भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 67, कुल 270 में से

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पृष्ठ 67

४४ काव्यादर्श [ ३।३४ वृक्षोंको नहीं देख सकती । इससे बहारकी रुत पूरी तरह बहारपर है, यह सूचित होता है । कलिकाओंपर 'साल' (प्राकार)के आरोपसे कलिकाओंका अत्यन्त घनत्व सूचित होता है । इससे एक बात और प्रकट होती है : वसन्तने जैसे किलेबन्दी कर ली है और सखी इससे इतनी व्याकुल, भीत हो गई है कि उधर नज़र उठाते भी डरती है । (२) मौलसिरीके पेड़ भी इतने पुष्पित हो गये हैं कि उनपर बैठे मँडराते भौरोंसे वे छुप गये हैं; पूरी तरह ढँक गये हैं । वक्त्रीकी सखी उसे भी नहीं देख सकती । उसे ये भौंरे मदन- महीपके सेनापति वसन्तके सैनिक जो लगते है । सखी तालाबोंमें खिले कमलोंको भी नहीं देख सकती । मदमाते नशीले मौसममें प्रिय रविके कर- स्पर्शसे खिली हुई पद्मिनियाँ आलीको अपने एकाकीपनका बार-बार भान कराकर प्रियतमकी यादकी टीसको मनमें जगा-जगा जाती हैं । कैसे देखे वह इन प्रियाकी मनभावती पद्मिनियोंको ! इस प्रकार उसे उपवनभ्रमण भी बेचैन ही करता है । यहाँ पूर्वार्धके दोनों पादोंके आदिमें व्यवधानरहित 'सालं' वर्णसमुदायकी एवम् व्यवधानयुक्त 'सालंसाल' की आवृत्ति है । उत्तरार्धके भी दोनों पादोंके आदिमें इसी प्रकार पूर्वार्धसे विजातीय वर्णसमुदाय 'नाली'की बिना व्यवधान के तथा 'नालीनाली' की वर्णान्तरके व्यवधानमें शोभाजनक आवृत्ति है । इस प्रकार इस श्लोकका पूर्वार्ध एक समान वर्णसमुदायकी आवृत्तिसे युक्त है, तो उत्तरार्ध भी समान वर्णसमुदायकी अव्यपेत और व्यपेत आवृत्तिसे युक्त है । अतः यह अव्यपेत-व्यपेतोभयात्मक चतुष्पाद आदि-यमक है । किन्तु यह तथा अगले कुछ भेद आजके कोमलमति विद्वानोंके लिये बहुत सुकर नहीं हैं । 'साल' शब्दके तीन अर्थ होते हैं : (१) वृक्ष, (२) 'साल' (सर्ज) नामक खास वृक्ष, (३) प्राकार ।¹ प्रथम 'सालं' पद 'वृक्ष' अर्थमें उचित है, वृक्षविशेष नहीं, क्योंकि वृक्षविशेष सालमें कलिका (या फूल) वसन्तमें नहीं, अपितु ग्रीष्ममें आती हैं । यहाँ वर्णन वसन्तका प्रचलित है, यह तृतीय पादमें स्पष्ट है । अन्य ऋतुमें इतनी पुष्पसमृद्धि सम्भव नहीं है । द्वितीय 'साल' से 'प्राकार' अभीष्ट है । यह कलिकाओंका घनत्व सूचित करता है । रत्नश्रीज्ञानने 'साल' का एक अर्थ 'शाखा' किया है : लटकती हुई कलियोंसे युक्त शाखाओं वाले 'साल' नामक तरुविशेषको । तरुणवाचस्पतिने र-लमें अभेद मानकर 'साल = सार = श्रेष्ठ' अर्थ किया है । १. सालः पादपमात्रे स्यात्, प्राकारे, सर्जपादपे । मेदिनीकोष

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