जिस पृथ्वीका उद्धार वराहने किया था, (जो) श्रेष्ठ नाग (शेष) के ऊपर स्थित थी, आज राजाओंके समूहसे उद्धार की हुई वह पृथ्वी तुम्हारे बाहुके द्वारा धारण की जा रही है ॥ २५ ॥ २०. (२. ख. ५.) द्वितीय-चतुर्थपादादि व्यपेत सुकर यमक—इस श्लोक में चाँदनी रातमें महलके प्रमद वनमें क्रीडाशैलकी जल चुवाती चन्द्रकान्त- मणिनिर्मित अकृत्रिम२ उपत्यकामें उसे बारिस करता मेघ समझकर हर्षविभोर मयूरके नाचनेका वर्णन किया गया है। स्वभावोक्ति अलङ्कार है। मयूर द्रव्यका वर्णन चारुत्वपूर्वक करनेसे यहाँ द्रव्यस्वभावोक्ति है। क्रीडाशैलस्थलीके चन्द्रकान्तमणिनिर्मितताके वर्णनसे ऋद्धिवर्णननिमित्तक (दण्डीका प्रथम और उद्भटका द्वितीय) उदात्त भी यहाँ है। वर्णविन्यास कण्ठ्य, तालव्य एवं दन्त्य वर्णबहुल तथा सुश्लिष्ट है। ह्रस्व, दीर्घ वर्णोंका क्रम भी चुस्ती वाला है। न व्यञ्जनगत शैथिल्य है, न स्वरगत । बीच-बीचमें महाप्राण वर्णोंसे युक्त कोमल अल्पप्राण वर्णोंके प्रयोगसे काव्य सुश्राव्य है। द्वितीय और चतुर्थ पादोंमें समान वर्णसमुदायकी सुकर उपस्थितिसे जनित यमक इस श्लोकको भरपूर माधुर्य प्रदान कर रहा है ॥ २४ ॥ २१. (२. ख. ६.) तृतीय-चतुर्थ-पादादिगत व्यपेत सुकर द्विपाद यमक— प्रकृत (२५वें) श्लोकमें कविने किसी राजाके शौर्यके वर्णनसे उत्साह स्थायी १. तुलना करें अवन्तिसुन्दरी, पृष्ठ ४३, पंक्ति १६ : न खल्वमहावराहो महीं समुद्धरति···। २०५, पंक्ति १५ : निर्गच्छतु वनादयं महावराह इवोद्धरन्धरामवधूताहिमकरमाधा पुरुषोतंस्तमेतम् । 'मकर'के बादके पाठका कोई अर्थ नहीं निकलता है । 'मकरबाधः पुरुषोत्तमः' या 'मकरमादिपुरुषोत्तमः । तमेतम्···' पाठ कदाचित् उचित है । २. मयूरको मणिनिर्मित स्थलकी प्रतीति वास्तविक स्थलके रूपमें हो रही है । अतः 'मणिनिर्मित' और 'अकृत्रिम' कहनेमें विरोध नहीं है ।