भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 70

३।३७] आदियमकका उपसंहार ४७ इत्यादि-पाद-यमक-विकल्पस्येदृशी गतिः । एवमेव विकल्प्यानि यमकानीतराण्यपि ॥ ३७ ॥ पादोंके आदिमें होने वाले यमकके विकल्प (भेद) की गति (स्वरूप) ऐसी है । अन्य यमकोंके भेद भी इसी तरह किये जाने चाहियेँ ॥ ३७ ॥ है । खैर, मेरी तो जो हालत है, सो है; मेरी प्रियाका क्या हाल होगा । शरीरसे तो हम उसके पास जा नहीं सकते; पर उसके बारेमें सोच तो सकते ही हैं । मेरे विरहमें प्राणसङ्कटकारी प्रेमव्याधि वाली वह बेचारी तो मर ही गई होगी । रत्नश्रीज्ञान, और वादिजीके अन्वयों तथा व्याख्याओंमें नायकके लिये एक बार 'याम्' बहुवचन और दो बार 'अयम्' एवं 'मया' में एकवचनका विक्षेपसूचक प्रयोग है । इसके अतिरिक्त 'याम् अयम्' का कोई बहुत औचि- त्यपूर्ण अर्थ इन व्याख्याओंमें नहीं निकलता । 'मुझ मूर्खने प्राणकष्टकारी पीडाको प्राप्त उसे मार ही डाला है', अर्थमें नायकद्वारा नायिकाके परित्याग की कल्पना अपेक्षित है । अतः इन दोनों आचार्योंकी व्याख्याएँ बहुत सङ्गत नहीं है । तरुणवाचस्पति की व्याख्या ठीक है । निशा—'निश्' (रात) प्राचीन प्रकृति है । भागुरि आचार्य 'निशा' को इसीका परिवर्धित रूप मानते हैं । पाणिनिने पश्चात्कालिक 'निशा' को आधार बनाकर प्राचीन रूपको शस् (द्वितीया बहुवचन) आदि विभक्तियोंमें विकल्पसे समाविष्ट किया है ।१ अतः 'निशया', 'निशा' । प्रथमपादादिस्थ 'याम' की चारों पादोंमें अव्यवहित आवृत्ति है और 'यामयाम' की व्यवधानसे । अतः यह मिश्रात्मक यमक है । चारों पादोंमें सजातीय 'याम' और 'यामयाम' वर्णसमुदायोंकी आवृत्ति है, अतः यह चतुष्पादवर्ती सजातीय यमक है । रचनाकी दृष्टिसे यह सुकर नहीं है । ३६वें श्लोकसे तुलना करें ॥ ३६ ॥ इस प्रकार आचार्य दण्डीने पादादि यमकके (१) अव्यपेत भेदके पूरे १५ भेदोंके, (२) व्यपेत यमकके ६ भेदोंके तथा १५वें भेद चतुष्पाद यमकके १. वष्टि भागुरिरल्लोपमवाप्योरुपसर्गयोः । आपं चैव हलन्तानां, यथा वाचा, निशा, दिशा ॥ अष्टाध्यायी ६।१।६३ : पद्दनोमासहृन्निशसन्यूषन्दोषन्यकञ्छकन्नुदन्ना- सञ्छस्प्रभृतिषु ।