काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८ काव्यादर्श [३।३८-३६ न प्रपञ्चभयाद् भेदाः कात्स्न्र्य्येनाख्यातुमीप्सिताः । दुष्कराभिमता एव दृश्यन्ते तत्र केचन ॥ ३८ ॥ १. स्थिरायते, यतेन्द्रियो, न हीयते यतेर्भवान् । अमायतेयतेऽप्यभूत् सुखाय तेऽयते क्षयम्' ॥ ३६ ॥ विस्तारभयसे भेद पूरी तरह कहना अभीष्ट नहीं है। उनमेंसे कुछ दुष्करके रूपमें अभिमत (भेद) ही दिखाए जा रहे हैं ॥ ३८ ॥ हे स्थिर भविष्य वाले, इन्द्रियोंपर नियन्त्रण रखने वाले आप (किसी) यतिसे हीन (कम) नहीं हैं। तुम्हारी निश्छलता भी तुम्हें क्षीण न होने वाला इतना सुख देने वाली हो गई है ॥ ३६ ॥ ४ प्रकार और (३) अव्यपेत-व्यपेत भेदके १५वें भेदके ३ प्रकार उदाहरणों से प्रदर्शित किये हैं। इस प्रकार कुल ३१ उदाहरणोंमें पादादियमकका प्रद- र्शन आचार्यने किया है । इसके बाद आचार्यका कहना है कि यह तो दिशा है विकल्पोंके प्रदर्शनकी । अन्य पादमध्य आदि छह विधाओंके भेदोंके उदाहरण भी इसी प्रकार समझ लेने चाहियें । आचार्य रत्नश्रीज्ञानने इनमेंसे ८ भेदोंके उदाहरण प्रदर्शित किये हैं ॥ ३७ ॥ विस्तारभयसे सब भेदोंके उदाहरण देना अभीष्ट नहीं है । इस प्रकार काव्यमें माधुर्योत्पादक (क) सुकर यमकोंका उदाहरणोंसे प्रदर्शन करनेके बाद माधुर्यव्याघातक (ख) दुष्कर यमक अगले ३६ श्लोकोंमें प्रदर्शित किया है। दुष्कर यमकके भी सब भेदोंका प्रदर्शन विस्तारभयसे नहीं दिया है । गिने-चुने भेदोंके उदाहरण दिये हैं ॥ ३८ ॥ दुष्कर यमक : १. (३. घ. २) अव्यपेत-व्यपेत चतुष्पाद सजातीय पादमध्य यमक--इस श्लोकमें किसी इन्द्रियसंयमी निश्छल पुरुषका वर्णन किया गया है। यहाँ एक ही वर्णसमुदाय 'यते' चारों पादोंके मध्यमें अव्यव- वहित रूपसे और 'यतेयते' व्यवहित प्रकारसे आवृत्त है। इसकी तुलना ३६वें श्लोकसे की जा सकती है । यह उसकी अपेक्षा आसान है । रत्नश्रीमें इसे 'अव्यपेत यमक' बताया है । सम्भवतः यह लेखकका प्रमाद है ॥ ३६ ॥ १. अन्वय :--स्थिरायते, यतेन्द्रियो भवान् यतेर्न हीयते । अमायताऽपि ते क्षयम् अ-यते इयते सुखायाभूत् ।