भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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३।२५] १.२ व्यपेत ख. द्विपादादि यमक ३५ व्यक्त किया है । इसमें वर्ण्य राजाका सादृश्य वराहावतार विष्णुसे और शत्रु राजाका शेष नागसे व्यक्त किया गया है । तृतीय पादके आदिमें प्रयुक्त वर्णसमुदाय 'वराहे' पाँच अक्षरोंके व्यवधानके बाद चतुर्थ पादके आदिमें आवृत्त है । अतः व्यपेत द्विपादादियमक है । यह यमक शब्द या अर्थ किसी भी दृष्टिसे क्लिष्ट नहीं है । झटिति अर्थसमर्पक है । अतः सुकर है । प्रथम पादमें उद्धारका अपादान 'राजकात्' दिया है । यदि तृतीय पाद में भी 'याऽब्धेः' करके अपादान दे देते, तो राजा और वराहका सादृश्य और अच्छी तरह प्रकट होता । इसके अतिरिक्त, 'वराहने तो पृथ्वीका उद्धार जड जलराशिसे किया था, राजाकी भुजाने चेतन राजसमूहसे किया', इस प्रकारकी अर्थच्छटा प्रकट होनेसे राजाका वराहसे व्यतिरेक व्यक्त होता । 'असौ'से कोई विशेष आशय नहीं व्यक्त होता । राजकम् — 'राज्ञां समूहः' अर्थमें 'राजन् + आम्' प्रकृतिसे वुञ् प्रत्ययसे यह शब्द निष्पन्न होता है ।१ कुछ ऐतिहासिकोंके मतमें प्रकृत श्लोकमें दण्डीने विदिशा (आधुनिक भिलसा, म०प्र०) के निकट उदयगिरिके गुहामन्दिरोंके बाहर स्थित ४०० ई० में चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य द्वारा निर्मापित वराहमूर्तिका वर्णन किया है । इस मूर्तिमें नीचे शेषनागका भी आकार बना है और नारीरूप पृथ्वी वराह की दंष्ट्रापर स्थित है । इस प्रकार नागको कुचलकर पृथ्वीका उद्धार करने वाले वराहका वर्णन दण्डीने पहले भी किया है : हरिणोद्धृता । भूः खुरक्षुण्ण- नागासृग्लोहितादुदधेरिति (१।७३) ।। मही महावराहेण लोहितादुद्धृतोदधेः (७४) । डॉ जयशंकर त्रिपाठीने 'नाग'से 'शेष'को न जाने क्यों नहीं समझा ? अन्यथा वे प्रकृत और १।७३के वर्णनों में वर्ण्यविषयके स्वरूपमें अन्तर न बताते !२ उक्त नारीमूर्तिके निर्माणमें चन्द्रगुप्तका आशय अपने भाई रामगुप्तकी पत्नी ध्रुवस्वामिनीका रामगुप्तसे या शकाधिपतिसे उद्धार करनेकी ओर सङ्केत करना था, यह कुछ ऐतिहासिकोंकी उद्भावना है । प्रकृत श्लोकसे १. अष्टा० ४।२।३६ : गोत्रोक्षोष्ट्रोरभ्र-राज-राजन्य-राजपुत्र-वत्स-मनुष्याजाद् वुञ् । अमरकोष २।८।३-४ : अथ राजकम् ॥ राजन्यकं च नृपतिकक्षत्रि- याणां गणे क्रमात् । २. डॉ० जयशंकर त्रिपाठी, दण्डी एवं संस्कृत काव्यशास्त्रका इतिहासदर्शन, पृष्ठ ४०६ । प्रसादिनी १।७४, पृष्ठ १३६, पादटिप्पणी १ भी देखें ।