भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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३।४०-४१] दुष्कर यमक ४६ २. सभासु राजन्नसुराहतैर्मुखैर्महीसुराणां वसुराजितैः स्तुताः । न भासुरा यान्ति सुरान्न ते गुणाः प्रजासु रागात्मसु राशितां गताः' ।।४० ३. तव प्रिया सच्चरिता प्रमत्त, या, विभूषणं धार्यमिहांशुमत्तया । रतोत्सवामोदविशेषमत्तया न मे फलं किञ्चन कान्तिमत्तया ।। ४१ ।। २. हे राजन्, सभाओंमें ब्राह्मणोंके मदिरासे अनाहत अर्थात् अदूषित, धनसे दीप्त (अर्थात् दरिद्रतासे म्लान नहीं) मुखोंके द्वारा प्रशंसित, (तुम्हें) प्रेम करनेके स्वभाव वाली प्रजाओंमें राशिके रूपमें विस्तारको प्राप्त तुम्हारे प्रशस्त उज्ज्वल गुण देवताओं तक नहीं पहुँचते, ऐसा नही है ।। ४० ।। ३. हे प्रमादी, जो दुष्ट चरित्र वाली तुम्हारी प्रिया है, किरणोंसे युक्त (जगमग-जगमग करता) यह गहना इस स्थितिमें मिलनोत्सवके अत्यधिक आनन्दके² कारण मस्त उस प्रियाके द्वारा धारण किया जाये । मुझे कान्ति- मती होनेसे (कोई) लाभ नहीं है ।। ४१ ।। २. (२. घ. २) व्यपेत सजातीय चतुष्पाद मध्ययमक—यहाँ कविने किसी राजाके दरबारमें ब्राह्मणों द्वारा वर्णित उसके गुणोंका सुरलोक तक पहुँचना बताया है । चारों पादोंके मध्यमें 'सुरा' वर्णसमुदाय वर्णान्तरके व्यवधानमें आवृत्त हुआ है । दुष्कर यमककी रचना अनुष्टुप्‌की अपेक्षा बड़े छन्दमें अधिक अच्छी तरहसे हो सकती है । इसलिये आचार्यने दुष्कर यमक के प्रकरणमें बदल-बदलकर छन्दोंका प्रयोग किया है । यहाँ और अगले दो श्लोकोंमें वंशस्थ छन्द है ।³ वर्णसङ्घातकी इस प्रकारकी आवृत्तिसे अर्थावबोधमें सुगमता नहीं रहती । अतः ये सब यमक दुष्कर हैं । चतुष्पाद यमक देनेका कारण इसमें अन्योंकी अपेक्षा आवृत्तिकी मुखरता अधिक होना है । आदियमकके पर्याप्त उदाह- रण पीछे दिये जा चुके हैं । इसलिये दुष्करयमकके प्रदर्शनके लिये उससे भिन्न भेद चुने गए हैं ।। ४० ।। ३. (२. घ. ३) व्यपेत सजातीय चतुष्पादान्तयमक—अन्य किसी रमणी में आसक्त किन्तु अलङ्कार देकर प्रियाको मनानेका यत्न करते किसी पुरुष १. अन्वयः —राजन्, सभासु अ-सुरा-हतैः, वसु-राजितैः महीसुराणां मुखैः स्तुताः, भासुराः, रागात्मसु प्रजासु राशितां गतास्ते गुणाः सुरान् न यान्ति न । २. अमरकोष ३।३।६१ : हर्षेऽप्यामोदवन्मदः । मेदिनी कोष : आमोदो गन्धहर्षयोः । ३. जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ । वृत्तरत्नाकर