काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२ काव्यादर्श [३।४४ मात्मानमानत-जगत्प्रथमानमानम् । भूमानमानयति यः स्थितिमानमान- नामानमानम तमप्रतिमानमानम्१ ॥ ४४ ॥ (आकाश) के समान प्रमाण वाले, विनम्र (भक्त) लोगोंमें विस्तृत होते हुए मान (सम्मान, पूजा) वाले अपने आपको भूमा (बहुत्व) को प्राप्त कराता है, अमेय (अनन्त) नामों वाले, अनुपम मान (स्वरूप) वाले उसे प्रणाम कर ॥ ४४ ॥ के साधन इन्द्रियोंसे कालावच्छिन्न ज्ञान नहीं प्राप्त करता, अथवा प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे वस्तुस्वरूपका मान नहीं करता; जगत्की स्थिति तथा तदुपलक्षित सृष्टि एवं संहार वाला है, अर्थात् सृष्टि, स्थिति और प्रलयका कर्ता है; अथवा स्थिर, अनश्वर है। इस प्रकारका वह आकाशके समान सबका अधि- ष्ठान है, वह आकाशके समान सर्व व्यापक है।२ उसका मान भक्त लोगोंमें वृद्धिको प्राप्त होता है। अथवा उपर्युक्त प्रकारसे विभु व्यापक उसका मान भी विनत लोगोंके हृदयमें सिमट जाता है। ऐसा वह (हृदयमें सिमटने वाला) अपने आपको विभु (भूमा) बना लेता है—'मैं एक हूँ, बहुत हो जाऊँ', अपनी इस इच्छाकी पूर्तिके लिये इस समस्त जगत्प्रपञ्चके रूपमें वह स्वयं ही प्रकट होता है। समस्त जगत्प्रपञ्च ही उस परम तत्त्वका स्वरूप होनेके कारण यह सब वही है। अतः जगत्के सारे नाम, सारा वाक्प्रपञ्च, वाग्व्यव- हार, उसीकी अभिव्यक्ति है ।३ ये सब उसीके नाम हैं। देश, काल, पात्रोंकी इयत्ताके परिसीमनके असाध्य होनेके कारण विभुके ये सब नाम भी परिमेय नहीं हैं। विष्णुसहस्रनाम, शिवसहस्रनाम आदि तो उपलक्षण हैं, एक क्षुद्रसा १. आनत-जगत्प्रथमान-मानम् आत्मानं भूमानम् आनयति, अमान-नामानम्, अप्रतिमान-मानं तम् आनम । २. तैत्तिरीयोपनिषद् १।६।२ : आकाशशरीरं ब्रह्म । ३. तै० उ० २।६।१ : सोऽकामयत 'बहु स्याम् प्रजायेय' इति ।...तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् । बृहदारण्यकोपनिषद् १।४।५ : सोऽवेद्, 'अहं वाव सृष्टिरस्मि; अहं हीदं सर्वमसृक्षि ।' इति । ततः सृष्टिरभवत् । ६ : ब्रह्म वा इदमग्र आसीत् । तदात्मानमेवावेद्, 'अहं ब्रह्मास्मि ।' इति । तस्मात् तत्सर्वमभवत् । १।२।५ : स ऐक्षत...स तया वाचा, तेनात्मनेदं सर्वमसृजत यदिदं कि च—यजूंषि, सामानिच्छन्दांसि, यज्ञान्, प्रजाः, पशून् । छान्दोग्योपनिषद् ६।२।३-४ भी देखें ।