भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 68

३।३५] ३ अव्यपेत-व्यपेत आदि यमक ४५ ३०. काऽलं कालमनालक्ष्य-तार-तारकमीक्षितुम् । तारताऽरम्य-रसितं कालं काल-महाधनम् ॥१ ३५ ॥ ३० जिसमें उज्ज्वल तारे बिल्कुल नहीं दिखाई दे रहे हैं, जोरदार (गम्भीर) होनेके कारण मनको अच्छी नहीं लगने वाली (डरावनी) गर्जना२ वाले, काल (मौत जैसे), काले-काले विशाल बादलों वाले काल (वर्षासमय) को कौन स्त्री देख सकती है ? ॥ ३५ ॥ नालीकिनी—नालं पद्म-दण्डोऽस्त्यस्येति नालीकम्, कमलम्, नाल + ठन् । तदस्त्यस्याम् इति नालीकिनी पद्मिनी३ ॥ ३४ ॥ ३०. (३. घ. २) अव्यपेत-व्यपेत चतुष्पादादि व्यत्यस्त यमक--इस श्लोकमें कविने रमणियोंके लिये अत्यन्त त्रासदायक वर्षाकालका स्वाभाविक वर्णन किया है । अतः यह रतिका उद्दीपन विभाव है । इस मौसममें बादल इतने काले और गहरे होते हैं कि चमकने वाले तारे दिखलाई भी नहीं देते । भीरुस्वभावा रमणियोंको मेघगर्जना यों ही डरावनी होनेके कारण अच्छी नहीं लगती । पर बहुत तेज गड़गड़ाती होनेके कारण तो यह बिल्कुल ही अच्छी नहीं लगती । विरहिणियोंको तो यह मौसम साक्षात् काल प्रतीत होता है । ऐसी ऋतुमें विरहिणियोंके सामने प्रेमविह्वलता और भयके मारे आँखें मूंदकर दुबककर पड़े रहनेके अतिरिक्त कोई चारा नहीं है । यहाँ वर्षाकालपर काल (मौत) का आरोप उद्दीपकता बढ़ाता है । रत्नश्रीज्ञानने 'तारता-रम्य-रसितं' छेद करके वर्षाकालको 'रम्य' बताया है । १. अन्वय : —अनालक्ष्य-तार-तारकं तारताऽरम्य-रसितम्, काल-महाघनं, कालं, कालम् ईक्षितुं का अलम् ? २. स्तनितं, गर्जितं, मेघ-निर्घोषो, रसितादि च ।। अमरकोष १।३।८ ३. नाल + ठन् से 'नालिक' निष्पन्न होता है : अत इनिठनौ (अष्टा० ५।२।१२५) । अन्येषामपि दृश्यते (६।३।१३७) से इकारको दीर्घ : नालीक । पुष्करादिगणान्तर्गत होनेसे पुष्करादिभ्यो देशे (५।२।१३५) से इनि, ऋन्नेभ्यो ङीप् (४।१।५) से स्त्री प्रत्यय ङीप् । व्याकरणके अनु- सार यद्यपि 'पद्मिनी', 'अब्जिनी', 'नालीकिनी' आदि शब्द 'पुष्करिणी' (पोखर, कमलताला) अर्थमें ही सीमित हैं, तथापि ये सरोजोंके लिये रूढ हो गए हैं : नलिन्यां तु बिसिनीपद्मिनीमुखाः (अमरकोष १।१०।३६) ।