काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३।४३-४४] दुष्कर यमक ५१ ५. लीलास्मितेन शुचिना, मृदुनोदितेन, व्यालोकितेन लघुना, गुरुणा गतेन । व्याजृम्भितेन जघनेन च दर्शितेन सा हन्ति, तेन गलितं मम जीवितेन १ ॥ ४३ ॥ ६. श्रीमानमानमरवर्त्मसमानमान-२ ५. खेलतीसी उज्ज्वल मुस्कानसे, कोमल वाणीसे, हल्की (अतएव अस्थिर, अर्थात् चञ्चल) चितवनसे, भारी (अतएव मन्द) चालसे, विस्तीर्ण कटिपुरोभागको दिखाते हुए जो चलती है, तो मानो मुझपर) प्रहार करती है। उस (प्रहार) के कारण मेरे प्राण निकल गये हैं ॥ ४३ ॥ ६. लक्ष्मीसे युक्त, नहीं समाता हुआ, स्थितिसे युक्त जो देवोंके मार्ग सन्नतेनते—(१) षद्लृ विशरण-गत्यवसादनेषु (भ्वादि), कर्तरि क्त, तल् =सन्न-ता, सा च इनता चेति, इतरेतरयोग द्वन्द्व; (२) सम् + नतः= सन्नतः, स च इनश्चेति, सन्नतेनौ, तयोर्भावौ सन्नतेनते ॥ ४२ ॥ ५. (२. घ. ४) व्यपेत चतुष्पादगत सजातीय मध्यान्तगत यमक—प्रकृत श्लोकमें कविने पूर्वश्लोकमें आवृत्त 'नते' वर्णसमुदायको उलटकर 'तेन' की आवृत्तिसे यमक प्रस्तुत किया है। नायककी रतिके आलम्बन विभाव सुन्दरी की चेष्टाओं (उद्दीपन विभावों) का वर्णन करके नायककी प्ररूढ रति प्रद- शित की है। रचना उसके अनुकूल अल्पपदसमास वाली, अनुप्रासयुक्त है। एक ही वर्णसमुदाय 'तेन' प्रत्येक पादके मध्यमें और अन्तमें व्यवधानसे व्यावृत्त हुआ है। केवल मध्य और अन्त नियत स्थानोंमें आवृत्तिके लिये पृथक् प्रयत्न अपेक्षित होनेसे ही यह दुष्कर है। अन्यथा अर्थसमर्पणकी तथा श्रव्यता की दृष्टिसे इसमें किसी प्रकारकी क्लिष्टता नहीं है। अतः यह यमक दुष्कर होते हुए भी माधुर्योत्पादक है। यहाँ 'हन्ति' द्वयर्थक है। यहाँ और अगले श्लोकमें वसन्ततिलका छन्द है ॥ ४३ ॥ ६. (३. घ) अव्यपेत-व्यपेत चतुष्पाद सजातीय आद्यन्त यमक—इस श्लोकमें दुष्कर रचनाके द्वारा जगत्के निमित्तोपादान कारण परम तत्त्वका वर्णन किया गया है। वह परम तत्त्व श्री (माया) से संवलित है; मान (ज्ञान) १. अन्वयः—शुचिना लीलास्मितेन, मृदुना उदितेन, लघुना व्यालोकितेन, गुरुणा गतेन, व्याजृम्भितेन जघनेन दर्शितेन च सा हन्ति । तेन मम जीवितेन गलितम् । २. अन्वयः—श्रीमान् अमान् स्थितिमान् यः अमरवर्त्म-समान-मानम्