काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३।३] १ यमक अन्य आचार्योंके मतमें ७ (क) सुकरा (ख) दुष्कराश्चैव दृश्यन्ते तत्र केचन ॥ ३ ॥ उनमेंसे (क) आसानीसे रचित होने वाले और (ख) कठिनाईसे रचित होने वाले कुछ भेद (आगे) देखे जा रहे हैं ॥ ३ ॥ नहीं की जा सकती । अतः मिश्रणसे भी यमक निष्पन्न होते हैं, यह एक दिग्दर्शन ही समझना चाहिये । इसके बाद आचार्यने सभी यमकोंके (क) सुकर और (ख) दुष्कर भेद किये हैं । इन अनन्त भेदोंका उदाहरणसे प्रदर्शन सम्भव नहीं है । अतः उनमें से कतिपय भेदोंके उदाहरण आचार्यने दिये हैं । (क १) सुकर अव्यवहित पादादि यमकोंके उदाहरण ४-१८ श्लोकोंमें, (२) व्यपेत सुकर पादादियमक के २०-३२में, (३) उभयात्मक सुकर आदियमकके उदाहरण ३४-३६में दिये हैं । (ख) दुष्कर यमकोंके कतिपय उदाहरण ३६-७७ में दिये हैं । भामहने यमकका निरूपण दस (काव्यालङ्कार २।६-१८) श्लोकोंमें बड़े अस्तव्यस्त प्रकारसे किया है : (क) उन्होंने भरतके सन्दष्टक और समुद्ग आदि भेदोंको (१) पादोंके आदिमें, (२) दो पदोंके मध्य और अन्तमें यमक, (३) पादाभ्यास, (४) आवली, (५) सब पादोंमें यमकके रूपमें दिया है । दशम श्लोकके उत्तरार्धमें सम्भवतः ९वें श्लोकका प्रथम पाद ही स्पष्ट किया गया है, ताकि उसे (१) आदि, (२) मध्य, (३) अन्त इन तीन भेदोंके रूपमें न समझ लिया जाये ।¹ इन पाँच भेदोंके अतिरिक्त उन्होंने (१) अन्तररहित (लगातार) और (२) एक पादके अन्तरसे, एवं (३) दो पादोंके अन्तमें भी, तथा (४) सभी पादोंमें पूर्ण पादकी आवृत्तिसे भी यमक बताये हैं, जो दुष्कर होते हैं ।² इसके बाद १७ वें श्लोकमें उन्होंने यमकका लक्षण दिया है : सुनने में समान, अर्थोसे परस्पर भिन्न वर्णोंको पुनः जो कहना है, वह यमक कहा जाता है ।³ भामहका यह लक्षण सम्भवतः लिखा तो गया था उनके लाटा- १. आदि-मध्यान्तयमकं पादाभ्यासं तथाऽऽवली । समस्तपादयमकमित्येतत्पञ्चधोच्यते ॥ काव्यालङ्कार २।६ सन्दष्टकसमुद्गादेरत्रैवान्तर्गतिर्मता । आदौ, मध्यान्तयोर्वा स्यादिति पञ्चैव, तद् यथा ॥ १० २. अनन्तरैकान्तरयोरेवं पादान्तयोरपि । कृत्स्नं च सर्वपादेषु दुष्कृतं साधु तादृशम् ॥ काव्यालङ्कार २।१६ ३. तुल्यश्रुतीनां भिन्नानामभिधेयैः परस्परम् । वर्णानां यः पुनर्वादो, यमकं तन्निगद्यते ॥ काव्यालङ्कार २।१७