काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२ काव्यादर्श [३।३२ २८. सुरा-जित-ह्रियो यूनां तनुमध्यासते स्त्रियः । तनु-मध्याः क्षरत्स्वेद-सु-राजित-मुखेन्दवः ॥ ३२ ॥ २८. मदिरा द्वारा जीत ली गई लज्जा वाली, पतली कमर वाली, चूते हुए पसीनेसे सुशोभित मुखचन्द्रवाली स्त्रियाँ युवाओंके शरीरपर विराजमान हैं ।। ३२ ।। तीन कर्ताओं 'आहतैः', 'उदितैः' और 'मारुतै'से बतानेसे क्रियादीपक अर्था- लङ्कार है । यहाँ सार्थक (समानार्थक) 'उदितैः' वर्णसमुदाय प्रथम और तृतीय पादोंमें प्रदत्त है । दोनोंके बीचमें बहुतसे स्वर-व्यञ्जन वर्णोंका व्यवधान है । इसी प्रकार निरर्थक 'मारुतैः' द्वितीय पादके आदिमें है, तो सार्थक 'मारुतैः' चतुर्थपादके आदिमें बहुतसे स्वर-व्यञ्जनोंके व्यवधानसे आवृत्त है । विषम और सम पादोंमें आवृत्तिका यह एक अन्य प्रकार यहाँ आचार्यने दिया है ।। ३१ ।। २८. (२. व. ४) व्यपेत सुकर चतुष्पादादि व्यत्यस्त यमक — इस श्लोक में रसिकशिरोमणि कवि दण्डीने विपरीतरतिमें पुरुषपर अध्यासित रमणियों की सम्भोगकालिक अवस्थाका चित्रण किया है । यहाँ गुणन चिह्न (×) आकारके समान प्रथम पादके आदिमें दत्त वर्णसमुदाय 'सुराजित' की आवृत्ति चौथे पादके आदिमें की गई है और द्वितीय पादके आदिमें स्थित 'तनुमध्या' की आवृत्ति तृतीय पादके आदिमें की गई है । इनमें परस्पर पर्याप्त वर्णोंका व्यवधान है । क्लिष्टकल्पनासे रहित और सुश्राव्य होनेके कारण ये यमक सुकर हैं । पुरुषकर्म करती स्त्रियोंमें पुरुषताकी अभिव्यक्तिके लिये महाप्राण वर्ण, संयुक्त वर्ण तथा विसर्गोंका प्रयोग कविने स्त्रीत्वोचित कोमल वर्णोंके साथ- साथ किया है । तनुमध्यासते — आसु उपवेशने (अदादि ११) का अधिकरण 'तनु' √आस्से 'अधि' के योगके कारण कर्म बन गया है ।१ सुराजितह्रियः — सुरया जिता ह्रीर्यासाम् (बहुव्रीहि), ताः । तनुमध्याः —तनु मध्यं यासां (बहु०) ताः । क्षरत्स्वेदसुराजितमुखेन्दवः—क्षरंश्चासौ स्वेदः = क्षरत्स्वेदः (कर्मधारयतत्पुरुष); सुष्ठु राजितः = सुराजितः (गति- तत्पुरुष); क्षरत्स्वेदेन सुराजितः = क्षरत्स्वेदसुराजितः (तृतीयातत्पु०); मुख- १. अष्टा० १।४।४६ : अधिशीङ्स्थाऽऽसां कर्म ।