काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
३४ काव्यदर्श [३।२४-२५ २०. आरुह्याक्रीडशैलस्य चन्द्रकान्तस्थलीमिमाम् । नृत्येत्येष चलच्चारुचन्द्रकान्तशिखावलः ॥ २४ ॥ २१. उद्धृता राजकादुव्री ध्रियतेऽद्य भुजेन ते । वराहेणोद्धृता१ याऽसौ वराहेरुपार स्थिता ॥ २५ ॥ २०. हिलते हुए सुन्दर चन्दों (पिच्छों) के अन्त भाग वाला यह मयूर क्रीडापर्वतकी इस चन्द्रकान्त मणियोंसे बनी स्थलीपर चढ़कर नाच रहा है ॥ २४ ॥ २१. जिस पृथ्वीका उद्धार वराहने किया था, (जो) श्रेष्ठ नाग (शेष) के ऊपर स्थित थी, आज राजाओंके समूहसे उद्धार की हुई वह पृथ्वी तुम्हारे बाहुके द्वारा धारण की जा रही है ॥ २५ ॥ २०. (२. ख. ५.) द्वितीय-चतुर्थपादादि व्यपेत सुकर यमक—इस श्लोक में चाँदनी रातमें महलके प्रमद वनमें क्रीडाशैलकी जल चुवाती चन्द्रकान्त- मणिनिर्मित अकृत्रिम२ उपत्यकामें उसे बारिस करता मेघ समझकर हर्षविभोर मयूरके नाचनेका वर्णन किया गया है। स्वभावोक्ति अलङ्कार है। मयूर द्रव्यका वर्णन चारुत्वपूर्वक करनेसे यहाँ द्रव्यस्वभावोक्ति है। क्रीडाशैलस्थलीके चन्द्रकान्तमणिनिर्मितताके वर्णनसे ऋद्धिवर्णननिमित्तक (दण्डीका प्रथम और उद्भटका द्वितीय) उदात्त भी यहाँ है। वर्णविन्यास कण्ठ्य, तालव्य एवं दन्त्य वर्णबहुल तथा सुश्लिष्ट है। ह्रस्व, दीर्घ वर्णोंका क्रम भी चुस्ती वाला है। न व्यञ्जनगत शैथिल्य है, न स्वरगत । बीच-बीचमें महाप्राण वर्णोंसे युक्त कोमल अल्पप्राण वर्णोंके प्रयोगसे काव्य सुश्राव्य है। द्वितीय और चतुर्थ पादोंमें समान वर्णसमुदायकी सुकर उपस्थितिसे जनित यमक इस श्लोकको भरपूर माधुर्य प्रदान कर रहा है ॥ २४ ॥ २१. (२. ख. ६.) तृतीय-चतुर्थ-पादादिगत व्यपेत सुकर द्विपाद यमक— प्रकृत (२५वें) श्लोकमें कविने किसी राजाके शौर्यके वर्णनसे उत्साह स्थायी १. तुलना करें अवन्तिसुन्दरी, पृष्ठ ४३, पंक्ति १६ : न खल्वमहावराहो महीं समुद्धरति···। २०५, पंक्ति १५ : निर्गच्छतु वनादयं महावराह इवोद्धरन्धरामवधूताहिमकरमाधा पुरुषोतंस्तमेतम् । 'मकर'के बादके पाठका कोई अर्थ नहीं निकलता है । 'मकरबाधः पुरुषोत्तमः' या 'मकरमादिपुरुषोत्तमः । तमेतम्···' पाठ कदाचित् उचित है । २. मयूरको मणिनिर्मित स्थलकी प्रतीति वास्तविक स्थलके रूपमें हो रही है । अतः 'मणिनिर्मित' और 'अकृत्रिम' कहनेमें विरोध नहीं है ।
३।२५] १.२ व्यपेत ख. द्विपादादि यमक ३५ व्यक्त किया है । इसमें वर्ण्य राजाका सादृश्य वराहावतार विष्णुसे और शत्रु राजाका शेष नागसे व्यक्त किया गया है । तृतीय पादके आदिमें प्रयुक्त वर्णसमुदाय 'वराहे' पाँच अक्षरोंके व्यवधानके बाद चतुर्थ पादके आदिमें आवृत्त है । अतः व्यपेत द्विपादादियमक है । यह यमक शब्द या अर्थ किसी भी दृष्टिसे क्लिष्ट नहीं है । झटिति अर्थसमर्पक है । अतः सुकर है । प्रथम पादमें उद्धारका अपादान 'राजकात्' दिया है । यदि तृतीय पाद में भी 'याऽब्धेः' करके अपादान दे देते, तो राजा और वराहका सादृश्य और अच्छी तरह प्रकट होता । इसके अतिरिक्त, 'वराहने तो पृथ्वीका उद्धार जड जलराशिसे किया था, राजाकी भुजाने चेतन राजसमूहसे किया', इस प्रकारकी अर्थच्छटा प्रकट होनेसे राजाका वराहसे व्यतिरेक व्यक्त होता । 'असौ'से कोई विशेष आशय नहीं व्यक्त होता । राजकम् — 'राज्ञां समूहः' अर्थमें 'राजन् + आम्' प्रकृतिसे वुञ् प्रत्ययसे यह शब्द निष्पन्न होता है ।१ कुछ ऐतिहासिकोंके मतमें प्रकृत श्लोकमें दण्डीने विदिशा (आधुनिक भिलसा, म०प्र०) के निकट उदयगिरिके गुहामन्दिरोंके बाहर स्थित ४०० ई० में चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य द्वारा निर्मापित वराहमूर्तिका वर्णन किया है । इस मूर्तिमें नीचे शेषनागका भी आकार बना है और नारीरूप पृथ्वी वराह की दंष्ट्रापर स्थित है । इस प्रकार नागको कुचलकर पृथ्वीका उद्धार करने वाले वराहका वर्णन दण्डीने पहले भी किया है : हरिणोद्धृता । भूः खुरक्षुण्ण- नागासृग्लोहितादुदधेरिति (१।७३) ।। मही महावराहेण लोहितादुद्धृतोदधेः (७४) । डॉ जयशंकर त्रिपाठीने 'नाग'से 'शेष'को न जाने क्यों नहीं समझा ? अन्यथा वे प्रकृत और १।७३के वर्णनों में वर्ण्यविषयके स्वरूपमें अन्तर न बताते !२ उक्त नारीमूर्तिके निर्माणमें चन्द्रगुप्तका आशय अपने भाई रामगुप्तकी पत्नी ध्रुवस्वामिनीका रामगुप्तसे या शकाधिपतिसे उद्धार करनेकी ओर सङ्केत करना था, यह कुछ ऐतिहासिकोंकी उद्भावना है । प्रकृत श्लोकसे १. अष्टा० ४।२।३६ : गोत्रोक्षोष्ट्रोरभ्र-राज-राजन्य-राजपुत्र-वत्स-मनुष्याजाद् वुञ् । अमरकोष २।८।३-४ : अथ राजकम् ॥ राजन्यकं च नृपतिकक्षत्रि- याणां गणे क्रमात् । २. डॉ० जयशंकर त्रिपाठी, दण्डी एवं संस्कृत काव्यशास्त्रका इतिहासदर्शन, पृष्ठ ४०६ । प्रसादिनी १।७४, पृष्ठ १३६, पादटिप्पणी १ भी देखें ।
३६ काव्यादर्श [३।२६ २२. करेण ते रणेध्वन्तकरेण द्विषतां हताः । करेणवः क्षरद्रक्ता भान्ति सान्ध्यघना इव ॥ २६ ॥ २२. युद्धोंमें शत्रुओंका अन्त करने वाले तुम्हारे हाथसे हत, खून झराते हाथी सन्ध्या कालके मेघोंके समान प्रतीत होते हैं ॥ २६ ॥ भी यह आशय व्यक्त होता है : 'राजकात्' में 'राजन् + क' (कुत्सा अर्थमें 'क' प्रत्यय) से कापुरुष राजा रामगुप्त या कामुक होनेसे निन्दित शकाधि- पति अभिप्रेत हो सकता है । 'उर्वी' ध्रुवस्वामिनीको व्यक्त करता है । 'ध्रुवा', 'अचला', 'उर्वी' पर्याय हैं । 'वराहि' से महावराहसमान चन्द्रगुप्तके द्वारा कुचले हुए रामगुप्त या शकाधिपति अभिप्रेत प्रतीत होते हैं । इस प्रकार यहाँ कवि द्वारा शकारानि चन्द्रगुप्त विक्रमादित्यकी प्रशंसा की गई है । डॉ० कृष्णकुमारका यह कथन उचित नहीं प्रतीत होता कि यहाँ 'वराह' चालुक्य वंशके राजचिह्नकी ओर सङ्केत करता है ।२ दण्डी काञ्चीके पल्लव राजाओंके आश्रित थे, यह सुविदित है । यह डॉ० कृष्णकुमार भी मानते हैं । चालुक्योंका पल्लवोंसे पीढ़ियोंसे वैर था । चालुक्यों द्वारा काञ्चीपर घेरा डालनेके कारण दण्डीको अध्ययनकालमें दर-दर भटकना पड़ा था (प्रथम परिच्छेदकी भूमिका देखें) । ऐसी स्थितिमें वे शत्रु राजाकी प्रसंशामें कसीदे कहें, यह सम्भावित नहीं है ॥ २५ ॥ २२. (२. ग. १.) प्रथम-द्वितीय-तृतीयपादादिगत व्यपेत सुकर त्रिपादादि- यमक - व्यपेत त्रिपादयमकके इस प्रथम उदाहरणमें आचार्य कवि दण्डीने किसी राजाका शौर्य युद्धमें उसके द्वारा मारे गए हाथियोंके३ वर्णनसे बताया है । हाथियों (उपमेय) की समानता सान्ध्य घनोंसे बताई है । सादृश्यका निमित्त उपमेयमेँ तो 'क्षरद्रक्ताः' विशेषणसे दिया है, उपमान घनोंमें वह 'सान्ध्य' विशेषणसे गम्य है । कठोर महाप्राण वर्णोंकी बहुलता तथा बीच- बीचमें कोमल अल्पप्राण वर्णोंसे युक्त रचना उत्साह भावके अनुकूल है । 'करेण' वर्णसमुदायकी आवृत्ति पहले तीन पादोंके आदिमें वर्णान्तरके व्यव- १. अष्टाध्यायी ५।३।७० : प्रागिवात् कः । ७४ : कुत्सिते । २. अलङ्कारशास्त्रका इतिहास, पृष्ठ १०२ । ३. 'करेणुरिभ्यां स्त्री, नेभे ।' (अमरकोष ३।३।५२) तथा 'करेणुर्गजयोषायॉ स्त्रियां, पुंसि मतङ्गजे ।' (मेदिनीकोष १५।४१) के अनुसार 'करेणु' शब्द उभयलिङ्ग है । यहाँ उपमान घनोंके पुंस्त्वके कारण पुंल्लिङ्ग ('हाथी' अर्थ) में अभीष्ट मानना उचित है ।
३२७ ] १.२ व्यपेत ग. त्रिपादादि यमक ३७ २३. परागतरूराजीव वातैर्ध्वस्ता भटैश्चमूः । परागतमिव क्वापि परागततमम्बरम् ॥ २७ ॥ २३. तूफानोंके द्वारा पर्वतके वृक्षोंके समूहके समान सैनिकोंके द्वारा शत्रु- सेना ध्वस्त कर दी गई। धूलसे व्याप्त आकाश मानों कहीं दूर चला गया था ॥ २७ ॥ धानमें होनेसे यहाँ व्यपेत त्रिपादादियमक है। सुखपूर्वक अर्थावबोध तथा सुश्रव्यताके कारण यह सुकर है। आचार्यने प्रथम-द्वितीय-चतुर्थपादादि भेदका उदाहरण नहीं दिया है। इसे अन्य भेदोंसे उपलक्षित समझें ॥ २६ ॥ २३. (२. ग. २) प्रथम-तृतीय-चतुर्थपादादिगत व्यपेत सुकर त्रिपादादि- यमक—सत्ताईसवें श्लोकमें आचार्य दण्डीने सम्भवतः पिछले श्लोकमें प्रकृत राजाके शौर्यका वर्णन उसकी सेनाके द्वारा घमासान लड़ाई करके शत्रुसेनाको ध्वस्त करनेका प्रतिपादन करके किया है। पूर्वार्धमें राजाकी सेनाके द्वारा परा चमू (शत्रुसेना) के ध्वंसकी उपमा प्रथम पादमें अन्धड़के द्वारा अग (पर्वत) पर स्थित, अथवा अग = अडिग मजबूत, तरुओंके ध्वंससे दी है। भट एवं वातमें, परा चमू, और अग-तरु-राजीमें उपमेयोपमान सम्बन्ध है। ‘इव’ वाचक है। ‘ध्वस्ता’ साधारण धर्म है। उत्तरार्धमें धूल द्वारा अम्बरको ढँक लिये जानेकी सम्भावना अम्बरके कहीं भाग जानेमें की है। इससे ‘शत्रुसेनाका अधिष्ठान, परमाश्रय विजिगीषितव्य राजा कहीं जा छुपा है’, यह आशय भी व्यक्त होता है। इस प्रकार उत्तरार्धमें वस्तुकी व्यञ्जना करने वाली उत्प्रेक्षा है। दोनों समकक्ष हैं, इस लिये इनकी द्वितीय संसृष्टि है। इस अर्थच्छायासे संवलित उत्साह भावकी शोभा शब्दगत सुकर यमकसे भी हो रही है। प्रथम पादके आरम्भमें प्रयुक्त ‘पर्गत’ वर्णसमुदायकी आवृत्ति बहुत-से वर्णोंके बाद तृतीय पादके आरम्भमें और फिर चार वर्णोंके व्यवधानके बाद चतुर्थ पादके आरम्भमें की गई है। चतुर्थपादगत ‘पराग’ शब्द यद्यपि प्रसिद्ध तो ‘पुष्परजस्’में है, तथापि १. अन्वय :—वातैः अग-तरु-राजी इव परा चमूः भटैः ध्वस्ता । पराग- ततम् अम्बरम् क्वापि परा-गतम् इव ॥
३८ काव्यादर्श [३।२८ २४. पातु वो भगवान् विष्णुः सदा नवघनद्युतिः । स दानवकुलध्वंसी सदान-वर-दन्ति-हा ॥ २८ ॥ २४. नवीन मेघके समान कान्ति (श्याम वर्ण) वाले, दानवोंके खानदानों को नष्ट करने वाले, मदजलसहित श्रेष्ठ हस्तीको मारने वाले वे (जगत्- प्रसिद्ध) षड्विध ऐश्वर्यसे सम्पन्न² विष्णु तुम्हारी रक्षा सदा करें ॥ २८ ॥ इसका प्रयोग ‘रजस्’, ‘धूलि’के लिये भी शास्त्रसम्मत है ।¹ यहाँ तीनों ‘परागत’में से कोई भी सार्थक शब्द या पद नहीं है । द्वितीय ‘परागत’ भी ‘परागतम्’ पदका एकदेश (अवयव) ही है; सम्पूर्ण अवयवी नहीं । अतः ‘अर्थभिन्न वर्णों, शब्दों या पदोंकी आवृत्ति’ वाला लक्षण इस प्रकारके उदाहरणोंपर ‘अर्थे सति’ परिष्कार होने तक लागू नहीं होता था । जबकि दण्डीका ‘वर्णसंहतिकी आवृत्ति’ वाला लक्षण सदा सर्वत्र अबाधित है ॥ २७ ॥ २४. (२. ग. ३.) द्वि-तृतीय-चतुर्थ व्यपेत त्रिपादादि सुकर यमक—इस उदाहरणमें भगवान् विष्णुके प्रति कविकी रति उनसे श्रोताओंकी रक्षाकी आसीसके साथ व्यक्त की गई है । इन दोनोंमें आशीः (दण्डी २।३५५के मतमें एतन्नामक अलङ्कार) ‘पातु’-शब्दोक्त होनेसे मुख्य है । रति इसकी सिद्धिका अङ्ग बन गई है । यहाँ चार अक्षरोंके समुदाय (सदानव) की आवृत्ति दूसरे, तीसरे और चौथे पादोंके आदिमें चार-चार अक्षरोंके व्यवधान से हुई है । किन्तु अर्थावबोधमें तनिक भी क्लेश नहीं होता । अतः यहाँ त्रिपादादि व्यपेत यमक और सुकर है । ‘स-दान-वर दन्ती’से ‘कुवलयापीड’ नामक गज अभिप्रेत है, जिसे विष्णुने कृष्णावतारमें कंसवधसे पहले यमधाम पठाया था ।³ विधेय क्रियापद ‘पातु’का सबसे पहले प्रयोग आशीःपर बल देने को किया है ॥ २८ ॥ १. अमरकोष २।४।१७ : परागः सुमनोरजः । ३।३।२१ : परागः कौसुमे रेणौ, स्नानीयादौ, रजस्यपि । २. ऐश्वर्यस्य समग्रस्य, वीर्यस्य, यशसः, श्रियः । ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां ‘भग’ इतीङ्गना ॥ ३. हरिवंशपुराण, विष्णुपर्व २६।२४-३८ : सार्त्तनादं महत् कृत्वा विदन्तो दन्तिनां वरः । पपात स महामात्रो वज्रभिन्न इवाचलः ॥ ३८
३।२६] १.२ व्यपेत ग. त्रिपाद आदियमक ३६ २५. कमलेस्समकेशं ते, कमलेर्ष्याकरं मुखम् । कमलेख्यं करोषि त्वं कमलेवोन्मदिष्णुषु¹ ।। २६ ।। २५. तुम्हारा सिर² भौरोंके समान (काले) केशों वाला है; मुख कमल से ईर्ष्या करने वाला है। तू कमला (लक्ष्मी) के समान है। किसे तुम उन्मादशील लोगोंमें नहीं लिखे जाने योग्य करती हो ? अर्थात् तुम्हें देखकर कौन न बौरा जाये ? ।। २६ ।। २५. (२. घ १) एक-जातीय सर्वपादादि व्यपेत सुकर यमक—प्रकृत श्लोकमें आचार्यने किसीके द्वारा उसके सामने स्थित किसी सुन्दरीके सौन्दर्य की प्रशंसा कराई है। प्रथम पादमें अलि उपमान है, केश उपमेय एवं सम वाचक है। साधारण धर्म कृष्णता गम्य है। इस प्रकार उपमा है। द्वितीय पादमें मुखको कमलोंमें भी ईर्ष्या उत्पन्न करने वाला कहकर मुखकी कमलसे समता (उपमा) कही है। √ ईर्ष्य् को २।६२में उपमावाचकोंमें दिया है। अतः दण्डीके अनुसार मुखको कमलोंसे भी सुन्दर बतानेसे व्यतिरेक नहीं है। 'कमलेव' में भी धर्मलुप्ता उपमा है। ये उपमायें समकक्ष हैं। अतः द्वितीय संसृष्टि है। प्रथम पादके आदिमें प्रयुक्त 'कमले' वर्णसमुदाय पाँच- पाँच अक्षरोंके व्यवधानसे अगले तीन पादोंके आदिमें आवृत्त है। एक ही वर्णसमुदायकी व्यवधानसे आवृत्तिके कारण यह एकजातीय चतुष्पादादि व्यपेत सुकर यमक है । उत्तरार्धका यह अर्थ टीकाओंके अनुकरणमें किया है। पाणिनिका अनु- शासन यदि तनिक ढीला किया जा सके,³ तो यह व्याख्या प्रस्तुत है : कमला (समुद्रसे उत्पन्न लक्ष्मी) ने जैसे उसके रूपको देखकर मस्त होने वाले सुरा- सुरोंमें लेखों (देवों⁴) के हितकारी (विष्णु) से इतर कर दिया था, वैसे १. अन्वय :—ते कम् अलेः समकेशम्; मुखं कमलेर्ष्याकरम् । त्वं कमला इव । उन्मदिष्णुषु कम् अलेख्यं करोषि ? २. अमरकोष ३।३।५ : मारुते, वेधसि, ब्रध्ने कः; कं शिरोऽम्बुनोः । ३. लेखेभ्यो हितो लेख्यः 'तस्मै हितम्' (अष्टा० ५।१।५) अर्थमें गवादि- गणान्तर्गत न होते हुए भी 'उ-गवादिभ्यो यत्' (अष्टा० ५।१।२) से 'यत्' यदि किया जा सके । अन्यथा 'प्राक् क्रीताच्छः' (५।१।१) से 'लेखीय' रूप पाणिनिके अनुसार शुद्ध है । ४. अमरकोष १।१।८ : आदितेया, दिविषदो, लेखा, अदितिनन्दनाः ।
४० काव्यदर्श [३।३० २६. मुदा रमणमन्वितमुदारमणिभूषणाः । मदभ्रमद्दृशः कर्तुमदभ्रजघनाः क्षमाः¹ ॥ ३० ॥ २६. (क) बड़ी-बड़ी मणियोंके गहनों वाली, (ख) मदके कारण चञ्चल दृष्टि वाली, (ग) कटिके विशाल पुरोभागवाली, स्त्रियाँ२ (अपने) प्रियतमको प्रमोदसे युक्त करनेमें समर्थ होती हैं ॥ ३० ॥ किसे तुम्हारे रूपको देखकर मस्त होने वाले लोगोंमें लिखे जानेके अयोग्य कर रही हो ? अर्थात् किस एकको अपना कर उसे उन्मदिष्णुओमें अलेख्य बना रही हो ? इस व्याख्यामें 'अलेख्यम्'में श्लेष है : (क) लेखा देवाः । तेभ्यो हितो लेख्यो विष्णुः । न लेख्यः अलेख्यः लेख्याद् भिन्नः । (ख) लेखितुं योग्यो गणनायोग्य इति यावत् । न लेख्यः अलेख्यः, गणनाया अयोग्यः । अलेः समकेशम्—समाः तुल्याः केशा यस्य, तत् समकेशम् (बहुव्रीहि) । यहाँ 'अलि' का सम्बन्ध समुदाय 'समकेश'से सीधे न होकर समुदायके अवयव 'सम'के द्वारा होनेके कारण३ 'अलि' शब्दमें 'सम'के योगमें षष्ठी हुई है४ ॥ २६ ॥ २६. (२. घ. २.) व्यपेत, सुकर, अर्धसम, चतुष्पादादि यमक—आचार्य दण्डीने ३० वें श्लोकमें स्त्रियोंके आहार्य और स्वाभाविक सौन्दर्यका वर्णन किया है । आचार्यका क्रम अर्थपूर्ण है : (क) पहले स्त्रियोंकी समृद्धि बताते हुए उनके बेशकीमती रत्नों वाले गहनोंसे आहार्य सौन्दर्यको बताया है; फिर (ख) यौवनमदमाती चञ्चल अँखियोंका वर्णन किया है; आहार्य रूपके बाद स्वाभाविक रूपके लिये चेहरेपर नज़र पड़ना स्वाभाविक है; (ग) फिर रमणोंके लिये आकर्षणके केन्द्र कटितटका वर्णन किया है; वहाँ तक पहुँचनेके १. अन्वय :—(क) उदारमणिभूषणाः, (ख) मद-भ्रमद्-दृशः, (ग) अदभ्रजघनाः रमणं मुदा अन्वितं कर्तुं क्षमाः । २. जघनं स्यात् स्त्रियाः श्रोणिपुरोभागे, कटावपि । मेदिनीकोष पश्चान्नितम्बः स्त्रीकट्याः, क्लीबे तु जघनं पुरः ॥ अमरकोष २।६।७४ ३. महाभाष्य २।१।१ : समासेऽप्युपसर्जनविशेषणं भवति । तद् यथा— देवदत्तस्य गुरुकुलम्; देवदत्तस्य गुरुपुत्रः; देवदत्तस्य दासभार्येति । वाक्य- पदीय ३।१४।४८ तथा इसपर हेलाराजकी टीका भी देखें : समुदायेन सम्बन्धो येषां गुरुकुलादिना । संस्पृश्यावयवांस्ते च युज्यन्ते तद्वता सह ॥ ४. अष्टाध्यायी २।३।७२ : तुल्यार्थैरतुलोपमाभ्यां तृतीयाऽन्यतरस्याम् ।
३।३१] १.२ व्यपेत घ. चतुष्पाद आदि यमक ४१ २७. उदितैरन्यपुष्टानामारुतैर् मे हृतं मनः । उदितैरपि ते दूति, मारुतैरपि दक्षिणैः ।। ३१ ।। २७. हे दूति, मेरा मन (क) कोयलोंकी उठी तानोंने और (ख) तुम्हारी बातोंने तथा (ग) दक्षिणी बयारोंने हर लिया है ।। ३१ । बाद भला रमण प्रसन्न क्यों न होगा ? 'रमण' का प्रयोग भी अवसरके अनु- कूल किया है । श्लोकके पूर्वार्धके दोनों चरणोंके आदिमें 'सुदारम' चार वर्णोंके समुदाय की और उत्तरार्धके दोनों चरणोंके आदिमें 'मद्रभ्र' (तीन वर्णोंके समुदाय) की व्यवहित आवृत्ति की गई है । इस प्रकार यहाँ यमक चारों पादोंमें है । तथापि पूर्वार्धमें अन्य वर्णसमुदायकी और उत्तरार्धमें अन्य वर्णसमुदायकी आवृत्ति होनेसे यहाँ अर्धसम चतुष्पाद व्यपेत यमक है । ये सब आवृत्ति सुकर हैं । उच्चारण और अवबोध, दोनों स्तरोंपर किसी प्रकारकी क्लिष्टता इनमें नहीं है । अतः कोमल रसोंकी अभिव्यक्तिमें भी साधक है, बाधक नहीं । अन्वीतम्—अनु + √ ई + क्त (भावे) । यह √ ई कुछ आचार्योंके मतमें इट किट कटी गतौ (भ्वा० ६।२६-३१) में प्रश्लिष्ट है ।¹ सेट् अजन्त धातुओंमें अपठित होनेसे यह अनिट् है² ।। ३० ।। २७ (२. घ. ३.) व्यपेत सुकर चतुष्पादादि यमकका एक अन्य (विषम) प्रकार—इस श्लोकमें रतिके उद्दीपन विभावोंका वर्णन किया गया है । (क) वसन्तमें आमोंमें बौर आते ही कोयलोंने मीठी तान छेड़ी ही थी कि मनमें प्रेम अँगड़ाई लेने लगा । (ख) तभी सौभाग्यसे प्रियाका सन्देश लेकर दूती आ गई । उसकी मीठी बातोंसे मन मुग्ध हो ही रहा था कि (ग) तभी दक्षिणी बयार बहने लगी । तब मन कहाँ काबूमें रहने वाला था ! इस प्रकार रतिकी एकके बाद एक उद्दीपन वस्तुओंको इस श्लोकमें प्रस्तुत किया गया है । इसके अतिरिक्त एक नामीभूत क्रियापद 'हृतं' का सम्बन्ध १. सिद्धान्तकौमुदी, भ्वादि : इट, किट, कटी गतौ । केचित्तु... अन्ते च 'इ-ई' इति प्रश्लिष्य 'अयति...अयांचकार' इत्याद्युदाहरन्ति । विशेषार्थ हमारी भवतोषिणी, पृष्ठ ३३४-३३६ देखें । २. ऊदृदन्तैर्यौति-रु-क्ष्णु-शीङ्-स्नु-नु-क्षु-श्वि-डीङ्-श्रिभिः । वृङ्-वृञ्भ्यां च विनैकाचोऽजन्तेषु निहताः स्मृताः ।। भ्वादि, पृष्ठ २०३
४२ काव्यादर्श [३।३२ २८. सुरा-जित-ह्रियो यूनां तनुमध्यासते स्त्रियः । तनु-मध्याः क्षरत्स्वेद-सु-राजित-मुखेन्दवः ॥ ३२ ॥ २८. मदिरा द्वारा जीत ली गई लज्जा वाली, पतली कमर वाली, चूते हुए पसीनेसे सुशोभित मुखचन्द्रवाली स्त्रियाँ युवाओंके शरीरपर विराजमान हैं ।। ३२ ।। तीन कर्ताओं 'आहतैः', 'उदितैः' और 'मारुतै'से बतानेसे क्रियादीपक अर्था- लङ्कार है । यहाँ सार्थक (समानार्थक) 'उदितैः' वर्णसमुदाय प्रथम और तृतीय पादोंमें प्रदत्त है । दोनोंके बीचमें बहुतसे स्वर-व्यञ्जन वर्णोंका व्यवधान है । इसी प्रकार निरर्थक 'मारुतैः' द्वितीय पादके आदिमें है, तो सार्थक 'मारुतैः' चतुर्थपादके आदिमें बहुतसे स्वर-व्यञ्जनोंके व्यवधानसे आवृत्त है । विषम और सम पादोंमें आवृत्तिका यह एक अन्य प्रकार यहाँ आचार्यने दिया है ।। ३१ ।। २८. (२. व. ४) व्यपेत सुकर चतुष्पादादि व्यत्यस्त यमक — इस श्लोक में रसिकशिरोमणि कवि दण्डीने विपरीतरतिमें पुरुषपर अध्यासित रमणियों की सम्भोगकालिक अवस्थाका चित्रण किया है । यहाँ गुणन चिह्न (×) आकारके समान प्रथम पादके आदिमें दत्त वर्णसमुदाय 'सुराजित' की आवृत्ति चौथे पादके आदिमें की गई है और द्वितीय पादके आदिमें स्थित 'तनुमध्या' की आवृत्ति तृतीय पादके आदिमें की गई है । इनमें परस्पर पर्याप्त वर्णोंका व्यवधान है । क्लिष्टकल्पनासे रहित और सुश्राव्य होनेके कारण ये यमक सुकर हैं । पुरुषकर्म करती स्त्रियोंमें पुरुषताकी अभिव्यक्तिके लिये महाप्राण वर्ण, संयुक्त वर्ण तथा विसर्गोंका प्रयोग कविने स्त्रीत्वोचित कोमल वर्णोंके साथ- साथ किया है । तनुमध्यासते — आसु उपवेशने (अदादि ११) का अधिकरण 'तनु' √आस्से 'अधि' के योगके कारण कर्म बन गया है ।१ सुराजितह्रियः — सुरया जिता ह्रीर्यासाम् (बहुव्रीहि), ताः । तनुमध्याः —तनु मध्यं यासां (बहु०) ताः । क्षरत्स्वेदसुराजितमुखेन्दवः—क्षरंश्चासौ स्वेदः = क्षरत्स्वेदः (कर्मधारयतत्पुरुष); सुष्ठु राजितः = सुराजितः (गति- तत्पुरुष); क्षरत्स्वेदेन सुराजितः = क्षरत्स्वेदसुराजितः (तृतीयातत्पु०); मुख- १. अष्टा० १।४।४६ : अधिशीङ्स्थाऽऽसां कर्म ।
३।३३-३४] ३ अव्यपेत-व्यपेत यमक ४३ इति (२) व्यपेतयमकप्रभेदोऽप्येष दर्शितः । (३) अव्यपेत-व्यपेतात्मा विकल्पोऽप्यस्ति, तद् यथा ॥ ३३ ॥ २६. सालं सालम्बकलिकासालं साऽलं न वीक्षितुम् । नालीनालीनबकुलानाली नालीकनीरपि¹ ॥ ३४ ॥ इस प्रकार (२) व्यपेतयमक नामक भेद भी यह दिखला दिया है । (३) अव्यपेत और व्यपेतके मिश्रण वाला भेद भी है । वह जैसे—॥ ३३ ॥ २६ वह (मेरी) सखी (१) न लटकती हुई कलियोंके प्रकार वाली (अर्थात् कुसुमकलिकाच्छादित) वृक्षको नहीं देख सकती है; (२) न मौल- सिरीको छुपाने वाले भौंरोंको; और (३) न (भौंरोंसे छिपी हुई) पद्मिनियों को (देख सकती है) ॥ ३४ ॥ मेवेन्दुः = मुखेन्दुः (उपमिततत्पुरुष²) । क्षरत्स्वेदसुराजितो मुखेन्दुर्यासां, (बहुव्रीहि) ताः स्त्रियः ॥ ३२ ॥ इस प्रकार सुकर आदियमकके (२) व्यपेत नामक भेदके १३ प्रभेद २०- ३२ श्लोकोंमें उपलक्षित किये हैं। इसके (क) एकपाद यमकके चारों तथा (ग) त्रिपादयमकका एक (२) प्रथम-द्वितीय-चतुर्थ-पादादि, कुल पाँच भेद नहीं दिए हैं। इस प्रकार व्यपेत यमकके कुल दस भेदोंके १३ उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। पन्द्रहवें भेद (१ घ) चतुष्पादादियमकके (i) सम और (ii) द्विविध अर्धसम तथा (iii) एकविध व्यत्यस्त (क्रॉस्) प्रभेद यमकके अन्य भेदों में भी सम्भव हैं। अतः वे अन्यत्र तादृश विच्छित्तियोंके उप- लक्षणार्थ दिये समझे जाने चाहिये । इसके बाद (३) अव्यपेत और व्यपेतके मिश्रण वाले (१) आदियमक भेदके १५ भेदोंमें से एक चतुष्पाद प्रभेदके १. अर्धसम (३४), २. व्यत्यस्त (३५) एवं ३. सजातीय प्रकार दिए हैं। ये अन्य भेदोंके उपलक्षक हैं ॥३३॥ २६ (३. घ १) अव्यपेत-व्यपेत अर्धसम चतुष्पाद यमक—आचार्यने इस श्लोकमें रतिके उद्दीपन विभाव वसन्तका ओर आलम्बन विभाव आली (सखी) का वर्णन किया है। (१) सखी कलियोंसे पूरी तरह आच्छादित १. अन्वय :—सा आली सालम्ब-कलिका-सालं वीक्षितुं न अलम् । न आलीनबकुलान् अलीन्, नालीकिनीः अपि (वीक्षितुम् अलम्) । २. अष्टा० २।१।५६ : उपमितं व्याघ्रादिभिः सामान्याप्रयोगे ।
४४ काव्यादर्श [ ३।३४ वृक्षोंको नहीं देख सकती । इससे बहारकी रुत पूरी तरह बहारपर है, यह सूचित होता है । कलिकाओंपर 'साल' (प्राकार)के आरोपसे कलिकाओंका अत्यन्त घनत्व सूचित होता है । इससे एक बात और प्रकट होती है : वसन्तने जैसे किलेबन्दी कर ली है और सखी इससे इतनी व्याकुल, भीत हो गई है कि उधर नज़र उठाते भी डरती है । (२) मौलसिरीके पेड़ भी इतने पुष्पित हो गये हैं कि उनपर बैठे मँडराते भौरोंसे वे छुप गये हैं; पूरी तरह ढँक गये हैं । वक्त्रीकी सखी उसे भी नहीं देख सकती । उसे ये भौंरे मदन- महीपके सेनापति वसन्तके सैनिक जो लगते है । सखी तालाबोंमें खिले कमलोंको भी नहीं देख सकती । मदमाते नशीले मौसममें प्रिय रविके कर- स्पर्शसे खिली हुई पद्मिनियाँ आलीको अपने एकाकीपनका बार-बार भान कराकर प्रियतमकी यादकी टीसको मनमें जगा-जगा जाती हैं । कैसे देखे वह इन प्रियाकी मनभावती पद्मिनियोंको ! इस प्रकार उसे उपवनभ्रमण भी बेचैन ही करता है । यहाँ पूर्वार्धके दोनों पादोंके आदिमें व्यवधानरहित 'सालं' वर्णसमुदायकी एवम् व्यवधानयुक्त 'सालंसाल' की आवृत्ति है । उत्तरार्धके भी दोनों पादोंके आदिमें इसी प्रकार पूर्वार्धसे विजातीय वर्णसमुदाय 'नाली'की बिना व्यवधान के तथा 'नालीनाली' की वर्णान्तरके व्यवधानमें शोभाजनक आवृत्ति है । इस प्रकार इस श्लोकका पूर्वार्ध एक समान वर्णसमुदायकी आवृत्तिसे युक्त है, तो उत्तरार्ध भी समान वर्णसमुदायकी अव्यपेत और व्यपेत आवृत्तिसे युक्त है । अतः यह अव्यपेत-व्यपेतोभयात्मक चतुष्पाद आदि-यमक है । किन्तु यह तथा अगले कुछ भेद आजके कोमलमति विद्वानोंके लिये बहुत सुकर नहीं हैं । 'साल' शब्दके तीन अर्थ होते हैं : (१) वृक्ष, (२) 'साल' (सर्ज) नामक खास वृक्ष, (३) प्राकार ।¹ प्रथम 'सालं' पद 'वृक्ष' अर्थमें उचित है, वृक्षविशेष नहीं, क्योंकि वृक्षविशेष सालमें कलिका (या फूल) वसन्तमें नहीं, अपितु ग्रीष्ममें आती हैं । यहाँ वर्णन वसन्तका प्रचलित है, यह तृतीय पादमें स्पष्ट है । अन्य ऋतुमें इतनी पुष्पसमृद्धि सम्भव नहीं है । द्वितीय 'साल' से 'प्राकार' अभीष्ट है । यह कलिकाओंका घनत्व सूचित करता है । रत्नश्रीज्ञानने 'साल' का एक अर्थ 'शाखा' किया है : लटकती हुई कलियोंसे युक्त शाखाओं वाले 'साल' नामक तरुविशेषको । तरुणवाचस्पतिने र-लमें अभेद मानकर 'साल = सार = श्रेष्ठ' अर्थ किया है । १. सालः पादपमात्रे स्यात्, प्राकारे, सर्जपादपे । मेदिनीकोष
३।३५] ३ अव्यपेत-व्यपेत आदि यमक ४५ ३०. काऽलं कालमनालक्ष्य-तार-तारकमीक्षितुम् । तारताऽरम्य-रसितं कालं काल-महाधनम् ॥१ ३५ ॥ ३० जिसमें उज्ज्वल तारे बिल्कुल नहीं दिखाई दे रहे हैं, जोरदार (गम्भीर) होनेके कारण मनको अच्छी नहीं लगने वाली (डरावनी) गर्जना२ वाले, काल (मौत जैसे), काले-काले विशाल बादलों वाले काल (वर्षासमय) को कौन स्त्री देख सकती है ? ॥ ३५ ॥ नालीकिनी—नालं पद्म-दण्डोऽस्त्यस्येति नालीकम्, कमलम्, नाल + ठन् । तदस्त्यस्याम् इति नालीकिनी पद्मिनी३ ॥ ३४ ॥ ३०. (३. घ. २) अव्यपेत-व्यपेत चतुष्पादादि व्यत्यस्त यमक--इस श्लोकमें कविने रमणियोंके लिये अत्यन्त त्रासदायक वर्षाकालका स्वाभाविक वर्णन किया है । अतः यह रतिका उद्दीपन विभाव है । इस मौसममें बादल इतने काले और गहरे होते हैं कि चमकने वाले तारे दिखलाई भी नहीं देते । भीरुस्वभावा रमणियोंको मेघगर्जना यों ही डरावनी होनेके कारण अच्छी नहीं लगती । पर बहुत तेज गड़गड़ाती होनेके कारण तो यह बिल्कुल ही अच्छी नहीं लगती । विरहिणियोंको तो यह मौसम साक्षात् काल प्रतीत होता है । ऐसी ऋतुमें विरहिणियोंके सामने प्रेमविह्वलता और भयके मारे आँखें मूंदकर दुबककर पड़े रहनेके अतिरिक्त कोई चारा नहीं है । यहाँ वर्षाकालपर काल (मौत) का आरोप उद्दीपकता बढ़ाता है । रत्नश्रीज्ञानने 'तारता-रम्य-रसितं' छेद करके वर्षाकालको 'रम्य' बताया है । १. अन्वय : —अनालक्ष्य-तार-तारकं तारताऽरम्य-रसितम्, काल-महाघनं, कालं, कालम् ईक्षितुं का अलम् ? २. स्तनितं, गर्जितं, मेघ-निर्घोषो, रसितादि च ।। अमरकोष १।३।८ ३. नाल + ठन् से 'नालिक' निष्पन्न होता है : अत इनिठनौ (अष्टा० ५।२।१२५) । अन्येषामपि दृश्यते (६।३।१३७) से इकारको दीर्घ : नालीक । पुष्करादिगणान्तर्गत होनेसे पुष्करादिभ्यो देशे (५।२।१३५) से इनि, ऋन्नेभ्यो ङीप् (४।१।५) से स्त्री प्रत्यय ङीप् । व्याकरणके अनु- सार यद्यपि 'पद्मिनी', 'अब्जिनी', 'नालीकिनी' आदि शब्द 'पुष्करिणी' (पोखर, कमलताला) अर्थमें ही सीमित हैं, तथापि ये सरोजोंके लिये रूढ हो गए हैं : नलिन्यां तु बिसिनीपद्मिनीमुखाः (अमरकोष १।१०।३६) ।
४६ काव्यादर्श [३।३६
३१. याम याम-त्रयाधीनायामया मरणं निशा । यामयाम धियाऽस्वात्यायामया मथितैव सा १ ॥ ३६ ॥ ३१. तीन पहरोंके अधीन विस्तार वाली (अर्थात् तीन पहर बची हुई, अत एव लम्बी) रातके द्वारा (इसके रहते) हम मर जायें, (यह सम्भावित है) । जिसे हम बुद्धिसे पहुँचे थे (जो मनमें बसी हुई है), प्राणपीडाकारी (प्रेम-) रोगवाली वह मर ही चुकी (होगी) ॥ ३६ ॥ यह श्लोकके मुख्य भावके विपरीत है । वादी जङ्घालदेवने रत्नश्रीप्रोक्त व्याख्याके अतिरिक्त अस्म्यता वाली व्याख्या भी दी है । तरुणवाचस्पतिने केवल 'अरम्य' छेद किया है । प्रथम पादके आदिमें दत्त 'काल' की आवृत्ति यहाँ तथा चौथे पादके आदिमें अव्यवहित रूपमें की गई है । प्रथम और चतुर्थ पादोंमें द्वितीय और तृतीय पादोंका व्यवधान भी है । इस प्रकार यह यमक अव्यपेत एवं व्यपेत दोनों प्रकार का है । इसी प्रकार द्वितीय पादके आदिमें प्रयुक्त 'तार' की भी आवृत्ति वहीं और तृतीय पादके आदिमें अव्यवहित रूपमें होनेके अतिरिक्त दोनों पादोंके मध्य चार अक्षरोंका व्यवधान भी है । अतः यह यमक भी अव्यपेत और व्यपेत दोनों प्रकारका है । (क) प्रथम और चतुर्थ, (ख) द्वितीय और तृतीय पादोंमें व्यस्त क्रमके कारण यह यमक विशेष शोभाकारक हो गया है, परन्तु उतना सुकर नहीं है ॥ ३५ ॥ ३१. (३. घ. ३) अव्यपेत-व्यपेत चतुष्पाद सजातीय यमक—इस श्लोक में अत्यधिक प्रेम करने वाली प्रियामें अत्यन्त अनुरक्त विरही पुरुषने मिलन न होनेके कारण अपनी और प्रियाकी अत्यन्त दुःखमय दशाका वर्णन किया है । इस प्रकार विप्रलम्भ रतिकी तीव्रतम पीड़ाका प्रदर्शन यहाँ किया गया है । इसमें विरही नायक कहता है कि अभी तो रातका प्रथम प्रहर ही बीता है, तीन पहर रात बाकी है । पर यह कट नहीं पायेगी । विरहज्वाला इतनी प्रबल है कि रात बीतते-न-बीतते प्राणों की बलि ले लेगी, यह लगता
१. रत्नश्री : याम-त्रयाधीनायामया निशा मरणं याम । याम् अयाम्, अस्वात्यार्या सा अधिया मया मथितैव । वादिजीने यह अन्वय भी किया हैं : स्वात्या धिया याम् अयाम, सा अयामया एव मथिता । तरुणवा०: धिया याम् अयाम, अस्वात्यायामया सा मथितैव । शेष समान है । व्याख्या देखें ।
३।३७] आदियमकका उपसंहार ४७ इत्यादि-पाद-यमक-विकल्पस्येदृशी गतिः । एवमेव विकल्प्यानि यमकानीतराण्यपि ॥ ३७ ॥ पादोंके आदिमें होने वाले यमकके विकल्प (भेद) की गति (स्वरूप) ऐसी है । अन्य यमकोंके भेद भी इसी तरह किये जाने चाहियेँ ॥ ३७ ॥ है । खैर, मेरी तो जो हालत है, सो है; मेरी प्रियाका क्या हाल होगा । शरीरसे तो हम उसके पास जा नहीं सकते; पर उसके बारेमें सोच तो सकते ही हैं । मेरे विरहमें प्राणसङ्कटकारी प्रेमव्याधि वाली वह बेचारी तो मर ही गई होगी । रत्नश्रीज्ञान, और वादिजीके अन्वयों तथा व्याख्याओंमें नायकके लिये एक बार 'याम्' बहुवचन और दो बार 'अयम्' एवं 'मया' में एकवचनका विक्षेपसूचक प्रयोग है । इसके अतिरिक्त 'याम् अयम्' का कोई बहुत औचि- त्यपूर्ण अर्थ इन व्याख्याओंमें नहीं निकलता । 'मुझ मूर्खने प्राणकष्टकारी पीडाको प्राप्त उसे मार ही डाला है', अर्थमें नायकद्वारा नायिकाके परित्याग की कल्पना अपेक्षित है । अतः इन दोनों आचार्योंकी व्याख्याएँ बहुत सङ्गत नहीं है । तरुणवाचस्पति की व्याख्या ठीक है । निशा—'निश्' (रात) प्राचीन प्रकृति है । भागुरि आचार्य 'निशा' को इसीका परिवर्धित रूप मानते हैं । पाणिनिने पश्चात्कालिक 'निशा' को आधार बनाकर प्राचीन रूपको शस् (द्वितीया बहुवचन) आदि विभक्तियोंमें विकल्पसे समाविष्ट किया है ।१ अतः 'निशया', 'निशा' । प्रथमपादादिस्थ 'याम' की चारों पादोंमें अव्यवहित आवृत्ति है और 'यामयाम' की व्यवधानसे । अतः यह मिश्रात्मक यमक है । चारों पादोंमें सजातीय 'याम' और 'यामयाम' वर्णसमुदायोंकी आवृत्ति है, अतः यह चतुष्पादवर्ती सजातीय यमक है । रचनाकी दृष्टिसे यह सुकर नहीं है । ३६वें श्लोकसे तुलना करें ॥ ३६ ॥ इस प्रकार आचार्य दण्डीने पादादि यमकके (१) अव्यपेत भेदके पूरे १५ भेदोंके, (२) व्यपेत यमकके ६ भेदोंके तथा १५वें भेद चतुष्पाद यमकके १. वष्टि भागुरिरल्लोपमवाप्योरुपसर्गयोः । आपं चैव हलन्तानां, यथा वाचा, निशा, दिशा ॥ अष्टाध्यायी ६।१।६३ : पद्दनोमासहृन्निशसन्यूषन्दोषन्यकञ्छकन्नुदन्ना- सञ्छस्प्रभृतिषु ।
४८ काव्यादर्श [३।३८-३६ न प्रपञ्चभयाद् भेदाः कात्स्न्र्य्येनाख्यातुमीप्सिताः । दुष्कराभिमता एव दृश्यन्ते तत्र केचन ॥ ३८ ॥ १. स्थिरायते, यतेन्द्रियो, न हीयते यतेर्भवान् । अमायतेयतेऽप्यभूत् सुखाय तेऽयते क्षयम्' ॥ ३६ ॥ विस्तारभयसे भेद पूरी तरह कहना अभीष्ट नहीं है। उनमेंसे कुछ दुष्करके रूपमें अभिमत (भेद) ही दिखाए जा रहे हैं ॥ ३८ ॥ हे स्थिर भविष्य वाले, इन्द्रियोंपर नियन्त्रण रखने वाले आप (किसी) यतिसे हीन (कम) नहीं हैं। तुम्हारी निश्छलता भी तुम्हें क्षीण न होने वाला इतना सुख देने वाली हो गई है ॥ ३६ ॥ ४ प्रकार और (३) अव्यपेत-व्यपेत भेदके १५वें भेदके ३ प्रकार उदाहरणों से प्रदर्शित किये हैं। इस प्रकार कुल ३१ उदाहरणोंमें पादादियमकका प्रद- र्शन आचार्यने किया है । इसके बाद आचार्यका कहना है कि यह तो दिशा है विकल्पोंके प्रदर्शनकी । अन्य पादमध्य आदि छह विधाओंके भेदोंके उदाहरण भी इसी प्रकार समझ लेने चाहियें । आचार्य रत्नश्रीज्ञानने इनमेंसे ८ भेदोंके उदाहरण प्रदर्शित किये हैं ॥ ३७ ॥ विस्तारभयसे सब भेदोंके उदाहरण देना अभीष्ट नहीं है । इस प्रकार काव्यमें माधुर्योत्पादक (क) सुकर यमकोंका उदाहरणोंसे प्रदर्शन करनेके बाद माधुर्यव्याघातक (ख) दुष्कर यमक अगले ३६ श्लोकोंमें प्रदर्शित किया है। दुष्कर यमकके भी सब भेदोंका प्रदर्शन विस्तारभयसे नहीं दिया है । गिने-चुने भेदोंके उदाहरण दिये हैं ॥ ३८ ॥ दुष्कर यमक : १. (३. घ. २) अव्यपेत-व्यपेत चतुष्पाद सजातीय पादमध्य यमक--इस श्लोकमें किसी इन्द्रियसंयमी निश्छल पुरुषका वर्णन किया गया है। यहाँ एक ही वर्णसमुदाय 'यते' चारों पादोंके मध्यमें अव्यव- वहित रूपसे और 'यतेयते' व्यवहित प्रकारसे आवृत्त है। इसकी तुलना ३६वें श्लोकसे की जा सकती है । यह उसकी अपेक्षा आसान है । रत्नश्रीमें इसे 'अव्यपेत यमक' बताया है । सम्भवतः यह लेखकका प्रमाद है ॥ ३६ ॥ १. अन्वय :--स्थिरायते, यतेन्द्रियो भवान् यतेर्न हीयते । अमायताऽपि ते क्षयम् अ-यते इयते सुखायाभूत् ।
३।४०-४१] दुष्कर यमक ४६ २. सभासु राजन्नसुराहतैर्मुखैर्महीसुराणां वसुराजितैः स्तुताः । न भासुरा यान्ति सुरान्न ते गुणाः प्रजासु रागात्मसु राशितां गताः' ।।४० ३. तव प्रिया सच्चरिता प्रमत्त, या, विभूषणं धार्यमिहांशुमत्तया । रतोत्सवामोदविशेषमत्तया न मे फलं किञ्चन कान्तिमत्तया ।। ४१ ।। २. हे राजन्, सभाओंमें ब्राह्मणोंके मदिरासे अनाहत अर्थात् अदूषित, धनसे दीप्त (अर्थात् दरिद्रतासे म्लान नहीं) मुखोंके द्वारा प्रशंसित, (तुम्हें) प्रेम करनेके स्वभाव वाली प्रजाओंमें राशिके रूपमें विस्तारको प्राप्त तुम्हारे प्रशस्त उज्ज्वल गुण देवताओं तक नहीं पहुँचते, ऐसा नही है ।। ४० ।। ३. हे प्रमादी, जो दुष्ट चरित्र वाली तुम्हारी प्रिया है, किरणोंसे युक्त (जगमग-जगमग करता) यह गहना इस स्थितिमें मिलनोत्सवके अत्यधिक आनन्दके² कारण मस्त उस प्रियाके द्वारा धारण किया जाये । मुझे कान्ति- मती होनेसे (कोई) लाभ नहीं है ।। ४१ ।। २. (२. घ. २) व्यपेत सजातीय चतुष्पाद मध्ययमक—यहाँ कविने किसी राजाके दरबारमें ब्राह्मणों द्वारा वर्णित उसके गुणोंका सुरलोक तक पहुँचना बताया है । चारों पादोंके मध्यमें 'सुरा' वर्णसमुदाय वर्णान्तरके व्यवधानमें आवृत्त हुआ है । दुष्कर यमककी रचना अनुष्टुप्की अपेक्षा बड़े छन्दमें अधिक अच्छी तरहसे हो सकती है । इसलिये आचार्यने दुष्कर यमक के प्रकरणमें बदल-बदलकर छन्दोंका प्रयोग किया है । यहाँ और अगले दो श्लोकोंमें वंशस्थ छन्द है ।³ वर्णसङ्घातकी इस प्रकारकी आवृत्तिसे अर्थावबोधमें सुगमता नहीं रहती । अतः ये सब यमक दुष्कर हैं । चतुष्पाद यमक देनेका कारण इसमें अन्योंकी अपेक्षा आवृत्तिकी मुखरता अधिक होना है । आदियमकके पर्याप्त उदाह- रण पीछे दिये जा चुके हैं । इसलिये दुष्करयमकके प्रदर्शनके लिये उससे भिन्न भेद चुने गए हैं ।। ४० ।। ३. (२. घ. ३) व्यपेत सजातीय चतुष्पादान्तयमक—अन्य किसी रमणी में आसक्त किन्तु अलङ्कार देकर प्रियाको मनानेका यत्न करते किसी पुरुष १. अन्वयः —राजन्, सभासु अ-सुरा-हतैः, वसु-राजितैः महीसुराणां मुखैः स्तुताः, भासुराः, रागात्मसु प्रजासु राशितां गतास्ते गुणाः सुरान् न यान्ति न । २. अमरकोष ३।३।६१ : हर्षेऽप्यामोदवन्मदः । मेदिनी कोष : आमोदो गन्धहर्षयोः । ३. जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ । वृत्तरत्नाकर
५० काव्यादर्श [३।४२ ४. भवादृशा नाथ, न जानते नते रसं विरुद्धे खलु सन्नतेनते । ये एव दीनाः शिरसा नतेन ते चरन्त्यलं दैन्यरसेन तेन ते १ ॥४२॥ ४. हे स्वामी, आप जैसे लोग झुकनेके आनन्दसे परिचित नहीं हैं। क्योंकि सन्नता (दीनता, झुकना) और इनता (स्वामित्व) परस्पर विरोधी हैं। जो लोग दीन हैं, वे झुके हुए सिरसे विचरण करते हैं ! इस लिये तुम्हें दीनताके आनन्द (कष्ट) से क्या लेना ? ।। ४२ ।। को उसकी प्रिया उसे उपालम्भसे खेदयुक्त करनेको२ वह आभूषण भी उसी स्त्रीको देनेको कह रही है : यह गहना पहनकर सुन्दर होकर भी मैं क्या फल पा लूँगी ? तुमने जाना तो उस कुलटाके पास ही है ! प्रथम पादके ‘सच्चरिताप्रमत्त’ का अर्थ रत्नश्रीज्ञानने विपरीत लक्षणासे यों माना है : ‘हे सच्चरितों (अच्छे आचरणों) के प्रति अप्रमत्त, अर्थात् दुश्चरित्र, परस्त्रीगामी ।’ पर यह तात्पर्य तो ‘सच्चरिताके प्रति प्रमत्त’ (सच्चरितायां प्रमत्त) व्याख्यासे ही आ जाता । यहाँ चारों पादोंके अन्तमें सजातीय वर्णसमुदाय ‘मत्तया’की व्यवधानयुक्त आवृत्तिसे व्यपेत चतुष्पाद सजातीय अन्तयमक है । इस यमकमें प्रथम पादके ‘असच्चरितेषु अप्रमत्त’, ‘सच्चरितेषु अप्रमत्त’, ‘असच्चरिता प्रमत्त’, ‘सच्चरिता प्रमत्त, अथवा ‘सच्चरिता अप्रमत्त’ आदि विविध पदच्छेदोंकी गुंजाइशके अतिरिक्त कोई दुष्करता नहीं है ।। ४१ ।। ४. (३. घ. ३) अव्यपेत-व्यपेतात्मक चतुष्पाद सजातीय अन्त-यमक —यहाँ एक ही ‘नते’ वर्णसमुदायकी अव्यवहित रूपसे और ‘नतेनते’ की व्यवहितरूपसे चारों पादोंके अन्तमें व्यावृत्ति हुई है । रत्नश्रीमें इसे ‘अव्यपेता- त्मक यमक’ बताया है । चतुष्पादान्त यमकमें व्यवधानके अनिवार्य होनेके कारण सम्भवतः रत्नश्रीज्ञानने प्रत्येक पादके अन्तमें ‘नते’ की अव्यवहित आवृत्तिको ही मुख्यता दी है; ‘नते नते’ की चारों पादोंमें व्यवहित उपस्थिति को नहीं । पर जब व्यवहित आवृत्ति है, तो उसकी उपेक्षा उचित नहीं है । तरुणवाचस्पतिने यहाँ ‘अव्यपेत-व्यपेत’ ही बताया है । यत्नबोध्य होनेके कारण यह दुष्कर है । १. अन्वयः—नाथ, भवादृशाः नतेः रसं न जानते । सन्नतेनते खलु विरुद्धे । ये एव दीनाः, ते नतेन शिरसा चरन्ति । तेन ते दैन्यरसेन अलम् । २. दृष्ट्वा स्थितं प्रियतमं साशङ्कं सापराधमतिलज्जम् । ईर्ष्यावचनसमुत्थैः खेदयितव्यो ह्युपालम्भैः ॥ नाटच० २२।२६४
३।४३-४४] दुष्कर यमक ५१ ५. लीलास्मितेन शुचिना, मृदुनोदितेन, व्यालोकितेन लघुना, गुरुणा गतेन । व्याजृम्भितेन जघनेन च दर्शितेन सा हन्ति, तेन गलितं मम जीवितेन १ ॥ ४३ ॥ ६. श्रीमानमानमरवर्त्मसमानमान-२ ५. खेलतीसी उज्ज्वल मुस्कानसे, कोमल वाणीसे, हल्की (अतएव अस्थिर, अर्थात् चञ्चल) चितवनसे, भारी (अतएव मन्द) चालसे, विस्तीर्ण कटिपुरोभागको दिखाते हुए जो चलती है, तो मानो मुझपर) प्रहार करती है। उस (प्रहार) के कारण मेरे प्राण निकल गये हैं ॥ ४३ ॥ ६. लक्ष्मीसे युक्त, नहीं समाता हुआ, स्थितिसे युक्त जो देवोंके मार्ग सन्नतेनते—(१) षद्लृ विशरण-गत्यवसादनेषु (भ्वादि), कर्तरि क्त, तल् =सन्न-ता, सा च इनता चेति, इतरेतरयोग द्वन्द्व; (२) सम् + नतः= सन्नतः, स च इनश्चेति, सन्नतेनौ, तयोर्भावौ सन्नतेनते ॥ ४२ ॥ ५. (२. घ. ४) व्यपेत चतुष्पादगत सजातीय मध्यान्तगत यमक—प्रकृत श्लोकमें कविने पूर्वश्लोकमें आवृत्त 'नते' वर्णसमुदायको उलटकर 'तेन' की आवृत्तिसे यमक प्रस्तुत किया है। नायककी रतिके आलम्बन विभाव सुन्दरी की चेष्टाओं (उद्दीपन विभावों) का वर्णन करके नायककी प्ररूढ रति प्रद- शित की है। रचना उसके अनुकूल अल्पपदसमास वाली, अनुप्रासयुक्त है। एक ही वर्णसमुदाय 'तेन' प्रत्येक पादके मध्यमें और अन्तमें व्यवधानसे व्यावृत्त हुआ है। केवल मध्य और अन्त नियत स्थानोंमें आवृत्तिके लिये पृथक् प्रयत्न अपेक्षित होनेसे ही यह दुष्कर है। अन्यथा अर्थसमर्पणकी तथा श्रव्यता की दृष्टिसे इसमें किसी प्रकारकी क्लिष्टता नहीं है। अतः यह यमक दुष्कर होते हुए भी माधुर्योत्पादक है। यहाँ 'हन्ति' द्वयर्थक है। यहाँ और अगले श्लोकमें वसन्ततिलका छन्द है ॥ ४३ ॥ ६. (३. घ) अव्यपेत-व्यपेत चतुष्पाद सजातीय आद्यन्त यमक—इस श्लोकमें दुष्कर रचनाके द्वारा जगत्के निमित्तोपादान कारण परम तत्त्वका वर्णन किया गया है। वह परम तत्त्व श्री (माया) से संवलित है; मान (ज्ञान) १. अन्वयः—शुचिना लीलास्मितेन, मृदुना उदितेन, लघुना व्यालोकितेन, गुरुणा गतेन, व्याजृम्भितेन जघनेन दर्शितेन च सा हन्ति । तेन मम जीवितेन गलितम् । २. अन्वयः—श्रीमान् अमान् स्थितिमान् यः अमरवर्त्म-समान-मानम्
५२ काव्यादर्श [३।४४ मात्मानमानत-जगत्प्रथमानमानम् । भूमानमानयति यः स्थितिमानमान- नामानमानम तमप्रतिमानमानम्१ ॥ ४४ ॥ (आकाश) के समान प्रमाण वाले, विनम्र (भक्त) लोगोंमें विस्तृत होते हुए मान (सम्मान, पूजा) वाले अपने आपको भूमा (बहुत्व) को प्राप्त कराता है, अमेय (अनन्त) नामों वाले, अनुपम मान (स्वरूप) वाले उसे प्रणाम कर ॥ ४४ ॥ के साधन इन्द्रियोंसे कालावच्छिन्न ज्ञान नहीं प्राप्त करता, अथवा प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे वस्तुस्वरूपका मान नहीं करता; जगत्की स्थिति तथा तदुपलक्षित सृष्टि एवं संहार वाला है, अर्थात् सृष्टि, स्थिति और प्रलयका कर्ता है; अथवा स्थिर, अनश्वर है। इस प्रकारका वह आकाशके समान सबका अधि- ष्ठान है, वह आकाशके समान सर्व व्यापक है।२ उसका मान भक्त लोगोंमें वृद्धिको प्राप्त होता है। अथवा उपर्युक्त प्रकारसे विभु व्यापक उसका मान भी विनत लोगोंके हृदयमें सिमट जाता है। ऐसा वह (हृदयमें सिमटने वाला) अपने आपको विभु (भूमा) बना लेता है—'मैं एक हूँ, बहुत हो जाऊँ', अपनी इस इच्छाकी पूर्तिके लिये इस समस्त जगत्प्रपञ्चके रूपमें वह स्वयं ही प्रकट होता है। समस्त जगत्प्रपञ्च ही उस परम तत्त्वका स्वरूप होनेके कारण यह सब वही है। अतः जगत्के सारे नाम, सारा वाक्प्रपञ्च, वाग्व्यव- हार, उसीकी अभिव्यक्ति है ।३ ये सब उसीके नाम हैं। देश, काल, पात्रोंकी इयत्ताके परिसीमनके असाध्य होनेके कारण विभुके ये सब नाम भी परिमेय नहीं हैं। विष्णुसहस्रनाम, शिवसहस्रनाम आदि तो उपलक्षण हैं, एक क्षुद्रसा १. आनत-जगत्प्रथमान-मानम् आत्मानं भूमानम् आनयति, अमान-नामानम्, अप्रतिमान-मानं तम् आनम । २. तैत्तिरीयोपनिषद् १।६।२ : आकाशशरीरं ब्रह्म । ३. तै० उ० २।६।१ : सोऽकामयत 'बहु स्याम् प्रजायेय' इति ।...तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् । बृहदारण्यकोपनिषद् १।४।५ : सोऽवेद्, 'अहं वाव सृष्टिरस्मि; अहं हीदं सर्वमसृक्षि ।' इति । ततः सृष्टिरभवत् । ६ : ब्रह्म वा इदमग्र आसीत् । तदात्मानमेवावेद्, 'अहं ब्रह्मास्मि ।' इति । तस्मात् तत्सर्वमभवत् । १।२।५ : स ऐक्षत...स तया वाचा, तेनात्मनेदं सर्वमसृजत यदिदं कि च—यजूंषि, सामानिच्छन्दांसि, यज्ञान्, प्रजाः, पशून् । छान्दोग्योपनिषद् ६।२।३-४ भी देखें ।
३।४४] दुष्कर यमक ५३ अंश है विभुकी नामावलीका । उसका कोई प्रतिमान ही नहीं है जगत्में । १ उसके स्वरूपकी ईदृक्ता या इयत्ताका मान किस प्रतिमानसे किया जा सकता है । २ हे हृदय, तू उसके आगे विनत हो । अपना आपा उँडेल दे उसीमें । तत् त्वमसि । तू वही है । वही हो जा । अन्यविध अर्थोंके लिये रत्नश्री, वादि और तरुण टीकाएँ देखें । रत्नश्रीमें तृतीय पादमें ‘आनयति’ के स्थानमें ‘आनमत’ पाठभेद बताया है । वादीटीका और तरुणटीकामें उसीकी व्याख्या की है । इस पाठमें चतुर्थपादके मध्यमें ‘आन- मतम्’ पदच्छेद इन लोगोंने किया है : आननन्ति = सम्यक् श्वासोच्छ्वासौ कुर्वन्ति इति ‘आनाः’ प्राणिनः । तैः ३ मतः इति ‘आन-मतः’, तम् । अर्थात् सभी प्राणी जिसे बहुत मानते हैं, उसे आ-नमत भली भाँती प्रणाम करो । आ + √ नम् कर्तरि लोट्, मध्यम बहुवचन । आ-नम—आ + √ नम् कर्तरि लोट्, मध्यम एकवचन । यहाँ समान वर्णसमुदाय ‘मान’ की चारों पादोंके आदिमें एकेक अक्षरके बाद तथा अन्तमें अव्यपेत आवृत्ति है । ‘मान-मान’ समुदायकी भी इसी तरह चारों पादोंके आरम्भमें एकेक अक्षरके बाद और अन्तमें व्यवधानसे आवृत्ति है । इसलिये यहाँ चतुष्पाद आद्यन्त-यमक है । आवृत्त वर्णसमुदायके समान होनेसे यह सजातीय है । रत्नश्रीज्ञान, वादीजी, तरुणवाचस्पति और रङ्गाचार्य रेड्डीने एकेक अक्षरको छोड़नेके बाद स्थित वर्णसमुदायकी आवृत्तिके कारण इसे आदिके स्थानपर मध्य स्थान मानकर ‘मध्यान्तयमक’ का उदाहरण माना है । पर सोलह अक्षर वाले पादमें प्रारम्भिक एक अक्षरको छोड़कर दो अक्षरोंकी आवृत्तिसे ‘पादका मध्य’ कैसे हो गया ? चार अक्षरोंके बाद यदि होता, या मध्यके निकट भी होता, तो ‘मध्य’ कहना उचित होता । १. न तस्य प्रतिमा अस्ति, यस्य नाम महत् यशः ।। वा० सं० ३२।३ २. विष्णोरिवास्यानवधारणीयमीदृक्तया रूपमियत्तया वा ।। रघुवंश १३।३ ३. रत्नश्रीज्ञान और तरुण वाचस्पतिने ‘तेषां मतः’ विग्रह दिया है । पर ‘क्तेन च पूजायाम्’ (अष्टाध्यायी २।२।१२) से षष्ठीसमासनिषेधके कारण यह उचित नहीं है । अतः ‘मत’ में √ मन् से ‘मति-बुद्धि-पूजा- ऽर्थेभ्यश्च’ (अष्टाध्यायी ३।२।१८८) से वर्तमानमें क्त न करके भूत- कालमें ‘निष्ठा’ (अष्टाध्यायी ३।२।१०२) से क्त करके तृतीया तत्पुरुष उचित है । वादीटीका देखें ।