भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 73

५० काव्यादर्श [३।४२ ४. भवादृशा नाथ, न जानते नते रसं विरुद्धे खलु सन्नतेनते । ये एव दीनाः शिरसा नतेन ते चरन्त्यलं दैन्यरसेन तेन ते १ ॥४२॥ ४. हे स्वामी, आप जैसे लोग झुकनेके आनन्दसे परिचित नहीं हैं। क्योंकि सन्नता (दीनता, झुकना) और इनता (स्वामित्व) परस्पर विरोधी हैं। जो लोग दीन हैं, वे झुके हुए सिरसे विचरण करते हैं ! इस लिये तुम्हें दीनताके आनन्द (कष्ट) से क्या लेना ? ।। ४२ ।। को उसकी प्रिया उसे उपालम्भसे खेदयुक्त करनेको२ वह आभूषण भी उसी स्त्रीको देनेको कह रही है : यह गहना पहनकर सुन्दर होकर भी मैं क्या फल पा लूँगी ? तुमने जाना तो उस कुलटाके पास ही है ! प्रथम पादके ‘सच्चरिताप्रमत्त’ का अर्थ रत्नश्रीज्ञानने विपरीत लक्षणासे यों माना है : ‘हे सच्चरितों (अच्छे आचरणों) के प्रति अप्रमत्त, अर्थात् दुश्चरित्र, परस्त्रीगामी ।’ पर यह तात्पर्य तो ‘सच्चरिताके प्रति प्रमत्त’ (सच्चरितायां प्रमत्त) व्याख्यासे ही आ जाता । यहाँ चारों पादोंके अन्तमें सजातीय वर्णसमुदाय ‘मत्तया’की व्यवधानयुक्त आवृत्तिसे व्यपेत चतुष्पाद सजातीय अन्तयमक है । इस यमकमें प्रथम पादके ‘असच्चरितेषु अप्रमत्त’, ‘सच्चरितेषु अप्रमत्त’, ‘असच्चरिता प्रमत्त’, ‘सच्चरिता प्रमत्त, अथवा ‘सच्चरिता अप्रमत्त’ आदि विविध पदच्छेदोंकी गुंजाइशके अतिरिक्त कोई दुष्करता नहीं है ।। ४१ ।। ४. (३. घ. ३) अव्यपेत-व्यपेतात्मक चतुष्पाद सजातीय अन्त-यमक —यहाँ एक ही ‘नते’ वर्णसमुदायकी अव्यवहित रूपसे और ‘नतेनते’ की व्यवहितरूपसे चारों पादोंके अन्तमें व्यावृत्ति हुई है । रत्नश्रीमें इसे ‘अव्यपेता- त्मक यमक’ बताया है । चतुष्पादान्त यमकमें व्यवधानके अनिवार्य होनेके कारण सम्भवतः रत्नश्रीज्ञानने प्रत्येक पादके अन्तमें ‘नते’ की अव्यवहित आवृत्तिको ही मुख्यता दी है; ‘नते नते’ की चारों पादोंमें व्यवहित उपस्थिति को नहीं । पर जब व्यवहित आवृत्ति है, तो उसकी उपेक्षा उचित नहीं है । तरुणवाचस्पतिने यहाँ ‘अव्यपेत-व्यपेत’ ही बताया है । यत्नबोध्य होनेके कारण यह दुष्कर है । १. अन्वयः—नाथ, भवादृशाः नतेः रसं न जानते । सन्नतेनते खलु विरुद्धे । ये एव दीनाः, ते नतेन शिरसा चरन्ति । तेन ते दैन्यरसेन अलम् । २. दृष्ट्वा स्थितं प्रियतमं साशङ्कं सापराधमतिलज्जम् । ईर्ष्यावचनसमुत्थैः खेदयितव्यो ह्युपालम्भैः ॥ नाटच० २२।२६४