भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 270 में से

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३।३३-३४] ३ अव्यपेत-व्यपेत यमक ४३ इति (२) व्यपेतयमकप्रभेदोऽप्येष दर्शितः । (३) अव्यपेत-व्यपेतात्मा विकल्पोऽप्यस्ति, तद् यथा ॥ ३३ ॥ २६. सालं सालम्बकलिकासालं साऽलं न वीक्षितुम् । नालीनालीनबकुलानाली नालीकनीरपि¹ ॥ ३४ ॥ इस प्रकार (२) व्यपेतयमक नामक भेद भी यह दिखला दिया है । (३) अव्यपेत और व्यपेतके मिश्रण वाला भेद भी है । वह जैसे—॥ ३३ ॥ २६ वह (मेरी) सखी (१) न लटकती हुई कलियोंके प्रकार वाली (अर्थात् कुसुमकलिकाच्छादित) वृक्षको नहीं देख सकती है; (२) न मौल- सिरीको छुपाने वाले भौंरोंको; और (३) न (भौंरोंसे छिपी हुई) पद्मिनियों को (देख सकती है) ॥ ३४ ॥ मेवेन्दुः = मुखेन्दुः (उपमिततत्पुरुष²) । क्षरत्स्वेदसुराजितो मुखेन्दुर्यासां, (बहुव्रीहि) ताः स्त्रियः ॥ ३२ ॥ इस प्रकार सुकर आदियमकके (२) व्यपेत नामक भेदके १३ प्रभेद २०- ३२ श्लोकोंमें उपलक्षित किये हैं। इसके (क) एकपाद यमकके चारों तथा (ग) त्रिपादयमकका एक (२) प्रथम-द्वितीय-चतुर्थ-पादादि, कुल पाँच भेद नहीं दिए हैं। इस प्रकार व्यपेत यमकके कुल दस भेदोंके १३ उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। पन्द्रहवें भेद (१ घ) चतुष्पादादियमकके (i) सम और (ii) द्विविध अर्धसम तथा (iii) एकविध व्यत्यस्त (क्रॉस्) प्रभेद यमकके अन्य भेदों में भी सम्भव हैं। अतः वे अन्यत्र तादृश विच्छित्तियोंके उप- लक्षणार्थ दिये समझे जाने चाहिये । इसके बाद (३) अव्यपेत और व्यपेतके मिश्रण वाले (१) आदियमक भेदके १५ भेदोंमें से एक चतुष्पाद प्रभेदके १. अर्धसम (३४), २. व्यत्यस्त (३५) एवं ३. सजातीय प्रकार दिए हैं। ये अन्य भेदोंके उपलक्षक हैं ॥३३॥ २६ (३. घ १) अव्यपेत-व्यपेत अर्धसम चतुष्पाद यमक—आचार्यने इस श्लोकमें रतिके उद्दीपन विभाव वसन्तका ओर आलम्बन विभाव आली (सखी) का वर्णन किया है। (१) सखी कलियोंसे पूरी तरह आच्छादित १. अन्वय :—सा आली सालम्ब-कलिका-सालं वीक्षितुं न अलम् । न आलीनबकुलान् अलीन्, नालीकिनीः अपि (वीक्षितुम् अलम्) । २. अष्टा० २।१।५६ : उपमितं व्याघ्रादिभिः सामान्याप्रयोगे ।

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